स्कूल टेकओवर के समय कार्यरत कर्मचारियों की सेवा को केवल 'गैर-स्वीकृत पद' बताकर नकारा नहीं जा सकता, HC का आदेश
पटना हाईकोर्ट ने सेवा नियमित करने और बर्खास्त लिपिक को बहाल करने से जुड़े दो मामलों में अहम फैसला सुनाया है. पढ़ें पूरी खबर..

Published : February 25, 2026 at 8:07 PM IST
पटना: बुधवार को पटना हाइकोर्ट ने सेवा समाहितकरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि विद्यालय अधिग्रहण के समय कार्यरत कर्मचारियों की सेवा को केवल 'गैर-स्वीकृत पद' बताकर नकारा नहीं जा सकता. कोर्ट ने क्लर्क-सह-पुस्तकालयाध्यक्ष की सेवा नियमित करने और बकाया भुगतान का निर्देश दिया.
कर्मचारियों की सेवा को लेकर हाईकोर्ट का डिसीजन: जस्टिस अजीत कुमार की एकलपीठ ने सुनील कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि टेकओवर एक्ट-1981 की मंशा साफ है. अधिग्रहण की तिथि पर कार्यरत कर्मियों की सेवा राज्य में समाहित मानी जाएगी.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ललन कुमार ने दलील दी कि सुनील कुमार की नियुक्ति वर्ष 1982 में विधिवत हुई थी. वे 31 मार्च 1991 को विद्यालय के सरकारी अधिग्रहण के समय कार्यरत थे. 15 मार्च ,1997 की निरीक्षण रिपोर्ट में भी उनकी सेवा की पुष्टि की गई है. समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया. ऐसे में भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.
राज्य की ओर से जीपी-27 प्रभाकर झा ने तर्क दिया कि संबंधित पद स्वीकृत सूची में नहीं था और नियुक्ति सरकारी प्रतिबंध के बाद हुई थी. कोर्ट ने इस दलील को तकनीकी आधार बताते हुए खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि दशकों तक सेवा लेने के बाद राज्य इस आधार पर अधिकार से इनकार नहीं कर सकता. हाईकोर्ट ने 29 अक्तूबर 2012 तक का बकाया वेतन और सेवानिवृत लाभ तीन माह में देने का आदेश दिया.
बर्खास्त लिपिक को बहाल करने का आदेश: वहीं, एक अन्य मामले में पटना हाईकोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए बर्खास्त लिपिक को बहाल करने का आदेश दिया है. जस्टिस विवेक चौधरी की एकलपीठ ने सिविल रिट याचिका संख्या 1051/2025 पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया. ये मामला गोघरी (खगड़िया) अनुमंडल कार्यालय में कार्यरत अपर लिपिक प्रदीप कुमार पंडित से जुड़ा है.
वर्ष 2015 में कथित रिश्वत प्रकरण में विभागीय कार्रवाई करते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. उनके खिलाफ सतर्कता थाना कांड संख्या 33/2014 दर्ज हुआ था. हालांकि आपराधिक मुकदमे में 4 सितंबर 2025 को उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया.
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजीव नयन ने दलील दी कि विभागीय जांच में न तो कोई गवाह पेश किया गया और न ही आरोपों को विधिसम्मत ढंग से सिद्ध किया गया. केवल प्राथमिकी दर्ज होने और गिरफ्तारी के आधार पर उन्हें दोषी ठहराकर सेवा से हटा दिया गया.
पुनर्बहाल कर वेतन दें: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभागीय कार्रवाई में आरोपों को 'संभावनाओं के संतुलन' के आधार पर सिद्ध करना आवश्यक है लेकिन इसके लिए न्यूनतम साक्ष्य और गवाहों की परीक्षा जरूरी है. बिना साक्ष्य के निष्कर्ष निकालना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है. कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति आयु पार नहीं कर चुके हैं तो तीन माह के भीतर पुनर्बहाल कर सभी वेतन और अन्य लाभ दिए जाएं.
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