explainer: लाल आतंक के सूर्यास्त और विकास के सूर्योदय का साक्षी बना 2025 में नारायणपुर
माओवाद के खात्मे के लिए चरणबद्ध तरीके से अभियान चलाया गया, जिसका असर अब जमीन पर दिखाई दे रहा है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : January 1, 2026 at 9:41 AM IST
आकाश सिंह ठाकुर की रिपोर्ट
नारायणपुर: जो कल तक पूरी दुनिया के लिए 'अबूझ' (जिसे बूझा न जा सके) था, आज वह न केवल 'सुलझ' रहा है, बल्कि देश की मुख्यधारा के साथ कदमताल करने को भी बेताब खड़ा है. छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला, जिसका नाम सुनते ही दिलो दिमाग में घने जंगल, अबूझमाड़ की दुर्गम और खतरनाक पहाड़ियां, माओवाद की खौफनाक तस्वीरें उभरती थी, साल 2025 में उसने अपनी इस पहचान को सीधी चुनौती दी और बदलाव की ओर बढ़ चला.
बदल रही है नक्सलगढ़ की तस्वीर
एक वक्त था, जब नक्सलगढ़ कहे जाने वाले नारायणपुर में कभी बारूदी सुरंगों में विस्फोट होता था तो कभी गोलीबारी. लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. विकास की सड़क यहां तेजी से बनने लगी है. बच्चे स्कूल जाने लगे हैं. रोजगार की तलाश में लोग शहरों का रुख कर रहे हैं. लगातार माओवादियों के सरेंडर किए जाने और मारे जाने से स्थितियां तेजी से बदली हैं. जिसे कभी नक्सलियों का लाल गलियारा माना जाता था, अब वहां पर्यटन और विकास की असीम संभावनाएं नजर आने लगी हैं. ये बदलाव कोई एक दिन में नहीं हुआ बल्कि इसके लिए चरणबद्ध तरीके से फोर्स ने नक्सलगढ़ में ऑपरेशन चलाया.

माओवाद के खात्मे के लिए चलाए गए चरणबद्ध अभियान
प्रथम चरण (जनवरी-मार्च): 'ऑपरेशन क्लीन स्वीप' और संघर्ष का शंखनाद
साल 2025 का सूर्योदय नारायणपुर के लिए शांति की नई उम्मीद और संघर्ष की भीषण ललकार दोनों साथ लेकर आया.साल की शुरुआत सुरक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक रही.
1. माड़ के भीतर पहली सर्जिकल स्ट्राइक
जनवरी की सर्द हवाओं के बीच सुरक्षा बलों ने अपनी मंशा जाहिर कर दी थी. वर्ष का आरंभ अबूझमाड़ में एक बड़े संयुक्त नक्सल ऑपरेशन से हुआ, जहां तीन अलग-अलग जिलों की टीमों ने एक साथ धावा बोला. इस ऑपरेशन में 4 नक्सली ढेर किए गए. हालांकि, जीत की यह खबर एक जवान की शहादत के गम के साथ आई, जिसने यह बता दिया कि आने वाला साल आसान नहीं होगा.
2. बारूद पर भारी पड़ी सतर्कता
11 जनवरी को कुतुल से कच्चापाल मार्ग, जो नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, वहां सर्च ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों ने 5-5 किलोग्राम के 4 जिंदा आईईडी (IED) बम बरामद किए. अगर ये फटते तो भारी तबाही मचती, लेकिन सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने नक्सलियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया.

