Special : अनूठा है प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जहां संग्रहित हैं 12वीं से 20वीं शताब्दी के ग्रंथ और पांडुलिपियां
राजस्थान की 7 शाखाओं में 1 लाख से अधिक ग्रंथ पांडुलिपियां हो रहीं डिजिटलाइज्ड. 95 प्रतिशत काम पूरा. खास है यह 'ज्ञान का भंडार'...

Published : February 21, 2026 at 6:34 AM IST
जोधपुर: राजस्थान में धर्म, संस्कृति, ज्योतिष सहित अन्य विषयों पर हजारों ग्रंथ और दस्तावेज सदियों पहले लिखे गए. इनमें से ज्यादातर को अगर एक जगह देखना हो तो वह जगह है प्राच्य विद्यापीठ प्रतिष्ठान, जिसका निदेशालय जोधपुर है. जबकि शाखाएं उदयपुर, जयपुर, भरतपुर, अलवर, बीकानेर और कोटा में है. सभी जगहों पर 1 लाख 24 हजार ग्रंथ और दस्तावेज संग्रहीत किए हैं. इनमें 95 फीसदी को डिजिटलाइज्ड कर दिया गया.
शत-प्रतिशत डिजिटलाइज्ड होने के बाद इन्हें ऑनलाइन देखा जा सकेगा. निदेशक गोमती शर्मा ने बताया कि पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए यह विभाग 1956 से चल रहा है. डिजिटलाइज्ड करने का काम अंतिम चरण में है. पूरा होने के बाद सरकार की मंशा के अनुरूप इन्हें ऑनलाइन किया जाएगा, जिससे शोधार्थियों सहित सभी को इसका लाभ होगा.
12वीं से 20वीं शताब्दी के ग्रंथ पांडुलिपियां हैं संरक्षित : प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी कमल किशोर सांखला ने बताया कि विभाग में 12वीं से 20वीं शताब्दी के धार्मिक, चिकित्सा, ज्योतिष, वास्तु, कथा, सहित 24 विषयों के ग्रंथ, पांडुलिपियां जो ताम्र, चर्म, कपड़ा, लकड़ी और कागज पर लिखे गए थे, उनको विभिन्न माध्यमों से एकत्र कर विभाग में संग्रहित और संरक्षित किया गया है. उन्होंने बताया कि विभाग की सभी शाखाओं में सालाना तीन सौ शोधार्थी आते हैं, जो अपने अपने विषय से जुड़ी तथ्यात्मक जानकारी जुटाते हैं.

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अनोखी है 314 फीट की कुंडली, सुक्ष्म शैली में लिखे ग्रंथ : जोधपुर निदेशालय में बहुत सारी आश्चर्यजनक पांडुलिपियां हैं. ठाकुर औशान सिंह की पुत्री यशकुंवरी जिसका जन्म 1905 में हुआ था, उनकी कुंडली बहुत आकर्षक रंग में उस समय बनाई गई थी. इस कुंडली की लंबाई 314 फिट 9 इंच है. इसका पूरा एक रोल है, जिसे यहां प्रदर्शित किया गया है. इसी तरह से यहां पर मेवाड़ शैली में सुक्ष्म अक्षरों से हाथ से लिए ग्रंथ हैं, जिनकी लंबाई भी कई फीट है. यहां पर विक्रम संवत 1869 में हाथ से बेहद बारीक तरीके से लिखी भगवद गीता सहित अन्य धार्मिक ग्रंथ हैं. भगवद गीता की लंबाई 13 फीट 9 इंच है, जबकि इसकी चौड़ाई 9 इंच है.

300 साल पुराने जैन संतों के निमंत्रण पत्र : 18वीं शताब्दी में जैन संतों को भेजे गए संस्कृत, प्राकृत व लोक भाषाओं में तैयार इन निमंत्रण पत्रों को सुरक्षित रखा गया है, जिनमें तत्कालीन समाज, संस्कृति और नगरीय वैभव का भी वर्णन मिलता है. साथ ही रंगीन चित्रों के माध्यम से तत्कालीन धर्मस्थलों, सामाजिक परिवेश, जीवन पद्धति व वाणिज्यिक गतिविधियों को भी बखूबी उकेरा जाता था, जिसे देख संत उस नगर की स्थिति का आकलन कर अपने प्रवेश की अनुमति देते थे. उदयपुर नगर का पत्र सबसे लंबा है, जिसकी लंबाई 8 मीटर से अधिक है, जबकि चौड़ाई 30 सेंटीमीटर.

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ढोला-मारू की प्रेम कथा का सचित्र ग्रंथ भी मौजूद : राजस्थान की प्रसिद्ध प्रेम कथा है ढोला मारू का. नरवर के राजकुमार ढोला और पूंगल की राजकुमारी मरवण जिसे मारू कहा जाता है, उनके प्रेम और विरह में कई दोहे और कविताएं हैं. यहां पर राजस्थान के लोकमानस में रचा-बसा काव्य ढोला-मारू रा दूहा प्रेम, जिसमें दर्शाया गया है कि बाल-विवाह समय के साथ बिछोह में कैसे बदल जाता है. परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि दोनों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, लेकिन मारू का विश्वास डिगता नहीं. विरह से व्याकुल मारू ने कबूतरों और कुरजां जैसे प्रवासी पक्षियों को अपना दूत बनाया था. यह ग्रंथ भी यहां संरक्षित है.


