पन्ना टाइगर रिजर्व में रिकॉर्ड तोड़ गिद्धों की बढ़ोत्तरी, तीन दिन की गणना हुई पूरी
पन्ना टाइगर रिजर्व में खत्म हुई गिद्धों की गणना, पिछले सालों के मुकाबले गिद्धों की बढ़ी संख्या, जानिए पन्ना में कितने वल्चर.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 22, 2026 at 7:00 PM IST
|Updated : February 22, 2026 at 7:51 PM IST
पन्ना: मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व में इस समय गिद्धों की गणना चल रही है. तीन दिनों तक चलने वाली गणना आज 22 फरवरी को संपन्न हुई. तीन दिनों की गिद्ध गणना में साल 2026 में पन्ना दक्षिण वनमंडल में कुल 1127 गिद्ध दर्ज किए गए हैं. जो हाल के वर्षों में सर्वाधिक हैं.
दर्ज प्रजातियां
गणना के दौरान वनमण्डल में 7 प्रजातियों के गिद्ध दर्ज किए गए. जिनमें इंडियन (लॉन्ग-बिल्ड/देशी) गिद्ध, इजिप्शियन (सफेद/व्हाइट स्कैवेंजर) गिद्ध, व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध, हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन, सिनेरेयस (ब्लैक) गिद्ध व रेड-हेडेड (किंग) गिद्ध शामिल हैं. इनमें लॉन्ग-बिल्ड (देशी) गिद्धों की संख्या सर्वाधिक पाई गई. इतनी विविध प्रजातियों का एक ही वनमण्डल में दर्ज होना, इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता व सुरक्षित आवास का संकेत है.
गिद्धों से जुड़े रोचक तथ्य
देशी गिद्ध सामान्यतः चट्टानों, ऊंची पहाड़ियों और बड़े पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं और लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में निवास करने वाली रेजिडेंट प्रजाति माने जाते हैं. इजिप्शियन गिद्ध अपेक्षाकृत छोटे आकार के होते हैं. जो मानव बस्तियों के आसपास भी देखे जा सकते हैं. हिमालयन व यूरेशियन ग्रिफन जैसे बड़े गिद्ध मौसमी प्रवासी होते हैं, जो हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भोजन व अनुकूल जलवायु की तलाश में मध्य भारत तक आते हैं. अधिकांश गिद्ध मृत पशुओं का मांस खाते हैं और प्राकृतिक रूप से सड़े-गले शवों को साफ करने में विशेषज्ञ होते हैं. जिससे वे पारिस्थितिकी तंत्र में एक विशिष्ट भूमिका निभाते हैं.
गिद्ध की नजर तेज होती है वे कई किलोमीटर दूर से भी शव को पहचान सकते हैं. ये प्रायः समूह में भोजन करते हैं. एक गिद्ध द्वारा शव देखे जाने पर अन्य गिद्ध भी जल्द वहां पहुंच जाते हैं. कुछ प्रजातियां ऊंचाई पर लंबे समय तक गोल चक्कर लगाते हुए उड़ती हैं, जिससे वे ऊर्जा की बचत करते हुए बड़े क्षेत्र का निरीक्षण कर पाती हैं. गिद्धों का प्रजनन चक्र धीमा होता है. अधिकांश प्रजातियां एक बार में केवल एक अंडा देती हैं, इसलिए उनकी आबादी का बढ़ना संरक्षण प्रयासों की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है.

दक्षिण पन्ना के संरक्षण प्रयासों की सफलता
गिद्धों की आबादी में हुई इस उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे कई कारण संभावित हैं. दक्षिण पन्ना वनमण्डल द्वारा चलाया जा रहा वल्चर फ्रेंडली गौशाला सर्टिफिकेशन पहल विशेष रूप से प्रभावी सिद्ध हो रही है. इस पहल के अंतर्गत अब तक 7 गौशालाओं को जोड़ा जा चुका है. जहां सुरक्षित पशु-औषधियों का उपयोग सुनिश्चित करने, मृत पशुओं के सुरक्षित निपटान व गिद्धों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं.

बीते डेढ़ साल में वन विभाग के मैदानी अमले द्वारा मेडिकल स्टोर्स, गौशालाओं, पशु चिकित्सालयों व ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाया गया. इस दौरान दवा-विक्रेताओं, पशु चिकित्सकों व गौ स्वामियों को गिद्धों के लिए घातक प्रतिबंधित दवाओं जैसे डाइक्लोफेनाक, एसिक्लोफेनाक, केटोप्रोफेन और निमेसुलाइड के स्थान पर मेलॉक्सिकैम या टोल्फेनामिक एसिड जैसी सुरक्षित दवाओं के उपयोग की सलाह दी गई. साथ ही इस साल कुछ नए गिद्ध-बाहुल क्षेत्रों की पहचान की गई.
- बाघों के गढ़ बांधवगढ़ में गिद्धों की अहम भूमिका, फिर शुरू हुई वल्चर्स काउंटिंग
- मध्य प्रदेश में गिद्धों की अद्भुत जर्नी, 10 सालों में दोगुना हुआ कुनबा, मौसम जानकार होते हैं वल्चर
गिद्धों का पारिस्थितिक महत्व
गिद्ध प्रकृति के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माने जाते हैं. ये मृत पशुओं के शवों को खाकर वातावरण में फैलने वाले घातक जीवाणुओं व संक्रमणों को नियंत्रित करते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र स्वच्छ और संतुलित बना रहता है. गिद्धों की पर्याप्त संख्या होने से पशुओं के शवों के सड़ने से उत्पन्न होने वाली बीमारियों का जोखिम घटता है. मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को लाभ मिलता है. दक्षिण पन्ना में गिद्धों की बढ़ती संख्या इस क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और सफल संरक्षण प्रयासों का अत्यंत सकारात्मक संकेत है.

