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बृज विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार पर 'ढाल' बनी जांच समिति: रिपोर्ट लटकने से आरोपी बच रहे

आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश फाइलों में धूल खा रहे हैं. बीते दो महीने से आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शून्य है.

Brij University scam
महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (Etv Bharat Bharatpur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : December 10, 2025 at 4:36 PM IST

4 Min Read
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भरतपुर: महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों पर कार्रवाई को लेकर राजभवन और उच्च शिक्षा विभाग के आदेश जारी हुए दो माह बीत चुके हैं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन और जांच समिति की ढिलाई ने दोषियों को 'सुरक्षा कवच' दे दिया है. बोम की बैठक में 21 नवंबर को गठित तीन सदस्यीय जांच समिति को 15 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन आज तक रिपोर्ट नहीं सौंपी गई. नतीजतन उपकुलसचिव, सहायक कुलसचिव और परीक्षा नियंत्रक जैसे दोषी कर्मचारी बिना किसी कार्रवाई के सुरक्षित हैं. संभागीय आयुक्त की जांच में जिन कर्मचारियों की स्पष्ट भूमिका सामने आ चुकी है, उन पर अब तक एफआईआर, निलंबन और वित्तीय वसूली की प्रक्रिया भी शुरू नहीं हुई. राजभवन के आदेश फाइलों में धूल खा रहे हैं और बीते दो महीने से आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शून्य है.

कुलसचिव बोले नहीं मिली रिपोर्ट: कुलसचिव सीएस जोरवाल ने विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से सफाई देते हुए कहा कि जांच समिति को बोम की बैठक में तय समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन अभी तक रिपोर्ट नहीं आ सकी है. उन्होंने बताया कि जांच समिति से अभी तक किसी प्रकार की अंतरिम या अंतिम रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है. समिति से लगातार संपर्क में हैं और इस सप्ताह रिपोर्ट आने की उम्मीद है. रिपोर्ट मिलते ही उसकी समीक्षा कर नियमानुसार आगे की कार्यवाही की जाएगी.

पढ़ें: बृज यूनिवर्सिटी : निलंबित कुलपति रमेश चंद्रा पद से हटाए गए, तीन भ्रष्ट कर्मचारियों पर कार्रवाई का इंतजार

जांच में लग रहा समय: जांच समिति सदस्य योगेन्द्र भानु ने कहा कि हमें कुल 280 पेज की विस्तृत रिपोर्ट, रिकॉर्ड, बिल, पुराने आदेश, जांच विवरण और वित्तीय दस्तावेजों की जांच करनी है, इसलिए समय लग रहा है. संभवतः 13 या 14 दिसंबर तक विस्तृत रिपोर्ट कुलपति और बोम को सौंप दी जाएगी. देरी इसलिए है ताकि रिपोर्ट बिल्कुल तथ्यात्मक और मजबूत हो, जिससे आगे की कार्रवाई में कोई कानूनी अड़चन न आए.

वसूली के दिए थे आदेश: राजभवन की ओर से उप कुलसचिव डॉ. अरुण कुमार पाण्डेय, सहायक कुलसचिव प्रशांत कुमार और परीक्षा नियंत्रक फरवट सिंह पर निलंबन, एफआईआर और बर्खास्त कुलपति प्रो रमेश चंद्रा समेत चारों से वित्तीय वसूली के आदेश जारी किए गए थे. विवि की बिगड़ी व्यवस्था को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग ने चार कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजा, लेकिन यहां भी तमाशा हुआ पड़ा है. एक कर्मचारी ने अब तक ज्वाइन नहीं किया है.

विश्वविद्यालय में घोटालों की सूची:

  • 25 लाख रुपए कैश चोरी: विश्वविद्यालय से नकद राशि चोरी हो गई, लेकिन आज तक न तो चोर पकड़ा गया और न ही रकम बरामद हुई. विधायक बहादुर सिंह कोली ने इस मामले की शिकायत एसीबी में की थी.
  • वॉच टॉवर घोटाला: विश्वविद्यालय की चारदीवारी पर चार वॉच टॉवर लगाने का टेंडर 2.5 लाख रुपए में संभव था, लेकिन कुलपति ने 9.5 लाख रुपए का भुगतान किया. यानी 7 लाख रुपए का सीधा घोटाला.
  • फर्नीचर घोटाला: 9 करोड़ रुपए का फर्नीचर खरीदा गया, जबकि विश्वविद्यालय में उसका कोई अता-पता नहीं. 30 हजार रुपए के पर्दे, 25 हजार रुपए की कुर्सियां, 2.5 लाख रुपए की डाइनिंग टेबल जैसी खरीद ने भ्रष्टाचार की गहराई उजागर की.
  • केमिस्ट्री लैब घोटाला: 12 करोड़ की लैब का टेंडर 'ग्लोबल एंड इंस्टीट्यूट' नाम से पहले से पंजीकृत निजी संस्था के नाम पर कर दिया गया. बाद में जांच में यह पूरा मामला फर्जी पाया गया.
  • पुस्तक खरीद घोटाला: विश्वविद्यालय ने 1.5 करोड़ की पुस्तकें खरीदीं जो विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम से असंबंधित थीं. इसके अलावा 10 करोड़ की और पुस्तकों की खरीद में भी अनियमितता मिली.
  • उत्तर पुस्तिका घोटाला: गुणवत्ता शून्य वाली कॉपियों पर 1.5 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया.
  • संविदा भर्ती में धांधली: 14 संविदा शिक्षक बाहरी लोगों को योग्यता के विपरीत नियुक्त किया गया.
  • पीएचडी प्रवेश घोटाला: 50 से अधिक छात्रों को बिना गाइड उपलब्ध कराए प्रवेश दे दिया गया, फीस भी ली गई और अब तक कोर्स पूरा नहीं हो पाया.
  • 65 वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारी नियुक्त: नियमों के विपरीत पांच वृद्ध कर्मचारियों को पुनर्नियुक्ति दी गई.
  • फर्जी बिल और भुगतान: कई करोड़ के बिल फर्जी फर्मों के नाम से पास किए गए.