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खुद का दर्द भुला मरीजों के चेहरे पर बिखेर रहीं मुस्कान, जिंदादिली की मिसाल बनीं कैंसर पीड़ित नर्सेज

कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से हर दिन लड़ रहीं जिंदगी की जंग, मरीजों के लिए साइकोलॉजिकल सपोर्ट बनी ग्वालियर जयारोग्य अस्पताल की नर्सें.

GWALIOR Nurses battling cancer
मरीजों के लिए साइकोलॉजिकल सपोर्ट बनी नर्सेस (Gwalior Nurses battling cancer)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : January 9, 2026 at 8:23 PM IST

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Updated : January 9, 2026 at 11:03 PM IST

8 Min Read
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रिपोर्ट- पीयूष श्रीवास्तव

ग्वालियर: कहते हैं जब जान पर बन आती है तो इंसान संसार से विरक्त हो जाता है, लेकिन इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो हर दिन ना सिर्फ़ मौत से जद्दोजहद करते हैं बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनते हैं. ऐसी ही मिसाल हैं ग्वालियर की कुछ नर्सें जो ख़ुद कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही हैं लेकिन अपने दर्द को भुलाकर दूसरों की सेवा कर रही हैं... उन्हें हौसला दे रही हैं. आइए आपको मिलवाते हैं ग्वालियर जयारोग्य अस्पताल के उन नर्सिंग स्टाफ से जो खुद बेतहाशा दर्द से जूझ रही हैं लेकिन मरीजों के लिए अपनी तकलीफ़ भुला चुकी हैं.

ग्वालियर जयारोग्य अस्पताल समूह में हर दिन हज़ारों मरीजों का इलाज होता है. सैकड़ों मरीज इलाज के लिए भर्ती भी होते हैं और इनकी देखभाल समय पर इलाज की जिम्मेदारी डॉक्टर्स के साथ साथ नर्सिंग स्टाफ की भी होती है. इसी जिम्मेदारी को अपने जिंदगी से ऊपर रख कर जयारोग्य अस्पताल समूह की तीन नर्स अपनी ड्यूटी निभा रहीं हैं. ये नर्स हैं- राखी श्रीवास्तव, प्रेमलता माथनकर और सुनीता डोगरे जो जानलेवा और गंभीर बीमारियों से जूझ रही हैं. लेकिन अपनी परेशानी उन्होंने कभी अपने फर्ज़ के आड़े नहीं आने दी.

कैंसर से हर दिन जिंदगी की जंग लड़ रहीं नर्सेस (ETV Bharat)

दूसरों के लिए साइकोलॉजिकल सपोर्ट बनती हैं राखी

ग्वालियर जयारोग्य अस्पताल के हज़ार बिस्तर बिल्डिंग की सर्जरी विभाग में ड्यूटी कर रही नर्सिंग ऑफिसर राखी श्रीवास्तव पिछले कुछ वर्षों से ब्लड कैंसर से जूझ रही हैं. दवाओं के सहारे अपने जीवन में आगे बढ़ रही राखी आईसीयू में मरीजों की देखभाल करती हैं. राखी कहती हैं, कई बार ऐसे मरीज आते हैं जो ख़ुद इस बीमारी से पीड़ित होते हैं तो अपनी ड्यूटी में उन्हें मोटिवेट करने का मौक़ा मिलता है. उनके लिए राखी ख़ुद एक उदाहरण बन जाती हैं जिससे कि वे हताश ना हों.

GWALIOR Nurses battling cancer
मरीज की देखभाल करतीं नर्सिंग ऑफिसर राखी श्रीवास्तव (ETV Bharat)

उनकी नर्स जब कैंसर जैसी बीमारी में भी काम कर सकती है तो वे भी ठीक हो सकते हैं. क्योंकि कई बार मरीजों को लगता है कि कैंसर होने के बाद उनके जीवन में कुछ बचा नहीं है. ऐसी स्थिति में राखी से उन्हें साइकोलॉजिकल सपोर्ट भी मिलता है और जो ट्रीटमेंट डॉक्टर उनके लिए लिखकर जाते हैं वह उन्हें देती हैं.

