प्रमोशन में आरक्षण का मामला हुआ जीरो, फिर शुरुआत से होगी सुनवाई, अजाक संघ के एडवोकेट ने उठाए सवाल
अजाक संघ के वकील बोले- प्रमोशन में कभी हाईकोर्ट का स्टे था ही नहीं, फिर भी 10 साल तक रोकी गई पदोन्नति.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 1, 2026 at 2:53 PM IST
जबलपुर : मध्य प्रदेश में प्रमोशन के आरक्षण पर चली आ रही बहस अब नए सिरे से होगी. जजों के ट्रांसफर के बाद 90 दिन बीत जाने तक फैसला नहीं आया, जिसके बाद एक बार फिर नए सिरे से मामले को सुना जाएगा. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे को लेकर नई बेंच इस मामले को सुनेगी. वहीं, इस मामले से जुड़े हुए वकीलों का दावा है कि प्रमोशन पर तो कभी कोई स्टे था ही नहीं, इसे अलग तरीके से पेश किया गया है.
2016 से शुरू हुआ था ये मामला
दरअसल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 2016 में प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका के आधार पर हाई कोर्ट की एक बेंच ने 2002 के मध्य प्रदेश के प्रमोशन रूल को असंवैधानिक बताते हुए आदेश दिया था कि इन नियमों के आधार पर अब तक जो भी प्रमोशन हुए हैं उन्हें वापस किया जाए. ऐसी हालत में मध्य प्रदेश में प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया और क्योंकि तबतक मध्य प्रदेश में लगभग 85 हजार प्रमोशन हो चुके थे और सबको वापस करना संभव ही नहीं था. इसलिए मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
10 सालों तक प्रमोशन पर रही रोक
वकीलों ने कहा, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर की गई याचिका में यथा स्थिति बनाए रखने के आदेश दिए, और स्टे केवल इस बात पर था कि किसी भी अधिकारी का प्रमोशन वापस नहीं लिया जाएगा, इस कार्यवाही पर स्टे दिया गया था. लेकिन सरकार ने इस प्रक्रिया के बाद प्रमोशन ही रोक दिए और 10 साल से सामान्य प्रमोशन की प्रक्रिया पर रोक लगी रही. इससे नुकसान उन अधिकारी-कर्मचारियों को हुआ जो बिना प्रमोशन ही रिटायर हो गए.
दूसरी समस्या ये आई जब इस 10 साल के समय में कई ऊंचे पदों पर बैठे हुए अधिकारी रिटायर हो गए. इससे प्रशासनिक संकट खड़ा हुआ क्योंकि कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें केवल वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ही फैसला ले सकते हैं.
2025 में बनी नई प्रमोशन नीति
ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने 2025 में प्रमोशन की नई नीति तय की और उसे जैसे ही लागू किया तो कुछ अधिकारियों द्वारा इस मामले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. इनमें ज्यादातर वे लोग थे जो डेपुटेशन पर दूसरे विभागों में पदस्थ हो चुके थे उन्हें डर था कि यदि प्रमोशन होता है तो उन्हें वापस अपने मूल विभाग में जाना होगा. इस मामले की लंबी सुनवाई चली. अंतिम आदेश के लिए यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 17 फरवरी 2026 को सुरक्षित रख दिया गया था लेकिन अगले तीन माह तक की डेडलाइन में इसपर फैसला नहीं आ सका क्योंकि जिस डिविजन बैंच ने इसे सुना था उन जजों का ट्रांसफर हो गया.
अब नए सिरे से होगी मामले की सुनवाई
ऐसे मामलों की सुनवाई के बाद 90 दिनों के अंदर कोर्ट को फैसला देना होता है लेकिन तत्कालीन जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ के ट्रांसफर के बाद इस मामले पर फैसला नहीं आया. परिणामस्वरूप अब ये मामला रीसेट हो गया है और दोबारा नए सिरे से इस मामले पर सुनवाई होगी. वहीं, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अजाक संघ की ओर से प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर बहस कर रहे एडवोकेट रामेश्वर सिंह ने बताया, ''2016 से लेकर 2025 तक भले ही या मुद्दा हाई कोर्ट में चल रहा है लेकिन इसमें कहीं पर भी प्रमोशन में आरक्षण पर कोई स्टे नहीं है.''
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एडवोकेट रामेश्वर सिंह ने बताया, '' मध्य प्रदेश में 2025 की नीति के अनुसार 66% पदों पर सामान्य प्रमोशन और बाकी 34% पदों पर अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारियों को प्रमोशन दिए जाने का प्रावधान है. लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि कोई स्टे नहीं था, तो आखिर सरकार ने प्रमोशन क्यों नहीं किए?''

