नहीं बढ़ रही बच्चों की लंबाई, इस जिले में छोटे कद का है पांच में से एक बच्चा
आंगनबाड़ी केंद्रों में 36,868 सक्रिय बच्चों में से 36,561 बच्चों का मापन हुआ. मॉनिटरिंग से बच्चों की पोषण स्थिति की पहचान संभव होती है.


By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 28, 2026 at 8:44 AM IST
|Updated : February 28, 2026 at 11:57 AM IST
सिरमौर: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में 6 वर्ष तक पंजीकृत बच्चों में से 5 वर्ष तक के बच्चों की जनवरी माह की ग्रोथ मॉनिटरिंग रिपोर्ट ने विकास और चुनौती की मिली-जुली तस्वीर सामने रखी है. हालांकि फरवरी माह की रिपोर्ट अभी आना बाकी है, लेकिन जनवरी के आंकड़े बताते हैं कि 6,721 बच्चे ठिगनापन (छोटे कद) से प्रभावित पाए गए, जो कुल मापे गए बच्चों का 18.39 प्रतिशत बनता है. यह दर्शाता है कि पोषण की लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
दरअसल जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत कुल 36,868 सक्रिय बच्चों में से 36,561 बच्चों का मापन किया गया. ये प्रशासनिक सक्रियता का संकेत है, लेकिन जब इन्हीं आंकड़ों को स्वास्थ्य के नजरिये से देखा जाए तो तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली बन जाती है. हर पांच में से लगभग एक बच्चा ठिगनापन से प्रभावित है. कुल 6,721 बच्चे लंबाई के मानकों से पीछे हैं. वहीं, 984 बच्चे तीव्र कुपोषण की श्रेणी में दर्ज हुए हैं. स्थिति यहीं नहीं रुकती बल्कि 2,142 बच्चे कम वजन के हैं और 1,088 बच्चे अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित पाए गए हैं. ये स्पष्ट करता है कि जिले में अब कुपोषण और मोटापा दोनों समानांतर चुनौतियां बन चुके हैं.
99.17 प्रतिशत बच्चों की मॉनिटरिंग
जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में जनवरी माह के दौरान 99.17 प्रतिशत मॉनिटरिंग दर्ज की गई, जो प्रशासनिक सक्रियता का स्पष्ट संकेत है. पंजीकृत बच्चों में से 36,561 बच्चों का वजन और ऊंचाई समय पर मापा जाना दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था नियमित और संगठित रही. नियमित मॉनिटरिंग से बच्चों की पोषण स्थिति की पहचान समय पर संभव होती है, जिससे आवश्यक हस्तक्षेप किए जा सकते हैं. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल मापन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके आधार पर सुधारात्मक कदम भी उतने ही जरूरी हैं.
6,721 बच्चे ठिगनापन से प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार 2,265 बच्चे अत्यधिक ठिगने पाए गए, जबकि 4,456 बच्चे मध्यम ठिगनापन की श्रेणी में दर्ज हुए. इस प्रकार कुल 6,721 बच्चे, यानी 18.39 प्रतिशत मापे गए बच्चों में, ऊंचाई के अनुसार आयु के मानकों पर पीछे पाए गए. ठिगनापन लंबे समय तक पोषण की कमी, बार-बार संक्रमण या देखभाल में कमी का संकेत हो सकता है. यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए तो यह बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकता है.

984 बच्चे कुपोषण की जद में
जिले में 184 बच्चे अत्यधिक कुपोषित (सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन) पाए गए, जबकि 800 बच्चे मध्यम कुपोषण (मॉडरेट एक्यूट मालन्यूट्रिशन) से प्रभावित दर्ज हुए. इस प्रकार कुल 984 बच्चे, यानी 2.69 प्रतिशत मापे गए बच्चे तीव्र कुपोषण की श्रेणी में आते हैं. तीव्र कुपोषण बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है और ऐसे मामलों में विशेष निगरानी व पोषण सहायता की आवश्यकता होती है.
आईसीडीएस के जिला कार्यक्रम अधिकारी पवन कुमार ने बताया कि 'आंगनबाड़ी केंद्रों में हर महीने बच्चों की ऊंचाई और वजन की मॉनिटरिंग की जाती है. स्वास्थ्य आकलन तीन मुख्य श्रेणियों एसएएम, अंडरवेट और स्टंटेड बच्चों के आधार पर किया जाता है. उन्होंने बताया कि जनवरी माह की रिपोर्ट में 184 बच्चे सीवियर एक्यूट मालन्यूट्रिशन (एसएएम) श्रेणी में हैं. इनका डाटा हर महीने स्वास्थ्य विभाग को भेजा जाता है, ताकि समय पर मेडिकल जांच और उपचार हो सके. अंडरवेट बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों में डबल डाइट दी जाती है, जिससे अगले महीने तक स्थिति में सुधार देखने को मिलता है.
2,142 बच्चे कम वजन के
रिपोर्ट में 351 बच्चे अत्यधिक कम वजन के और 1,791 बच्चे मध्यम कम वजन की श्रेणी में दर्ज हुए. इस प्रकार कुल 2,142 बच्चे, यानी 5.86 प्रतिशत मापे गए बच्चे आयु के अनुसार कम वजन के पाए गए. कम वजन की समस्या अक्सर असंतुलित आहार, बार-बार संक्रमण या पोषण जागरूकता की कमी से जुड़ी होती है. इसे नियंत्रित करने के लिए परिवार और स्वास्थ्य तंत्र दोनों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है.