3. 'अरब' का सरेंडर: नक्सल तंत्र की कमर टूटी
साल की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत 15 जनवरी को मिली. ताड़मेटला कांड (जिसमें 76 जवान शहीद हुए थे) और झीरम घाटी जैसे नरसंहारों का मास्टरमाइंड, गांधी ताती उर्फ कमलेश उर्फ 'अरब' ने पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार के सामने हथियार डाल दिए. अरब कुतुल एरिया कमेटी में आतंक का पर्याय था. उसका मुख्यधारा में लौटना नक्सलियों के लिए किसी झटके से कम नहीं था. अरब के साथ 3 अन्य सीनियर कैडर भी मुख्यधारा से जुड़े. अरब का सरेंडर केवल एक व्यक्ति का सरेंडर नहीं था, बल्कि यह अबूझमाड़ की खुफिया जानकारी का पुलिस के पास आना था. इसी का नतीजा था कि आने वाले महीनों में पुलिस को कई बड़े नक्सली डंप मिले.
4. रक्त रंजित संघर्ष और लोकतंत्र की जीत
बौखलाए नक्सलियों ने 17 जनवरी और उसके बाद कई आईईडी ब्लास्ट किए, जिनमें बीएसएफ के जवान घायल हुए. 5 फरवरी को आमदाई माइंस में मजदूरों को निशाना बनाया गया, लेकिन इन हमलों के बीच 7 फरवरी को पुलिस ने वह कर दिखाया, जो असंभव माना जाता था. नक्सलियों की अघोषित राजधानी 'कुतुल' में पुलिस कैंप की स्थापना की गई. यह लाल कोहरे के छंटने की पहली किरण थी. फरवरी में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए, भले ही नक्सलियों ने बाधा डालने की कोशिश की. वहीं 25 फरवरी को ऐतिहासिक मावली मेला, बिना किसी डर के संपन्न हुआ, जो स्थानीय संस्कृति की जीत थी.

5. विकास की कीमत और मार्च का मैराथन
मार्च का महीना मिश्रित भावनाओं वाला रहा. 6 मार्च को ओरछा में राशन ले जा रहे ग्रामीणों का ट्रैक्टर पलटने से 3 लोगों की मौत ने सड़क और परिवहन की कमी को उजागर किया. लेकिन इसी मार्च में, नारायणपुर ने अपनी वैश्विक उपस्थिति दर्ज कराई. 'अबूझमाड़ पीस हाफ मैराथन' में केन्या के धावकों के साथ माड़ के युवाओं ने दौड़ लगाई. ईटीवी भारत इस आयोजन का डिजिटल पार्टनर रहा और हमने दिखाया कि कैसे बंदूक थामने वाले हाथ, अब मेडल थाम रहे थे. 24 मार्च को बेड़मा कोटि में नए कैंप की स्थापना ने नक्सलियों को और पीछे धकेल दिया.
द्वितीय चरण (अप्रैल-जून): बुनियादी ढांचे की क्रांति और 'बसवराजू' का अंत
अप्रैल आते-आते नारायणपुर का तापमान और सुरक्षा बलों का जोश, दोनों चरम पर थे. यह तिमाही नारायणपुर के इतिहास में 'इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति' और सबसे बड़ी 'सैन्य सफलता' के रूप में दर्ज की गई.

नेलांगुर में लहराया तिरंगा और मोदी का संवाद
23 अप्रैल को महाराष्ट्र सीमा से सटे अंतिम गांव 'नेलांगुर' में पुलिस कैंप स्थापित हुआ. अब तक जो इलाका 'नो मैन्स लैंड' था, वहां पर तिरंगा लहराया गया. इसी बीच, अबूझमाड़ की कला ने दिल्ली का दिल जीता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारायणपुर के काष्ठ कलाकार बुटलू राम माथला से मुलाकात की और उनकी बांसुरी की तारीफ की. ईटीवी भारत की टीम ने बुटलू राम से एक्सक्लूसिव बात कर उनकी कला को दुनिया के सामने रखा. मई में पंडीराम मंडावी को पद्मश्री मिलना इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना.
मई की महाविजय: बसवराजू का अंत
मई का महीना नक्सलवाद के ताबूत में सबसे बड़ी कील साबित हुआ. गुंडेकोट के जंगलों में एक भीषण मुठभेड़ हुई. इस मुठभेड़ में सीपीआई (माओवादी) का महासचिव और देश का सबसे वांछित नक्सली नंबाला केशवराव उर्फ 'बसवराजू' मारा गया. उसके साथ 28 अन्य नक्सली भी ढेर हुए. ईटीवी भारत की टीम सबसे पहले मुठभेड़ स्थल पर पहुंची. हमारी रिपोर्ट ने दिखाया कि कैसे इस ऑपरेशन ने नक्सलियों के 'नर्वस सिस्टम' को लकवाग्रस्त कर दिया. बसवराजू का मारा जाना 2025 की ही नहीं, बल्कि पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी खबर थी. हालांकि, इसमें हमने अपने 2 जांबाज भी खोए.

