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इस अदालत में नहीं लगती कोर्ट फीस, फैसले होते है तुरंत और कोई अपील भी नहीं! जानिए कौन सी है ये अदालत ?

इस अदालत का निर्णय अंतिम होता है.अदालत द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध किसी भी अदालत में अपील नहीं की जाती है.

नहीं लगती कोई कोर्ट फीस, झटपट होता है मामलों का निस्तारण
नहीं लगती कोई कोर्ट फीस, झटपट होता है मामलों का निस्तारण (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Delhi Team

Published : December 23, 2025 at 1:03 PM IST

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Updated : December 23, 2025 at 2:14 PM IST

6 Min Read
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नई दिल्ली /गाजियाबाद : भारत के लोकतंत्र में न्याय के लिए न्यायालय तो बनें हुए है लेकिन अक्सर इंसाफ का इंतज़ार इतना लंबा हो जाता है कि एक पीढ़ी गुज़र जाती है. जब एक छोटा विवाद कई सालों का सफर बन जाए, तब न्याय पाने के लिए इंसान को ज़िंदगी भर कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते है. लेकिन, आज हम आपको एक ऐसे न्यायालय के बारे में बताने जा रहे हैं जहां मिनटों में इंसाफ हो जाता है....

प्रत्येक दावे को अध्यक्ष और दो सदस्यों की टीम द्वारा सुना जाता है : अदालत में दायर होने वाले प्रत्येक दावे को अध्यक्ष और दो सदस्यों की टीम द्वारा सुना जाता है. यदि दावा अदालत के क्षेत्राधिकार में होता है तो दर्ज किया जाता है. इसके बाद विपक्षी पार्टी को अदालत द्वारा नोटिस जारी किया जाता है. नोटिस मिलने के बाद विपक्षी द्वारा स्थाई लोक अदालत में प्रतिवाद पत्र दाखिल किया जाता है. इसके बाद आपसी समझौते की आधार पर वाद का निस्तारण करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है और पक्षकारों की बीच समझौता करने के प्रयास किए जाते हैं.

स्थाई लोक अदालत में किसी प्रकार की कोर्ट फीस नहीं लगती (ETV Bharat)


एलिमेंट्स आफ सेटेलमेंट तैयार करता है स्थाई लोक अदालत : पक्षकारों के बीच समझौता करने के लिए कई बार प्रयास करने के बाद भी यदि पक्षकार समझौते के लिए तैयार नहीं होते हैं तो फिर स्थाई लोक अदालत द्वारा एलिमेंट्स आफ सेटेलमेंट तैयार किया जाता है. यदि स्थाई लोक अदालत में कई बार प्रयास करने के बाद पक्षकारों के बीच समझौता नहीं हो पता है तो स्थाई लोक अदालत द्वारा वाद को गुण और अवगुण के आधार पर निर्णय किया जाता है. अदालत का निर्णय अंतिम होता है. निर्णय की किसी और अदालत में अपील नहीं हो सकती है. स्थाई लोक अदालत का आर्थिक क्षेत्राधिकार सीमित है. स्थाई लोक अदालत में एक करोड करोड़ तक की विवादग्रस्त संपत्ति के मामलों का निस्तारण संभव है.

प्रत्येक दावे को अध्यक्ष और दो सदस्यों की टीम द्वारा सुना जाता है
प्रत्येक दावे को अध्यक्ष और दो सदस्यों की टीम द्वारा सुना जाता है (ETV Bharat)

हम बात कर रहे है स्थाई लोक अदालत की. जी हाँ इस लोक अदालत के बारे में जागरूकता ज़रा कम है. राष्ट्रीय लोक अदालत के बारे में तो लोगों में काफी जागरुकता है। राष्ट्रीय लोक अदालत प्रत्येक तीन महीने में लगती है लेकिन स्थाई लोक अदालत का सामान्य कोर्ट की तरह साल भर संचालन होता है. राष्ट्रीय लोक अदालत की तरह ही स्थाई लोक अदालत काम करती है. लेकिन इसमें यातायात से संबंधित चलानों का निस्तारण नहीं होता है. आपसी समझौते के आधार पर वाद का निस्तारण होता है और निर्णय अंतिम होता है जिसे किसी अन्य कोर्ट में चुनौती भी नहीं दी जा सकती .

