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क्या भारत में भी मच सकती है नेपाल जैसी तबाही, हिमाचल से लेकर इन राज्यों में आ सकती है आपदा!

नेपाल में बाढ़ से भारी तबाही मची है. नेपाल की तरह ही भारत के कई राज्यों पर ये खतरा मंडराता है. रॉबिन शर्मा की रिपोर्ट

हिमालय में बनी ग्लेशियर झीलें बनी खतरा
ग्लेशियर झीलें बनी खतरा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : August 31, 2026 at 6:05 PM IST

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Updated : September 1, 2026 at 2:17 PM IST

10 Min Read
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शिमला: 26 अगस्त 2026, नेपाल के रसुवा ज़िले में भोटेकोशी नदी के पास ग्लेशियर झील बनी और फट गई. बोटेकोशी–त्रिशूली नदी तंत्र में विनाशकारी बाढ़, सैकड़ो लोगों की मौत, हज़ारों लापता हुए और सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं. कई लोगों की मौत हो चुकी है,जबकि कई अभी भी लापता है. इस घटना के बाद देश दुनिया ने देखा कि कैसे ग्लेशियर झीलें हिमालय के साथ लगते क्षेत्रों के लिए टाइम बम की तरह हैं, जो कभी भी फटने के बाद तबाही मचा सकती हैं.

प्रदेश में अस्थाई झीलों के निर्माण को लेकर स्टडी कर चुके राज्य सरकार में आपदा नियंत्रण के सलाहकार एवं हिमकोस्टे के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा के नेपाल की हालिया घटना में उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक ग्लेशियर का एक हिस्सा नीचे आया, जिससे पानी का बहाव अस्थायी रूप से बाधित हुआ. इसके बाद झील में पानी का दबाव बढ़ा और झील टूटने से अचानक बाढ़ और मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर आया. तापमान बढ़ने से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर तेजी से प्रभावित हो रहे हैं.

हिमाचल में तेजी से घट रहे ग्लेशियर
हिमाचल में तेजी से घट रहे ग्लेशियर (ETV Bharat)

ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रत्यक्ष और भयानक परिणाम

ये हादसा कोई साधारण प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि ग्लोबल वॉर्मिंग का प्रत्यक्ष और भयानक परिणाम है. बढ़ते तापमान के कारण हिमालय की ऊंचाइयों पर ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और चट्टानों व मलबे के बने प्राकृतिक बांधों के पीछे विशाल झीलें आकार ले रही हैं. देखने में बेहद शांत और सुंदर लगने वाली ये ग्लेशियर झीलें पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए 'टाइम बम' बन चुकी हैं. नेपाल हो, उत्तराखंड, सिक्किम या हिमाचल प्रदेश इन झीलों के फटने से उठने वाला जलप्रलय सीमाओं की परवाह किए बिना तबाही मचाता है. भारत भी इस तरह की त्रासदी अतीत में झेल चुका है.

  • 7 फरवरी 2021, भारत के उत्तराखंड राज्य चमोली जिले में नंदा देवी क्षेत्र में भूमि धंसाव से अस्थाई झील का निर्माण हुआ. अस्थाई झील फटी और ऋषिगंगा और धौलीगंगा में फ्लैश फ्लड, 200 से ज्यादा मौत या लापता, पब्लिक-प्राइवेट संपत्ति को भारी नुकसान.
  • 26 जून 2005, तिब्बत में बनी अस्थायी पारछू झील टूटने से सतलुज में भीषण फ्लैश फ्लड. हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और शिमला के पूर्वी हिस्सों में पुल, सड़कें, और बिजली परियोजनाएँ बुरी तरह से क्षतिग्रस्त. उपरोक्त तीन विनाशकारी घटनाओं का जिक्र किया गया है. तीनों घटनाएं अलग-अलग काल की हैं, लेकिन तीनो में एक सामान्य फैक्टर है. नदी बेसिन में अस्थाई झील का निर्माण हुआ और उसके टूटने से बड़े क्षेत्र में भयंकर तबाही हुई.

उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू कश्मीर में हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली कई नदियां प्रवेश करती हैं. इसके बाद ये नदियां पंजाब हरियाणा यूपी समेत कई राज्यों में प्रवेश करती है. ऐसे में इन ग्लेशियर्स के फटने से नदी बेसिन में बाढ़ का खतरा हमेशा रहता है. इसके दो उदाहरण ऊपर दिए गए हैं. क्या भारत के राज्यों में भी ये ग्लेशियर झीलें तबाही मचा सकती हैं. क्या ये हिमाचल की सीने में सोया हुआ एक टाइम बम है जो कभी भी फट सकता है. सतलुज जैसी नदियों के बेसिन में ग्लेशियर फटने का मतलब हिमाचल पंजाब में भारी तबाही होगी. इसका असर हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान पर भी होगा. क्योंकि सतलुज के बेसिन में भाखड़ा नंगल बांध है.