सड़क से बदलता माड़
इस दौरान 'नियद नेल्लानार' योजना ने रफ्तार पकड़ी. कुरुषनार से कुतुल तक पक्की सड़क का काम शुरू हुआ. 30 अप्रैल को ईटीवी भारत ने नेलांगुर से ग्राउंड रिपोर्ट दी, जिसमें दिखाया गया कि ग्रामीण कैंप खुलने से खुश हैं, क्योंकि अब उन्हें राशन और अस्पताल की सुविधा मिल रही है. 3 मई को वर्षों बाद नक्सलियों की कथित राजधानी में पुलिस के संरक्षण में वार्षिक मेले का आयोजन हुआ, जहां ग्रामीणों ने पहली बार खुलकर 'रेल लाइन' की मांग की.
सुशासन और जनसंवाद
प्रशासन ने 'सुशासन तिहार' के माध्यम से सरकार को ग्रामीणों के द्वार तक पहुंचाया. समाज कल्याण विभाग की अधिकारी वैशाली मरड़वार ने उन बीहड़ों का दौरा किया जहां आज तक कोई सरकारी मुलाजिम नहीं पहुंचा था. ईटीवी भारत की टीम ने 18 मई को रेत माफिया के खिलाफ खबर चलाई, जिसका असर हुआ और अवैध खनन बंद हुआ.
तृतीय चरण (जुलाई-सितंबर): मानवीय संवेदनाएं, पुनर्वास और प्रतिरोध
मानसून के आगमन के साथ नारायणपुर में संघर्ष का स्वरूप बदला. अब लड़ाई केवल बंदूक की नहीं, बल्कि व्यवस्था और अधिकारों की थी.

शिक्षा की बदहाली पर चोट
जुलाई में ईटीवी भारत की टीम मसपूर आश्रम पहुंची थी, वहां आदिवासी बच्चों की दयनीय स्थिति और टपकती छतों ने व्यवस्था की पोल खोली. हमारी खबर का बड़ा असर हुआ और कलेक्टर ने तत्काल संज्ञान लिया और सुधार के निर्देश दिए.
पर्यटन और सरेंडर की बाढ़
बारिश में अबूझमाड़ के झरने जीवंत हो उठे. कच्चापाल और फरसबेड़ा जलप्रपात को पहली बार पर्यटन मानचित्र पर पहचान मिली. दूसरी तरफ, नक्सली संगठन बिखर रहा था. जुलाई में कुतुल एरिया कमेटी के 22 नक्सलियों ने एक साथ सरेंडर किया. 24 जुलाई को 33 लाख के इनामी 8 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए.

कुतुल में 78 साल बाद आजादी
अगस्त का महीना भावुक कर देने वाला था. 15 अगस्त को कुतुल गांव में, जो कभी नक्सल मुख्यालय था, 78 साल बाद शान से तिरंगा फहराया गया. गांव के लोगों की आंखें नम नजर आई. कई लोगों ने तो बताया कि उन्होने अपने जीवन में पहली बार अपने गांव में राष्ट्रगान सुना.