'श्रीकृष्ण की भक्ति नहीं होने देती हताश'

जब ऐसी गंभीर जानलेवा बीमारी हो तो लोग जीवन से हताश हो जाते हैं लेकिन राखी कहती हैं कि वे भगवान श्रीकृष्ण को बहुत मानती हैं. उनके जीवन में कान्हाजी उन्हें हताश नहीं होने देते. जैसे प्रेमानंद महाराज की दोनों किडनियां फेल होने के बाद भी उनकी भक्ति ने उन्हें जीवित रखा है इसलिए जितना जीवन ईश्वर ने दिया है उसमें हताश होने क्या मतलब है. इसी लिए राखी अपने ट्रीटमेंट के अलावा कभी अतिरिक्त छुट्टी नहीं लेती और हर दिन अपनी ड्यूटी के लिए अस्पताल पहुचती हैं.

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कैंसर से हर दिन जिंदगी की जंग लड़ रहीं नर्सेस (ETV Bharat)

पति चाहते थे नौकरी छोड़ दें, लेकिन उनकी इच्छा का किया समर्थन

राखी श्रीवास्तव के परिवार में उनके पति के सिवा कोई नहीं है, राखी बताती हैं, "जब कैंसर डिटेक्ट हुए तो मेरे हसबैंड ने नौकरी छोड़ने के लिए कहा लेकिन मैं अपना काम जारी रखना चाहती थी. मेरा इलाज मुंबई में चल रहा था तो डॉक्टर ने भी काम करने का समर्थन किया." रखी कहती हैं कि वे इसलिए नौकरी नहीं करतीं कि उन्हें आर्थिक परेशानी है, बस वे अकेले घर में बैठ कर हताश नहीं होना चाहती. उनकी कोशिश रहती है कैंसर के अलावा भी जो गंभीर बीमारियों के मरीज आते हैं, उन्हें इंस्पायर करती रहें जिससे वे भी अपने जीवन और दुखों में सकारात्मक रहें.

पाँच साल पहले डिटेक्ट हुआ ब्रेस्ट कैंसर, तब गोद में थी तीन माह की बेटी

जयारोग्य के न्यूरोलॉजी विभाग में पदस्थ हैं स्टाफ नर्स प्रेमलता माथनकर, जिनकी कहानी अपने आप में प्रेरणा देने वाली है. आम तौर पर कैंसर से उबरने में लोग आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं. कई बार तो जिंदगी से भी हार जाते हैं. लेकिन प्रेमलता माथनकर उनमें से नहीं हैं.

वे एक बार नहीं बल्कि दूसरी बार कैंसर से लड़ रही हैं. 14 वर्षों से जयारोग्य अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहीं प्रेमलता को पहली बार 2020 में ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चला था, उनके पास तीन माह की बेटी थी. बीमारी का पता चला तो पूरी तरह टूट गईं लेकिन फिर ख्याल आया अपनी बेटी और परिवार का जिसके लिए उन्हें जीना था. ख़ुद को अंदर से स्ट्रॉंग किया और ग्वालियर जयरोग्य अस्पताल में ही ट्रीटमेंट लेना शुरू किया.

GWALIOR Nurses battling cancer
मरीज की देखभाल करतीं नर्स सुनीता डोगरे (ETV Bharat)

दो साल पहले लंग्स और बोन कैंसर भी हुआ

क़रीब एक साल ब्रेस्ट कैंसर का इलाज चला लेकिन इसके कुछ समय बाद ही 2023 में उन्हें दोबारा कैंसर हो गया. इस बार लंग्स और बोन कैंसर ने उन्हें जकड़ लिया. लेकिन घर में अब दो बेटियां थीं, उनकी जिम्मेदारी ने और हौसला दिया और फिर उन्होंने अपने नवोदय स्कूल के सीनियर से संपर्क किया जो दिल्ली के बड़े अस्पताल में स्पेशलिस्ट हैं. उनकी देखरेख में दोबारा ट्रीटमेंट शुरू किया. इलाज के दौरान अब तक उनके 43 सेशन कीमोथेरेपी के हो चुके हैं और और दो महीने पहले वे रेडिएशन ट्रीटमेंट भी ले चुकी हैं.