HIMCOSTE के अध्ययन के आंकड़े
HIMCOSTE के अध्ययन के आंकड़े (PIC CREDIT: HIMCOSTE)

महज़ चार वर्षों में बढ़ गईं करीब एक हजार झीलें

यहां चीन नेपाल बॉर्डर पर हुई तबाही ने हिमालयी राज्यों को भी चिंतित कर दिया है. हिमाचल जैसे पहाड़ी प्रदेश में ग्लेशियरों के बीच बन रही अस्थाई झीलें खतरे की घंटी बजा रही हैं. HIMCOSTE के अध्ययन में पाया गया है कि हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. सबसे ज्यादा चिंता सतलुज बेसिन को लेकर है, जहां 2,292 ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं. इनमें 49 झीलों का क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से ज्यादा है. ऐसे में इन बढ़ती झीलों की लगातार निगरानी और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना बेहद जरूरी माना जा रहा है. हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद यानी हिमकोस्टे (HIMCOSTE) के अध्ययन में सामने आया है कि सतलुज बेसिन में वर्ष 2020 में करीब 1,359 ग्लेशियर झीलें थीं. 2021 में इनकी संख्या बढ़कर 1,632 हुई और 2022 में 1,953 पर पहुंच गई. साल 2023 में झीलों की संख्या 2,292 हो गई.

प्रदेश में अस्थाई झीलों के निर्माण को लेकर स्टडी कर चुके राज्य सरकार में आपदा नियंत्रण के सलाहकार एवं हिमकोस्टे के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा बताते हैं यह अध्ययन लिस-4 सैटेलाइट के 5.8 मीटर रिजॉल्यूशन वाले डेटा से वर्ष 2023 की तस्वीरों के आधार पर किया गया है. इन 2,292 झीलों में 1,335 चीन अधिकृत तिब्बत, 470 स्पीति और 487 झीलें किन्नौर के खाब से नीचे हिमाचल में आने वाले सतलुज क्षेत्र में हैं. इनमें 51 झीलें 5 से 10 हेक्टेयर और 2,192 झीलें पांच हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाली हैं.

सतलुज बेसिन की स्थिति
सतलुज बेसिन की स्थिति (ETV Bharat)

सिर्फ सतलुज नहीं, दूसरे बेसिन भी प्रभावित

डॉ. एसएस रंधावा कहते हैं हिमाचल के चिनाब, ब्यास और रावी बेसिन में भी ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं. वर्ष 2019 के लिस-3 सैटलाइट डेटा के अनुसार चिनाब में 242, ब्यास में 93 और रावी में 38 झीलें चिन्हित की गई थीं. यानी तीनों बेसिनों में कुल 373 झीलें. अब चुनौती सिर्फ इन झीलों की गिनती तक सीमित नहीं है. यह पता लगाना जरूरी है कि किन झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है और कौन-सी झील प्राकृतिक रूप से अस्थिर है.

हिमाचल के तीन नदी बेसिनों की स्थिति
हिमाचल के तीन नदी बेसिनों की स्थिति (ETV Bharat)

हिमाचल में भी तेजी से घट रहे ग्लेशियर

डॉ. एसएस रंधावा के मुताबिक वर्ष 2001 से 2017 के बीच चिनाब बेसिन के ग्लेशियरों में करीब 5.48 प्रतिशत, ब्यास में 7.03 प्रतिशत, रावी में 4.69 प्रतिशत और बास्पा क्षेत्र में करीब 6.52 प्रतिशत कमी दर्ज की गई. ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके सामने जमा मोरेन मलबा पानी को रोक सकता है. इससे प्राकृतिक बांध जैसी स्थिति बनती है और धीरे-धीरे ग्लेशियर झील का आकार बढ़ सकता है.

हिमाचल में नदी बेसिनों की स्थिति
हिमाचल में नदी बेसिनों की स्थिति (PIC CREDIT: HIMCOSTE)

गीपांग झील का क्षेत्रफल 27 से 110 हेक्टेयर हुआ

लाहौल-स्पीति के सिस्सू के पास चिनाब बेसिन में स्थित गीपांग झील इसका बड़ा उदाहरण है. वर्ष 1975 में इसका क्षेत्रफल करीब 27 हेक्टेयर था, जो अब लगभग 110 हेक्टेयर हो गया है. इसकी औसत गहराई करीब 36 मीटर बताई गई है. यदि प्राकृतिक बांध कमजोर हुआ और भूस्खलन, हिमस्खलन या भूकंप जैसी घटना हुई तो झील टूटने से पानी और मलबे का तेज बहाव उदयपुर क्षेत्र से होते हुए जम्मू-कश्मीर तक असर डाल सकता है.