कोई कोर्ट फीस नहीं लगती : सामान्य कोर्ट में जहां कोर्ट फीस देनी पड़ती है तो वहीं स्थाई लोक अदालत में किसी प्रकार की कोर्ट फीस जमा नहीं कराई जाती है. कोर्ट फीस न लगने से जहां एक तरफ गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों पर मुकदमे का आर्थिक बोझ नहीं पड़ता तो वहीं दूसरी तरफ बिना खर्च के लोग अपने विवाद आसानी से अदालत तक पहुंचने में सक्षम होते हैं.

तेज़ और आसान न्याय : स्थाई लोक अदालत में वादों का निस्तारण अपेक्षाकृत जल्दी होता है क्योंकि यहां आपसी समझौते से बात को सुलझाने पर जोर दिया जाता है. स्थाई लोक अदालत में प्रक्रियाएं भी काफी सरल होती है जिससे कि आम आदमी को काफी राहत मिलती है.

टोल फ्री नंबर 1800-419-0234 और हेल्पलाइन नंबर 1500 पर कॉल करके परेशान लोग ज्यादा जानकारी ले सकते है और अपना मामला निस्तारण के लिए अदालत में दर्ज़ करा सकते हैं.

स्थाई लोक अदालत में निस्तारित हुए मामले Case 1:

उत्तर प्रदेश के हापुड़ स्थित निजी कंपनी द्वारा नमकीन आदि समेत विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाने का काम किया जाता है. निजी कंपनी द्वारा 2013 में नवयुग मार्केट स्थित निजी कंपनी से 20 लाख रुपए स्टॉक और 10 लाख रुपए प्लांट और मशीनरी के लिए लोन लिया गया था. जिसका इंश्योरेंस 29 अक्टूबर 2013 से 28 अक्टूबर 2014 तक बीमित धनराशि 60 लाख रुपए तय किया गया था. 22 अक्टूबर 2014 की रात्रि कंपनी में आग लग गई और कंपनी में रखा सभी सामान जलकर खाक हो गया. मौके पर फायर ब्रिगेड ने पहुंचकर आग बुझाने की कार्रवाई की और मामले की रिपोर्ट दर्ज कराई गई.इंश्योरेंस क्लेम पर

पीड़ित को मिला उचित मुआवजा :

इंश्योरेंस क्लेम के लिए पीड़ित ने बीमा कंपनी में सूचना दी और जिसके बाद नुकसान के हिसाब से बीमा की धनराशि 29 लाख 87 हज़ार 740 रुपए धनराशि बनती थी लेकिन बीमा कंपनी द्वारा मामले में धांधली कर पीड़ित को केवल 5 लाख 56 हज़ार 652 रुपए की बीमा क्लेम की धनराशि अदा की गई. मामले की सुनवाई के लिए पीड़ित द्वारा स्थाई लोक अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया था. स्थाई लोक अदालत के तीन सदस्य समिति द्वारा मामले की सुनवाई की गई. स्थाई लोक अदालत की अध्यक्ष रीता सिंह ने मामले में सुनवाई के बाद निस्तारण करते हुए पीड़ित को 34 लाख 31 हजार रुपए 22 अक्टूबर 2014 से सात प्रतिशत ब्याज के साथ अदा करने का आदेश पारित किया है.

स्थाई लोक अदालत में निस्तारित हुए मामले Case 2:

गाजियाबाद के लोनी निवासी वीर सिंह द्वारा वैशाली स्थित निजी अस्पताल में घुटने का ऑपरेशन कराया गया था. ऑपरेशन सफल नहीं रहा और लगातार दर्द बढ़ता गया. इसके बाद पीड़िता ने निजी अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर, सुपरीटेंडेंट और जिस डॉक्टर के द्वारा पीड़िता का घुटने का ऑपरेशन किया गया था उसके खिलाफ स्थाई लोक अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल किया. मामले की सुनवाई करते हुए अध्यक्ष रीता सिंह द्वारा पीड़िता को निजी अस्पताल के डॉक्टर से क्षतिपूर्ति के रूप में 20 लाख रुपए देने का आदेश पारित किया गया. मामले को निस्तारण के लिए डॉक्टर को 20 लाख रुपए देने के लिए चार महीने में चार किस्तों की सहूलिया दी गई है. जबकि निजी अस्पताल की मैनेजिंग डायरेक्टर और अस्पताल की सुपरिंटेंडेंट के खिलाफ मामला अभी भी स्थाई लोक अदालत में विचाराधीन है.

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Last Updated : December 23, 2025 at 2:14 PM IST