'याद नहीं आख़िरी बार बिना दर्द कब आई नींद'

प्रेमलता भी ईश्वर पर विश्वास रखते हुए अपना जीवन जी रही हैं. लेकिन इस बीमारी ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया है ना सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी. क्योंकि दो बेटियों की जिम्मेदारी और ख़ुद प्रेमलता की देखभाल के चलते पति ने नौकरी छोड़ दी, शरीर में हमेशा इतना दर्द रहता है कि उन्हें याद नहीं कि बिना दर्द आखिरी बार कब सोई थीं. लेकिन वे कहती हैं कि उन्हें अस्पताल के सभी साथियों का सहयोग मिलता है जिसकी वजह से वे अपने काम को बिना परेशानी कर पाती हैं. अपने इलाज के सिवा उन्होंने कभी नौकरी में अतिरिक्त छुट्टी नहीं ली. वे या तो अपनी सीएल या वीक ऑफ में ही अपना ट्रीटमेंट करा लेती है.

12 साल से रोमेटाइड आर्थाराइटिस से जूझ रहीं सुनीता

प्रेमलता और राखी की तरह ही एक और नर्स हैं सुनीता डोगरे. सुनीता को कैंसर तो नहीं है लेकिन उनका जीवन भी अपनी बीमारी के चलते कम संघर्ष भरा नहीं है. 47 साल की सुनीता पिछले 12 वर्षों से रोमेटाइड आर्थोराइटिस से पीड़ित हैं. सिर से लेकर पैरों तक शरीर का एक-एक जॉइंट बीमारी की वजह से बेतहाशा दर्द देता है. हाथों की उँगलियाँ तक टेड़ी होने लगी हैं. चलने-फिरने में तकलीफ़ होती है, फिर भी हर दिन सुनीता ऑर्थोपेडिक डिपार्टमेंट में ड्यूटी के लिए पहुंचती हैं.

बर्दास्त से बाहर तकलीफ़ फिर भी दूसरों की सेवा का भाव

नर्स सुनीता डोगरे कहती हैं कि उनके हर रोज़ यहां आने का एक बड़ा कारण है कि अगर वे अपने शरीर को चलायेंगी नहीं तो तक़लीफ और बढ़ेगी. क्योंकि शरीर एक मशीन है इसलिए अंदर से ही फीलिंग आती है कि उठना है और काम पर जाना है घर में भी जो काम वे ख़ुद कर सकती हैं करती हैं. बीमारी में भी ये सोच कर अपनी ड्यूटी कर रही हैं कि दुनिया में आए हैं तो कुछ अच्छा कर लें. कम से कम किसी की सेवा ही कर लें. घरवाले कभी काम के लिए नहीं बोलते हैं लेकिन वे ख़ुद यहाँ आकर अपनी ड्यूटी करना चाहती हैं. इसलिए हर दिन अस्पताल पहुचती हैं.

जयारोग्य अस्पताल में इनके अलावा भी कई ऐसी नर्सेस हैं जो अलग-अलग बीमारियों से जूझ रहीं है. बावजूद इसके आपने काम को ज़्यादा महत्व देती हैं. प्रेमलता, राखी और सुनीता का अपने काम के प्रति समर्पण और जज्बा वाकई काबिलेतारीफ़ है जो अपना दर्द भुलाकर दूसरों की तकलीफ़ कम करने में जुटी हैं.

Last Updated : January 9, 2026 at 11:03 PM IST