जन-आंदोलन और लोकतंत्र की परिपक्वता
लोकतंत्र की मजबूती तब दिखी जब सितंबर में लोग खराब सड़कों (NH 130 D) के खिलाफ सड़कों पर उतरे. एनएचएम (NHM) कर्मचारियों ने आंदोलन किया. यह बदलाव का संकेत था. लोग अब डर नहीं रहे थे, बल्कि अपने अधिकारों के लिए सरकार से सवाल कर रहे थे. इसी बीच 22 सितंबर को पुलिस ने फरसबेड़ा में सेंट्रल कमेटी मेंबर कोसा रामचंद्र रेड्डी और कट्टा कादरी सत्यनारायण को ढेर कर नक्सलियों की शीर्ष लीडरशिप का लगभग सफाया कर दिया.
चतुर्थ चरण (अक्टूबर-दिसंबर): 'बस्तर ओलंपिक' और अंतिम प्रहार
साल के अंतिम तीन महीने उत्सव, खेल और माओवाद के अंतिम गढ़ों को ध्वस्त करने के नाम रहा.
बस्तर ओलंपिक: खेल बना माओवाद के खिलाफ मजबूत हथियार
अक्टूबर में जब छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने कच्चापाल में पेड़ के नीचे चौपाल लगाई, तो लोगों का डर पूरी तरह गायब था. 25 अक्टूबर को 'बस्तर ओलंपिक' के दूसरे सीजन का आगाज हुआ. ओरछा, जहां कभी खेल प्रतिबंधित थे, वहां हजारों युवाओं ने तीरंदाजी और फुटबॉल में जौहर दिखाए. यह युवाओं के हाथ से बंदूक छीनकर मेडल थमाने की कवायद थी.

डीप कोर में कैंप और नई सुबह
नवंबर और दिसंबर में सुरक्षा बलों ने 'माड़ बचाओ अभियान' के तहत कोंगे, सीतराम, धोबे, डोडीमरका, काकुर, और लंका जैसे अति-दुर्गम इलाकों में 16 नए पुलिस कैंप स्थापित किए. ईटीवी भारत ने सीतराम गांव से रिपोर्टिंग की और बदलते अबूझमाड़ को पास से दिखाया. साथ ही मसपुर जैसे क्षेत्र में जहां पहली बार फिल्म 'दण्डा कोड़ूम' की शूटिंग हुई, लाइट, कैमरा और एक्शन की आवाज ने गोलियों की आवाज को दबा दिया.

सामूहिक आत्मसमर्पण और पौधारोपण
25 नवंबर को 28 हार्डकोर नक्सलियों ने सरेंडर किया. सबसे सुखद तस्वीर वह थी जब इन पूर्व नक्सलियों ने 'वायान वाटिका' में पौधे लगाए. यह प्रतीक था कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ जीवन को सींचने का काम करेंगे. 17 दिसंबर को 11 और नक्सलियों ने सरेंडर किया.
साल का दुखद पहलू
दिसंबर में बीएसएफ और डीआरजी जवानों की आत्महत्या और दुर्घटना में मौत ने सुरक्षा बलों के मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती को भी रेखांकित किया. यह याद दिलाता है कि युद्ध केवल मैदान में नहीं, मन के भीतर भी लड़ा जाता है.
राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता
दिसंबर में स्थानीय युवाओं और राजनीतिक दलों ने 50 किमी पदयात्रा निकाल कर स्थानीय पुलिस भर्ती की मांग की. यह दर्शाता है कि अबूझमाड़ का युवा अब रोजगार और वर्दी के लिए लालायित है.

नारायणपुर के लिए वर्ष 2025 केवल 365 दिनों का वक्त नहीं था, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर एक कठिन यात्रा थी. इस साल नारायणपुर ने अपने माथे से 'नक्सलगढ़' का कलंक काफी हद तक मिटा दिया है. शासन की कोशिश से नारायणपुर अब 'नो-गो ज़ोन' (No-Go Zone) नहीं रहा. यहां 'स्टार्टअप्स', 'बस्तर ओलंपिक के मेडल', 'फिल्मी शूटिंग' और 'मिड-डे मील' की गुणवत्ता पर चर्चा हो रही है.
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