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वन विभाग में चल रही बाबुओं की मनमर्जी, प्रमोशन तो लिया लेकिन पोस्टिंग नहीं!

उत्तराखंड वन विभाग में लिपिक संवर्ग के कई कर्मचारी अपनी मनमर्जी करते हुए नजर आ रहे हैं, इसलिए विभाग ने उन्हें नोटिस जारी किया है.

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वन विभाग में चल रही बाबुओं की मनमर्जी (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : June 6, 2026 at 5:18 PM IST

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देहरादून: उत्तराखंड वन विभाग में लिपिक संवर्ग के कर्मचारियों की कार्यशैली एक बार फिर चर्चा में है. इस बार मामला ऐसे बाबुओं से जुड़ा है, जिन्होंने विभाग से प्रमोशन का लाभ तो ले लिया, लेकिन प्रमोशन के बाद जारी किए गए तैनाती आदेशों का पालन करने में रुचि नहीं दिखाई. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वन मुख्यालय को ऐसे 10 कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करना पड़ा है.

CCF पीके पात्रो ने 10 कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की पुष्टि की है. हालांकि, उन्होंने मामले की जांच और संभावित कार्रवाई को देखते हुए इससे अधिक टिप्पणी करने से इनकार किया है. फिलहाल पूरे विभाग की नजर कर्मचारियों के जवाब और मुख्यालय की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है.

वन विभाग में चल रही बाबुओं की मनमर्जी (ETV Bharat)

मुख्यालय के आदेशों की अनदेखी: दरअसस, वन विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों व तैनाती को लेकर अक्सर विवाद सामने आते रहते हैं, लेकिन इस बार मामला विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले लिपिकों से जुड़ा है. कार्यालयों में फाइलों के संचालन, पत्राचार और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी संभालने वाले इन कर्मचारियों द्वारा मुख्यालय के आदेशों की अनदेखी किए जाने को विभाग गंभीरता से देख रहा है.

कई कर्मचारियों ने नहीं संभाली नई जिम्मेदारी: जानकारी के अनुसार, करीब दो महीने पहले वन विभाग में लिपिक संवर्ग के कई कर्मचारियों को पदोन्नति दी गई थी. पदोन्नति के साथ ही विभागीय नियमों के तहत उन्हें नई जिम्मेदारियों और नए तैनाती स्थलों पर भेजने के आदेश भी जारी किए गए थे. सामान्य प्रक्रिया के अनुसार कर्मचारियों को निर्धारित समय के भीतर अपने नए कार्यस्थल पर कार्यभार ग्रहण करना था, लेकिन कई कर्मचारियों ने ऐसा नहीं किया.

कर्मचारियों को चिन्हित किया गया: हैरानी की बात यह है कि दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कुछ कर्मचारी अपने नए तैनाती स्थलों पर नहीं पहुंचे. इसके बावजूद वे पदोन्नति के आधार पर मिलने वाले लाभ प्राप्त करते रहे. यह स्थिति प्रशासनिक नियमों और सेवा अनुशासन दोनों के विपरीत है. वन मुख्यालय ने ऐसे मामलों की समीक्षा के बाद 10 कर्मचारियों को चिन्हित किया है. इन सभी को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा गया है कि आखिर उन्होंने मुख्यालय के आदेशों का पालन क्यों नहीं किया.

15 दिनों में मांगा गया नोटिस का जवाब: नोटिस में कर्मचारियों को 15 दिन के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं. यदि उनके जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए तो विभाग आगे की कार्रवाई भी कर सकता है. मामले का एक और पहलू विभाग के भीतर चर्चा का विषय बना हुआ है. बताया जा रहा है कि जिन कर्मचारियों ने नई तैनाती पर ज्वाइन नहीं किया, उन्हें कुछ स्थानों पर पदोन्नति के अनुरूप वेतन और अन्य लाभ भी दिए जाते रहे हैं. ऐसे में अब उन आहरण एवं संवितरण अधिकारियों (DDO) की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है, जिन्होंने बिना नई पोस्टिंग पर कार्यभार ग्रहण किए कर्मचारियों को वेतन लाभ प्रदान किया.

कई कर्मचारियों ने नई जगह कार्यभार संभालने के बजाय अपने तबादले रुकवाने के प्रयास शुरू कर दिए थे. विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी रही कि कुछ कर्मचारी विभिन्न माध्यमों से अपने आदेशों में संशोधन या निरस्तीकरण की कोशिश करते रहे. हालांकि इस दौरान विभागीय स्तर पर कोई राहत नहीं मिली और मामला मुख्यालय के संज्ञान में पहुंच गया.

CCF पीके पात्रो के निर्देश: इसी बीच वन मुख्यालय में मानव संसाधन विकास (HRD) से जुड़ी जिम्मेदारी मुख्य वन संरक्षक (CCF) पीके पात्रो को सौंपी गई. पदभार संभालने के बाद उन्होंने इस पूरे मामले की समीक्षा की. समीक्षा में सामने आया कि कई कर्मचारी लंबे समय से तैनाती आदेशों का पालन नहीं कर रहे हैं. इसे प्रशासनिक अनुशासन का गंभीर उल्लंघन मानते हुए उन्होंने तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए. इसके बाद संबंधित कर्मचारियों को नोटिस जारी किए गए और उनसे जवाब मांगा गया.

विभाग का मानना है कि यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कार्रवाई नहीं की गई तो इससे अन्य कर्मचारियों के बीच भी गलत संदेश जाएगा और विभागीय व्यवस्था प्रभावित होगी. पदोन्नति केवल अधिकार नहीं बल्कि नई जिम्मेदारी भी होती हैय जब कोई कर्मचारी प्रमोशन स्वीकार करता है तो उसे उससे जुड़ी शर्तों और तैनाती को भी स्वीकार करना पड़ता है. यदि कर्मचारी केवल पदोन्नति का लाभ लेना चाहता है, लेकिन नई जिम्मेदारी संभालने से बचता है, तो यह सेवा नियमों की भावना के विपरीत माना जाता है.

विभाग अब इस मामले को उदाहरण के तौर पर देख रहा है. माना जा रहा है कि नोटिस के बाद कर्मचारियों के जवाबों का परीक्षण किया जाएगा और आवश्यक होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है. वहीं उन अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है, जिन्होंने नियमों की अनदेखी करते हुए वेतन भुगतान या अन्य प्रशासनिक स्वीकृतियां दीं.

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