सांगला की यारपाबंग झील पर भी नजर

किन्नौर की सांगला घाटी में देबार कंडे की यारपाबंग झील का क्षेत्रफल भी बढ़ रहा है. ये झील करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी है. स्थानीय लोगों को आशंका है कि भूकंप या बाढ़ जैसी स्थिति में झील टूटने पर बस्पा और सतलुज नदी के आसपास के क्षेत्रों में भारी नुकसान हो सकता है. इसी वजह से सुरक्षा के लिए प्रशासन से आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है.

भारत चीन के क्षेत्र में हिमालय की स्थिति
भारत चीन के क्षेत्र में हिमालय की स्थिति (ETV Bharat)

चार झीलें सबसे ज्यादा संवेदनशील

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमाचल की चार झीलों को सबसे संवेदनशील माना है. इनमें कुल्लू की वासुकी झील, लाहौल-स्पीति की गीपांग झील, किन्नौर की बास्पा झील और सतलुज बेसिन की काशंग गाड़ स्थित कलका झील शामिल हैं. गीपांग झील का क्षेत्रफल करीब 92.09 हेक्टेयर, बास्पा झील का 18.88 हेक्टेयर और कलका झील का करीब 27.89 हेक्टेयर है. बास्पा झील करीब 15,465 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. इन झीलों की निगरानी के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं.

सबसे संवेदनशील झीलें
सबसे संवेदनशील झीलें (ETV Bharat)

सतलुज पहले भी दिखा चुकी है अपना रौद्र रूप

सतलुज बेसिन में बड़ा खतरा पहले भी सामने आ चुका है. 31 जुलाई और 1 अगस्त 2000 की बाढ़ में नदी का जलस्तर सामान्य से करीब 60 फीट ऊपर पहुंच गया था. करीब 200 किलोमीटर एनएच-22 प्रभावित हुआ, 20 पुल और 22 झूले बह गए थे. इस आपदा में 135 लोगों की मौत हुई और करीब 1,466 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. इसके बाद 26 जून 2005 को तिब्बत में पारछू झील टूटने से सतलुज में फिर बाढ़ आई. वांगतू से समदो के बीच करीब 10 किलोमीटर एनएच-22 बह गया. 10 पुल और 11 रोपवे तबाह हुए और सरकारी और सार्वजनिक संपत्ति को करीब 610 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

अर्ली वार्निंग ने 2006 में बचाई जानें

डॉ. रंधावा के मुताबिक पारछू झील से जुड़ी स्थिति में निगरानी और अर्ली वार्निंग व्यवस्था कारगर साबित हुई. जल बहाव में बदलाव का पता चलते ही डाउनस्ट्रीम प्रशासन को सूचना दी गई और लोगों को समय रहते सतर्क किया गया. इससे बड़ी जनहानि को टाला जा सका, हालांकि बुनियादी ढांचे को करीब 600 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

बदलता मौसम भी बढ़ा रहा जोखिम

डॉ. रंधावा ग्लेशियरों के लिए बदलते बर्फबारी पैटर्न को भी चिंता का कारण मानते हैं. उनका कहना है कि दिसंबर-जनवरी के बजाय अब मार्च-अप्रैल में भी ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी देखने को मिल रही है. देर से गिरने वाली बर्फ जल्दी पिघलती है, जिससे ग्लेशियरों का मास बैलेंस प्रभावित होता है. ग्लेशियर झीलें दो प्रमुख तरीकों से बन सकती हैं. एक, ग्लेशियर में मोरेन मलबे के पीछे पानी जमा होने से और दूसरी, ग्लेशियर की बॉडी के भीतर बर्फ पिघलने से बनने वाली सुपर-ग्लेशियल झील. भूकंप, हिमस्खलन, भूस्खलन से या ग्लेशियर का हिस्सा इन झील में गिरने से प्राकृतिक बांध कमजोर हो सकता है और अचानक बाढ़ आ सकती है. नेपाल में बाढ़ आने का भी यही कारण था.

16 झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत

डॉ. रंधावा के अनुसार हिमाचल की प्रमुख नदियों के बेसिन में करीब 16 ग्लेशियर झीलें ऐसी हैं, जिन्हें संभावित रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। कई झीलों का आकार पिछले तीन दशकों में करीब 44 प्रतिशत तक बढ़ा है. इसलिए अप्रैल से अक्टूबर के बीच नियमित निगरानी की जरूरत बताई गई है. ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में हर झील तक पहुंचना संभव नहीं है, इसलिए सैटेलाइट डेटा अहम भूमिका निभा सकता है.

सरकार कर रही चार झीलों का विस्तृत अध्ययन

सिक्किम में 2023 में ग्लेशियर झील टूटने की घटना के बाद हिमाचल में भी संवेदनशील झीलों को लेकर काम तेज किया गया है. सरकार चार झीलों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है. इसमें झीलों की गहराई, पानी की मात्रा और संभावित बाढ़ के प्रभाव का आकलन किया जा रहा है.

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Last Updated : September 1, 2026 at 2:17 PM IST