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'मैं आखिरी चुनाव जीतकर भगवान के पास जाना चाहता हूं', नहीं चला शांता का 'भावनात्मक अस्त्र'

पालमपुर में नहीं चला भाजपा का 'भावनात्मक अस्त्र', शांता कुमार की भावुक अपील भी रही बेअसर.

शांता कुमार
शांता कुमार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : June 2, 2026 at 11:12 AM IST

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शिमला: 31 मई को नगर निगम चुनाव के नतीजे घोषित किए गए. बीजेपी ने मंडी, सोलन, धर्मशाला में बंपर जीत हासिल की है. हालांकि पालमपुर में बीजेपी कांग्रेस का किला फतह नहीं कर पाई. बीजेपी ने पालमपुर में इस बार कांग्रेस के गढ़ को भेदने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन सफलता नहीं मिली.

पालमपुर में बीजेपी ने अनुराग ठाकुर से लेकर तमाम बड़े नेताओं की फौज उतार दी थी. बीजेपी ने अपने सबसे बुजुर्ग नेता शांता कुमार को भी मैदान में उतारा था. उनके चेहरे को आगे कर लोगों से बीजेपी के लिए वोट देने की अपील की थी. प्रचार के दौरान जनता से शांता कुमार ने भावुक अंदाज में आखिरी इच्छा जताई थी. उन्होंने कहा था कि "मैं जीवन के अंतिम मोड़ पर हूं. अब पता नहीं मेरी आपसे कौन सी मुलाकात आखिरी हो. मुझे लगता है कि 2027 का चुनाव मेरे जीवन का आखिरी चुनाव होगा. मैं हार कर भगवान के पास नहीं जाना चाहता हूं, इसलिए मैंने यहां के कार्यकर्ताओं को कहा है कि अब एकजुट होकर जो भी चुनाव आए, उसे जीतें और 2027 के चुनाव के बाद मैं जब यहां से विदा होऊं और भगवान के पास जाऊं तो जीत कर जाऊं. ये मेरे मन की इच्छा है, इसलिए भाजपा कार्यकर्ता एकजुटता के साथ जुट जाएं. नगर निगम चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक भाजपा ही जीतेगी."

बीजेपी ने शांता कुमार की अपील को भावनात्मक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करना चाहा था, लेकिन शांता कुमार की इस भावुक अपील का भी कोई असर देखने को नहीं मिला और पालमपुर में कांग्रेस ने बंपर जीत हासिल की है. कांग्रेस ने इस चुनावी संग्राम में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 15 में से 11 वॉर्डों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर नगर निगम में स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया. दूसरी ओर, बीजेपी को महज 4 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. पिछली बार के मुकाबले बीजेपी इस बार यहां सिर्फ 2 ही सीटों का इजाफा कर पाई. हालांकि कुछ प्रत्याशी बेहद कम मार्जिन से हारे थे.

कौन हैं शांता कुमार ?

शांता कुमार दो बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वो पहली बार जनता पार्टी से साल 1977 से 1980 के बीच सीएम रहे और फिर 1990 से 1992 के बीच बीजेपी से मुख्यमंत्री रहे. साल 1934 में कांगड़ा जिले में जन्मे शांता कुमार ने 1963 में अपनी ही ग्राम पंचायत के एक पंच के तौर पर सियासी पारी का आगाज किया था. आज उनकी गिनती देश के सबसे कद्दावर राजनेताओं में है. वो विधायक से लेकर सांसद और नेता प्रतिपक्ष से लेकर केंद्रीय मंत्री तक के तौर पर जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की कमी को दूर करने और घरों तक पानी पहुंचाने के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों की बदौलत ही उन्हें पानी वाले मुख्यमंत्री के रूप में आज भी याद किया जाता है.

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