1,088 बच्चे अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित
जिले में 388 बच्चे मोटापे से ग्रस्त पाए गए, जबकि 700 बच्चे अधिक वजन की श्रेणी में दर्ज हुए. इस प्रकार कुल 1,088 बच्चे, यानी 2.97 प्रतिशत मापे गए बच्चों में, वजन असंतुलन की दूसरी दिशा में पाए गए. यह संकेत देता है कि जिले में पोषण की समस्या केवल कमी तक सीमित नहीं रही, बल्कि असंतुलित खानपान और बदलती जीवनशैली भी एक उभरती चुनौती बन रही है.
पच्छाद में ठिगनापन सबसे अधिक
परियोजना स्तर पर पच्छाद में 327 बच्चे अत्यधिक ठिगने पाए गए, जिससे अत्यधिक ठिगनापन 11.62 प्रतिशत दर्ज हुआ, जो जिले में सबसे अधिक है. इसके अलावा 455 बच्चे मध्यम ठिगनापन की श्रेणी में दर्ज हुए. इस प्रकार पच्छाद परियोजना में कुल 782 बच्चे ठिगनापन से प्रभावित हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि इस क्षेत्र में दीर्घकालीन पोषण सुधार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है.
संगड़ाह में एसएएम दर सबसे अधिक
संगड़ाह परियोजना में 42 बच्चे सीवियर एक्यूट मॉलन्यूट्रिशन (एसएएम) अर्थात अत्यधिक कुपोषण की श्रेणी में दर्ज किए गए. इससे संगड़ाह परियोजना में एसएएम की दर 0.83 प्रतिशत रही, जो संबंधित परियोजनाओं में जिले में सबसे अधिक है. यह आंकड़ा दर्शाता है कि क्षेत्र विशेष में गंभीर तीव्र कुपोषण की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक है और यहां लक्षित पोषण हस्तक्षेप की आवश्यकता बनी हुई है.

नाहन में सर्वश्रेष्ठ मॉनिटरिंग
नाहन परियोजना ने 99.89 प्रतिशत मॉनिटरिंग दर्ज करते हुए जिले में सर्वोच्च स्थान हासिल किया है. यहां 6,248 पंजीकृत बच्चों में से 6,241 बच्चों का वजन और ऊंचाई सफलतापूर्वक मापा गया. इससे स्पष्ट होता है कि नाहन क्षेत्र में आंगनबाड़ी स्तर पर निगरानी व्यवस्था सक्रिय और संगठित रही. नियमित फॉलोअप, समयबद्ध मापन और कार्यकर्ताओं की तत्परता के कारण लगभग सभी बच्चों की मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जा सकी. यह प्रदर्शन अन्य परियोजनाओं के लिए भी एक मानक के रूप में देखा जा सकता है.
डबल डाइट व मासिक मॉनिटरिंग से बच्चों की सेहत सुधारने की कोशिश
आईसीडीएस के जिला कार्यक्रम अधिकारी पवन कुमार ने बताया कि 'लक्ष्य केवल मापन नहीं, बल्कि प्रभावित बच्चों को सामान्य श्रेणी में लाना है, जिन बच्चों की लंबाई उम्र के अनुसार कम है, उनके अभिभावकों की विशेष काउंसलिंग की जाती है. अब ओवरवेट बच्चों की समस्या भी बढ़ रही है. माताओं को संतुलित आहार देने और चीनी-नमक व रिफाइंड खाद्य पदार्थ कम रखने की सलाह दी जा रही है. विभाग हर माह मॉनिटरिंग कर रहा है. उन्होंने अभिभावकों से पोषण अभियानों में सक्रिय भागीदारी की अपील भी की है.'
कुल मिलाकर जनवरी माह की मॉनिटरिंग मजबूत रही और आंकड़ों ने स्थिति को स्पष्ट रूप से सामने रखा है. चुनौती चिन्हित हो चुकी है, अब असली परीक्षा सुधार की है. आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या इन संकेतकों में सुधार दर्ज होता है और प्रभावित बच्चों की संख्या में कमी आती है. सिरमौर के बच्चों का भविष्य केवल आंकड़ों के संकलन से नहीं, बल्कि ठोस और निरंतर सुधारात्मक प्रयासों से तय होगा.

