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नए साल से पर्यटक मुफ्त में नहीं देख पाएंगे पर्यटन स्थल, जानिए कितना देना होगा टिकट शुल्क

पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने आदेश जारी किए हैं. ये आदेश 1 जनवरी 2026 से लागू किए जाएंगे.

अलवर का बाला किला
अलवर का बाला किला (ETV Bharat Alwar)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : December 31, 2025 at 12:46 PM IST

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अलवर : नव वर्ष 2026 के आगमन को लेकर पर्यटकों में उत्साह है. देश-दुनिया से पर्यटक अलवर भी पहुंचते हैं, लेकिन अब नए साल में अलवर घूमने आने वाले टूरिस्ट्स को पर्यटन केन्द्र बाला किला, मूसी महारानी की छतरी एवं फतेहजंग गुम्बद को देखने के लिए शुल्क चुकाना होगा. पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की ओर से एक जनवरी 2026 से इन पर्यटन स्थलों को देखने के लिए टिकट का प्रावधान किया गया है. अभी तक संग्रहालय को छोड़ ज्यादातर पर्यटन ​स्थलों को देखने के लिए पर्यटकों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं वसूला जाता था.

पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की क्यूरेटर रेणू ने बताया कि एक जनवरी 2026 से अलवर शहर स्थित पर्यटन स्थल मूसी महारानी की छतरी, फतेहजंग गुम्बद और बाला किला को देखने के लिए पर्यटकों को टिकट लेना होगा. विभाग की ओर से इसके आदेश जारी किए जा चुके हैं. अब इन पर्यटक स्थलों पर आमजन व पर्यटन बिना शुल्क चुकाए नहीं घूम सकेंगे. विभाग की ओर से मूसी महारानी की छतरी एवं फतेहजंग गुम्बद देखने के लिए समान शुल्क निर्धारित किया है, जबकि बाला किला देखने के लिए इन पर्यटन स्थलों से दोगुना शुल्क देना होगा.

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अब देना होगा पर्यटकों को शुल्क (रुपए में)

पर्यटन स्थलभारतीय स्टूडेंट विदेशी विदेशी स्टूडेंट
मूसी महारानी छतरी 201010050
फतेहजंग गुम्बद201010050
बाला किला5020200100

बाला किला के लिए दो बार देना होगा शुल्क : अलवर शहर के समीप बाला किला अरावली की पहाड़ी पर स्थित है. यह टाइगर रिजर्व सरिस्का के बफर रेंज में है. इस कारण सरिस्का प्रशासन की ओर से बाला किला जाने वाले लोगों से प्रतापबंध स्थित गेट पर प्रवेश शुल्क लिया जाता है. पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की ओर के अब नए साल में एक जनवरी से बाला किला देखने के लिए अलग से शुल्क लिया जाएगा यानी पर्यटकों को बाला किला देखने के लिए अब दोहरा शुल्क चुकाना होगा.

इन पर्यटक स्थलों का महत्व : अलवर शहर स्थित पर्यटन स्थल बाला किला, मूसी महारानी की छतरी एवं फतेहजंग गुम्बद विशेष महत्व रखते हैं. इतिहासकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल ने बताया कि अरावली की पहाड़ी पर बने बाला किला को कुंवारा किले के नाम से भी जाना जाता है. इसका कारण है कि इस किले पर कोई युद्ध नहीं हुआ था. बाला किला को 1492 में अलावल खां ने बनाया था. सन 1551 में बाला किले को वर्तमान रूप हसन खां मेवाती ने दिया. यह किला अलग-अलग समय में कई राजा-महाराजाओं के अधीन रहा.

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मूसी महारानी की छतरी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है. यह अलवर शहर के बीचों-बीच बनी है. इसे लोग मूसी महारानी की छतरी या 80 खंभों की छतरी के नाम से भी जानते हैं. यह इमारत 80 बलुआ पत्थर से निर्मित खंभों पर टिकी है. मूसी महारानी की छतरी को 1815 में तत्कालीन महाराजा विनय सिंह ने महाराजा बख्तावर सिंह व रानी मूसी की याद में बनवाया था. इसके अलावा फतेहजंग गुम्बद 5 मंजिला इमारत है और यह अपनी बनावट कला के चलते राजपूत व मुगल शैली की याद दिलाती है. इसके प्रत्येक दिशा में 5 दरवाजे और दो खिड़कियां हैं. पांचवी मंजिल पर एक ही आकार के 28 दरवाजे भी हैं. यह स्मारक मुगल शासक शाहजहां के मंत्री फतेह जंग को समर्पित है.