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नेपाल त्रासदीः हिमालय पर्वत श्रृंखला में होती हलचलों से विशेषज्ञ भी चिंतित, ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग को और मजबूत करने की जरूरत

नेपाल त्रासदी से सीख लेकर भविष्य में आपदा के समय जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए कदम उठाना होगा. भूपेन्द्र जिष्टू की रिपोर्ट

Dr. Ravindra Khaiwal, Professor, Department of Environment, PGI
नेपाल त्रासदी से सबक (ANI/ETV Bharat)
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By ETV Bharat Haryana Team

Published : August 29, 2026 at 4:16 PM IST

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Updated : August 29, 2026 at 6:31 PM IST

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चंडीगढ़ से भूपेंद्र जिष्टू की रिपोर्ट

चंडीगढ़ः नेपाल की त्रासदी ने हजारों लोगों की जिंदगी पर असर डाला है. नेपाल में आई आफत ने न सिर्फ नेपाल बल्कि भारत को भी चिंता में डाला हुआ है. क्योंकि भारत का एक बड़ा भू-भाग हिमालय पर्वत श्रृंखला से सटा हुआ है. ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग से गलेशियरों में बनती झीलें एनवायरनमेंट के क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिकों को भी अलार्मिग लगती है. जिन पर वे कड़ी निगरानी रखने की जरूरत पर बल दे रहे हैं.

नेपाल त्रासदी, भारत के लिए बड़ी चेतावनीः इस त्रासदी के बाद लगातार इस बात पर चर्चा हो रही है कि यह त्रासदी कैसे और क्यों आई? लेकिन इस तरह की घटना सिर्फ नेपाल ही नहीं भारत के लिए भी बड़ी चेतावनी के तौर पर देखी जा रही है. भारत का एक बहुत बड़ा भू-भाग उत्तर से पूर्व तक इसी हिमालय क्षेत्र में पड़ता है. जो ज्यादातर हाई रिस्क जोन में आता है. भविष्य के इसी खतरे को लेकर किस तरह काम करने की जरूरत है? नेपाल त्रासदी कैसे हमारे लिए अलार्म है? कैसे और क्यों हिमालय बना हुआ है खतरों का क्षेत्र ? क्या क्लाइमेट चेंज इसका सबसे बड़ा कारण है? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर पीजीआई के एनवायरनमेंट हेल्थ के प्रोफेसर प्रो. रविंद्र खैवाल से ईटीवी भारत ने खास बातचीत की.

नेपाल त्रासदीः हिमालय पर्वत श्रृंखला में होती हलचलों से विशेषज्ञ भी चिंतित (ETV Bharat)

हिमालय क्षेत्र के जियो सिस्टम को समझना होगाः नेपाल में आई त्रासदी के बारे में प्रो. रविंद्र खैवाल बताते हैं कि "नेपाल में जो बाढ़ आई, वो विकराल स्थिति को दर्शाता है. साथ ही हमें आने वाले खतरों के प्रति आगाह भी करता है. इसके लिए हमें हिमालय क्षेत्र के जियो सिस्टम को समझना होगा. वो इस तरह की आपदाओं के लिए अनुकूल परिस्थितियों वाला इलाका है. नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती पहाड़ी इलाकों में एक विशाल ग्लेशियर टूटा, जिसके बाद वो करीब 1200 मीटर नीचे घाटी में आ गिरा. गिरने के दौरान बर्फ पिघली और उसने रास्ते में मौजूद कई टन गाद, मिट्टी, चट्टान और मलबे को अपने साथ समेट लिया. इस भारी मलबे ने शुरुआत में लेंडे खोला नदी के रास्ते को रोककर एक अस्थायी बांध बना दिया था जिसमें पानी जमा हो रहा था. जब पानी का दबाव बढ़ा, तो ये प्राकृतिक बांध टूट गया और मलबे के साथ पानी तेज़ वेग के साथ नीचे की ओर बहने लगा. इस मलबे और पानी के बहाव के कारण सीमावर्ती भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों का जलस्तर महज आधे घंटे के भीतर लगभग 30 फीट तक ऊपर उठ गया. बाढ़ के पानी और मलबे की रफ्तार इतनी तेज थी कि इसने रास्ते में आने वाले गांवों, सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया. इससे 600 से ज्यादा मौतें हुई और ढाई हजार से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं. यह एक चेतावनी देता है".

DISASTER CHALLENGES FOR INDIA
इन चीजों को समझना जरूरी (ETV Bharat)

नॉर्थ ईस्ट राज्य सहित कई राज्य हाई रिस्क क्षेत्र मेंः वे कहते हैं कि "इसी तरह की परिस्थितियों को पहले से भांपने के लिए भारत सरकार ने दो साल पहले "मिशन मौसम" लॉन्च किया था. मिशन मौसम का उद्देश्य अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना और मौसम की सटीक जानकारी उपलब्ध करना है. इसी को लेकर भारत सरकार ने पिछले दो तीन सालों में हिमालय क्षेत्र में कई तरह के प्रयास किए हैं. अगर हम इंडियन हिमालय की बात करें तो जैसे हमारे नॉर्थ ईस्ट राज्य है, वह अति संवेदनशील इलाकों में आते हैं. बाकी जो हमारा हिमालय क्षेत्र है जिसमें जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड शामिल है वे भी हाई रिस्क क्षेत्र में आते हैं. यानी हम इस मामले में अति संवेदनशील क्षेत्र में ही पड़ रहे हैं."

