बिहार का वो पंचायत भवन, जहां 'सुशासन' नहीं भैंस और बकरियां करती हैं राज
शिवहर के माली पोखर भिंडा पंचायत का बदहाल भवन पशुओं के तबेले में तब्दील हो गया है. पढ़ें शिवहर से सुमित सिंह की रिपोर्ट

Published : May 28, 2026 at 6:10 PM IST
शिवहर: बिहार के शिवहर जिले से सरकारी विकास के दावों की पोल खोलती हुई माली पोखर भिंडा पंचायत भवन की जर्जर तस्वीर सामने आई है. यह महत्वपूर्ण भवन अब प्रशासनिक उपेक्षा के कारण पूरी तरह से पशुओं का आश्रयस्थल बनकर रह गया है.
परिसर में पशुओं का डेरा: जिस परिसर में ग्राम सभा की बैठकें होनी चाहिए थीं, जनसुनवाई की आवाज़ें गूंजनी चाहिए थीं, योजनाओं का लाभ आम आदमी तक पहुँचना चाहिए था, वहां आज भेड़-बकरियां और भैंसें बंधी हैं. कमरों में पशुओं का बसेरा है, चारों ओर घास-झाड़ियों के घने जंगल उग आए हैं और वीरानी का सन्नाटा पसरा हुआ है. पंचायत भवन परिसर में कदम रखते ही बदहाली का भयावह दृश्य सामने आता है.
गोबर-कीचड़ का अंबार: चारों तरफ झाड़-झंगल और ऊंची-ऊंची घास उगी हुई है. भवन के कमरों में पशुओं को बांधा जा रहा है और गोबर-कीचड़ का अंबार लगा हुआ है. परिसर में न बिजली की व्यवस्था है, न रोशनी का कोई इंतजाम. यहां तक कि शौचालय का नामोनिशान तक नहीं है. सफाई की कल्पना करना भी बेमानी है. एकमात्र चापाकल लगा है, लेकिन उसकी भी दशा दयनीय है, कभी सूखा रहता है, तो कभी मुश्किल से कुछ बूंदें टपकती हैं.
भवन पर हमेशा ताला: पंचायत भवन पर हमेशा ताला लटका रहता है, मानो यहां आने की किसी को जरूरत ही नहीं. पंचायत भवन परिसर में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र की स्थिति और भी शर्मनाक है.जहां बच्चों को पोषण और शिक्षा मिलनी चाहिए, वहां भूसा भरा पड़ा है और गंदगी का अंबार लगा हुआ है. मनरेगा केंद्र, जो ग्रामीण मजदूरों को रोजगार की उम्मीद देता है, वह भी पूरी तरह बदहाल और वीरान पड़ा है.

उपेक्षा की कहानी: परिसर का हर कोना उपेक्षा और लापरवाही की कहानी कह रहा है. ग्रामीण सोनेलाल शाह ने बताया कि इस पंचायत भवन में कुछ भी नहीं होता. पूरा जंगल ही रहता है. हम तो देखभाल के लिए यहां रहते हैं, लेकिन कोई व्यवस्था नहीं है. मुखिया का नाम भी भूल गए.
"इतने सालों में न कोई योजना का लाभ मिला, न कोई विकास का काम हुआ. बस कागज़ों पर सब कुछ होता है, ज़मीन पर कुछ नहीं." -सोनेलाल शाह, ग्रामीण

बदहाली से फूटा गुस्सा: स्थानीय निवासी अनिल कुमार का दर्द और भी गहरा है. उन्होंने कहा कि यहां आओ तो सिर्फ भेड़-बकरियों की आवाज़ सुनाई देती है. पंचायत भवन एकदम खंडहर बन गया है. जनप्रतिनिधि के दर्शन सिर्फ चुनाव के वक्त होते हैं. वे वोट मांगने आते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. काम सिर्फ कागज़ पर होता है, असली विकास तो कोसों दूर है. इस पंचायत में पैदा होना ही जैसे एक सज़ा है.

फंड की कमी का बहाना: वहीं जब स्थानीय जनप्रतिनिधि उमेश नारायण शाह से इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि समस्या तो बहुत जटिल है, हम भी बहुत परेशान हैं. साफ-सफाई के लिए फंड ही नहीं मिलता. अगर कुछ पैसा आए तो व्यवस्था में सुधार हो सके. हम अकेले क्या कर सकते हैं.
"समस्या काफी जटिल है हम भी बहुत परेशान हैं, लेकिन साफ-सफाई के लिए फंड ही नहीं मिलता तो अकेले हम क्या कर सकते हैं. फंड मिलेगा तो ही हालत में सुधार हो सकता है." -उमेश नारायण शाह, मुखिया

बजट के आवंटन पर सवाल: लेकिन असल सवाल यही है कि जब पंचायत को सरकार की ओर से नियमित अनुदान मिलता है, जब मनरेगा, आंगनबाड़ी और अन्य योजनाओं के लिए राशि आवंटित होती है, तो वह धन आखिर जाता कहां है. पंचायत भवन की यह दुर्दशा बार-बार यहीं सवाल उठा रही है.
अधिकारी ने दिया आश्वासन: हालांकि प्रखंड पदाधिकारी मो. राहिल ने सवाल के जवाब में बताया कि मामले की जानकारी हुई है. यह कहीं से सही नहीं लग रहा, कुछ कमियों के कारण भवन का यह हाल है, और स्थिति में सुधार हो जल्द से जल्द इसका हम पूरा प्रयास करेंगे.
बीमार व्यवस्था: माली पोखर भिंडा पंचायत भवन की यह दशा कोई अपवाद नहीं, बल्कि ग्रामीण शासन-व्यवस्था की उस गहरी बीमारी का लक्षण है जहां जवाबदेही शून्य है और जनता की आवाज अनसुनी रह जाती है. करोड़ों की योजनाएं बनती हैं, नेता भाषण देते हैं पर विकास सिर्फ कागज़ों पर होता है और जमीन पर भेड़-बकरियां चरती हैं.

लोकतंत्र की हार: यह कहानी केवल एक जर्जर इमारत की नहीं, बल्कि उस हारे हुए लोकतांत्रिक वादे की भी है जो गांव तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देता है. अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस पंचायत भवन की दुर्दशा का संज्ञान ले, दोषियों पर कार्रवाई हो और ग्रामीणों को उनका हक मिले.
इसे भी पढ़ें-
भाई की याद में नेहरू कैबिनेट की मंत्री ने बनवाया था अस्पताल, आज जर्जर होकर खंडहर में तब्दील
Ground Report: भवन जर्जर, डॉक्टर गायब और मरीज बेहाल.. क्यों बिहार में स्वास्थ्य केंद्र बदहाल?