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ग्लोबर वार्मिंग और उसके प्रभाव (ETV Bharat)

ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग मजबूत बनाना होगाः वे कहते हैं कि "सरकार ने ना सिर्फ सैटेलाइट मॉनिटरिंग को बढ़ावा दिया है, जिससे हम अगर कोई लेक बन रही है उसकी स्थिति पर नजर रख सकते हैं. वहीं हम ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग की भी बात कर रहे हैं. यानी हमें इसके जरिए देखना होगा कि जो लेक बनी है, वह कितनी बड़ी है, उसका फ्लो क्या है, जो हमारे जियो इन्फो है जैसे स्कोप और स्टेबिलिटी कैसी है, उसको लेकर भी काफी काम चल रहा है. उसके लिए कैमरों से लेकर फ्लो मॉनिटरिंग तक की जा रही है. इसको लेकर काफी प्रयास किए जा रहे हैं. यह प्रयास अग्रिम सूचना तंत्र को मजबूत करते हैं. यानी कि आपका जो फोरकास्ट का समय है वह कभी पांच मिनट का होता है. कभी वह आधा घंटा भी होता है, उसको हम और ज्यादा मजबूत करें ताकि हमें इस तरह की आपदा में इतना समय मिल जाए ताकि ज्यादा जानमाल की हानि न हो."

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इन सवालों पर काम जरूरी (ETV Bharat)

ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग से अर्ली वार्निंग सिस्टम होता है मजबूतः क्या आप मानते हैं कि हिमालय क्षेत्र में सैटेलाइट सिस्टम से ज्यादा मानवीय निगरानी ज्यादा फायदेमंद रहेगी? वे कहते हैं कि "जैसा कि मैने बताया पिछले दो तीन सालों में भारतीय मौसम विभाग और मिशन मौसम मिलकर एक नेटवर्क स्थापित कर रहे हैं जिसमें ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग को मजबूत किया जा रहा है. इसरो का जो सेटेलाइट बेस्ड सिस्टम और अन्य सेटलाइट सिस्टम है. उसमें भारत बहुत अच्छा परफॉर्म कर रहा है. लेकिन उसकी भी अपनी लिमिटेशन है. इसलिए ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग जो है वह हमारे अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करती है. इसी को फोकस करते हुए मिशन मौसम और इससे जुड़े अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत ने खुद को मजबूत करना शुरू कर दिया है".

ग्राउंड की रिस्क मैपिंग और जोनिंग होना बहुत जरूरी: इसके साथ वे कहते हैं कि " ग्राउंड की रिस्क मैपिंग और जोनिंग होना बहुत जरूरी है. अगर हम पिछले कुछ सालों का डाटा उठाकर देखते हैं तो कितनी लेक है, किसका कितना क्षेत्र बढ़ रहा है, कौन से ग्लेशियर है जो खतरनाक होते जा रहे हैं या जिनका क्षेत्र कम होता जा रहा है, इसके साथ ही कौन सा क्षेत्र लैंड स्लाइड वाला है, यह सभी फैक्टर रिस्क को समझने में मदद करते हैं, और उसको मैनेज करने में सहायता प्रदान करते हैं".

एशियन और यूरेशियन प्लेट्स काफी एक्टिव हैंः हिमालय युवा अवस्था में है और उसमें बदलाव होते जा रहे हैं, क्यों यह क्षेत्र हाई रिस्क जोन में आता है, और क्या हिमालय क्षेत्र में होता विकास कार्य (चाहे भारत और इससे जुड़े अन्य देशों ) का भी इसकी वजह है?. वे कहते हैं कि हिमालय क्षेत्र अपने आप में ही संवेदनशील क्षेत्र है. अगर हम देखें तो यह सिस्मिक जोन चार से पांच में आता है. यानी यहां पर भूकंप की संभावना ज्यादा बनी रहती है. हमें यह भी पता है कि एशियन और यूरेशियन प्लेट्स काफी एक्टिव हैं, यह इससे मामले को और संवेदनशील बनाता है.

बढ़ते तापमान से तेजी से पिघल रहे हैं ग्लेशियरः क्लाइमेट में हो रहे बदलावों से जो तापमान बढ़ता जा रहा है. उसकी वजह से हमारे ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे हैं. यह हमारी लिए बड़ी विपदा ला सकता है, क्योंकि जो सदियों से जमे हुए ग्लेशियर है वह भी अब पिघल रहे हैं. वहीं वे कहते हैं कि जो हमारा डेवलपमेंट मॉडल है, वह इको सेंसेटिव मॉडल के साथ होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो हमें उसकी निगरानी करनी होगी. हम क्षेत्र की स्थिति के हिसाब से विकास कार्य कर सकते हैं, लेकिन कई बार हम ब्लास्टिंग की भी मदद लेते हैं, इसके नुकसान से बचने के लिए हमें जिस क्षेत्र में विकास कार्य हो रहे हैं, उसकी भू संरचना को समझना जरूरी है. उसके मुताबिक हमें प्लानिंग करनी होगी.

सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल अपनाना होगाः वे कहते हैं कि मान लीजिए हमें पर्यटन को बढ़ावा देना है, हमें देखना होगा क्या हमें उसके लिए बड़े बड़े स्ट्रक्चर बनाने की जरूरत है, हम अपने पानी के स्रोतों को कैसे बचाएं ताकि स्थानीय जरूरतें पूरी हो. हमें रोड बनते हुए किस तरह काम करना है या टनल बनानी है उसकी मॉनिटरिंग को फोकस करना होगा. इसके साथ ही हिमालय का कृषि का जो सिस्टम है. वह सस्टेनेबल रहे उस पर ध्यान देना होगा. वहां की फसलें वह हो जो वहां के मौसम के मुताबिक हो और जो वहां के एनवायरमेंट के अनुकूल हो. ऐसी फसलें ना हो जो वहां के एनवायरमेंट को प्रभावित करती हो.

ग्लोबल ट्रीटी से पर्यावरण संतुलन में नहीं मिल रही ज्यादा मददः क्या आप मानते हैं कि बढ़ते तापमान, इससे तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को रोकने के लिए हमें इस क्षेत्र में ज्यादा काम करने की जरूरत है? वे कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु में होता परिवर्तन रियल थ्रेट है, सवाल यह है कि क्या हम जलवायु परिवर्तन को धीमा कर सकते हैं. उसके लिए ग्लोबल ट्रीटी है, क्योटो प्रोटोकॉल है, लेकिन हम उसको कम नहीं कर पा रहे हैं, आने वाले समय में हम देख रहे हैं कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो उससे बहुत विपरीत बदलाव होंगे.

वातावरण में नमी बढ़ने से मौसम में उथल-पुथल होता हैः वे कहते हैं कि "तामपान बढ़ने से हमारे वातावरण में नमी बढ़ती है और बहुत ज्यादा मौसम में उथल पुथल होती है. हमारे हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर इसी से प्रभावित हो रहे हैं. लैंडस्लाइड होना, ग्लेशियर का टूटना और उनकी झील बनना ऐसे में यह संभावित खतरे बने रहेंगे. ऐसे में हमें सस्टेनेबल डेवलपमेंट की जरुरत है, सस्टेनेबल फ्यूल का इस्तेमाल करें, इसके साथ ही हम अर्ली वार्निंग सिस्टम को बढ़ावा दें, इसके साथ ही हम लोकल लोगों को इस काम में शामिल करते हुए कम्युनिटी के साथ मिलकर हम समाधान पर काम करें, जो इन खतरों को कम कर सके.

अर्ली वार्निंग सिस्टम को एडवांस बनाना होगाः जैसे बात हो रही है चीन ने लेट रेस्पांस किया, क्या इस पर और काम करने की जरूरत है? वे कहते हैं कि मुझे इस पर ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन जो हमारे सतलुज और ब्रह्मपुत्र के वॉटर एग्रीमेंट थे, वे तीन और छह साल पहले एक्सपायर हो गए हैं. उस पर सरकार बातचीत कर रही है, आने वाले समय में इस पर पॉजिटिव रिजल्ट निकलकर जरूर आएगा. लेकिन अगर हमारे पास पानी का फ्लो, कितनी मात्रा में है, उसकी जानकारी अगर समय पर मिलती है तो वो हमारे अर्ली वार्निंग सिस्टम और उसकी प्रिडिक्शन को मजबूत करता है. भारत सैटेलाइट पर तो अच्छा है, वो अपनी ग्राउंड बेस्ड मॉनिटरिंग को बढ़ाकर खुद के अर्लिंग वार्निंग सिस्टम को और एडवांस कर सकता है.

आपदा के चरणों को समझना होगाः प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र की अपनी अलग बनावट होती है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण क्लाइमेट चेंज लगातार जारी है. इन दोनों कारण से दूसरे देश या पड़ोसी देशों में घटित होने वाले प्राकृतिक बदलाव या मानवजनित कारणों का असर किसी भी देश को झेलना पड़ सकता है. इन खतरों या आपदाओं को रोकना पूरी तरह संभव नहीं है. हां इन पर नजर रखकर इससे होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है तीन चरणों में तैयारी और उसपर क्रियान्वयन हो.पहला आपदा पूर्व का प्लान. दूसरा आपदा के समय का प्लान.आपदा के बाद का प्लान बनाना होगा और आपदाओं से निपटने के लिए हमें हमेशा तैयार रहना होगा.

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Last Updated : August 29, 2026 at 6:31 PM IST