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पतझड़ की तरह बिखर गई नक्सलवादी विचारधारा, जो बचे उनका वजूद खत्म, बस्तर और युवाओं के विकास का करें काम: डीएम अवस्थी, पूर्व डीजीपी

पूर्व डीजीपी ने कहा, माओवादियों के पास अब सरेंडर करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा.

DM Awasthi former DGP
सफल हो रही सरकार की रणनीति (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : October 18, 2025 at 8:13 PM IST

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Updated : October 18, 2025 at 8:22 PM IST

18 Min Read
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भूपेंद्र दुबे की रिपोर्ट

रायपुर: छत्तीसगढ़ में 210 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के बाद नक्सली उन्मूलन को लेकर चर्चा तेज हो गई है. अब ये कयास तेज है कि क्या छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का खात्मा हो जाएगा. नक्सली अब जंगल से बाहर आ रहे हैं. हालांकि जिस तैयारी को अब परिणाम के तौर पर देखा जा रहा है, इसके लिए जब छत्तीसगढ़ को तैयार करना था तो जिन लोगों ने इसकी तैयारी की, उसमें से छत्तीसगढ़ के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और पहले नक्सल ऑपरेशन पर काम करने वाले डायरेक्टर जनरल डीएम अवस्थी ने इस पूरे घटनाक्रम पर बात करते हुए कहा, जिस तरीके की कार्रवाई हुई है और जितने नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, यह भारत की इतिहास में अंकित होने वाली तारीख है.

सवाल: जिस तरीके से नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया उसे आप कैसे देखते हैं ?

जवाब: जो आत्मसमर्पण हुआ है वह ऐतिहासिक है. देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब इतनी बड़ी संख्या में नक्सलियों ने अपने हथियार के साथ आत्मसमर्पण किया हो. हम लोगों ने जब नक्सलवाद के खिलाफ भारत सरकार और राज्य सरकार के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाए थे तो हम लोगों ने यह नहीं सोचा था. हम लोगों ने माना ही नहीं था कि एक दिन ऐसी भी सुबह आएगी जब इतने सारे नक्सली कैडर एक साथ आत्मसमर्पण करेंगे. एक साथ पूरी की पूरी टीम का सरेंडर हो जाएगा. मैं मानता हूं यह ऐतिहासिक और नक्सली की घटना में महत्वपूर्ण तारीख है.

सफल हो रही सरकार की रणनीति (ETV Bharat)

सवाल: गढ़चिरौली के बाद अब छत्तीसगढ़ में जिस तरह से माओवादियों ने हथियार डाले हैं इसके पीछे की वजह डर है या कुछ और. क्या नक्सली ये मान चुके हैं कि अब आगे उनके लिए खतरा बढ़ रहा है ?

जवाब: मुझे ऐसा लगता है कि यह जो रणनीति नक्सलवाद के खिलाफ भारत सरकार की पिछले 10 सालों में रही वो कारगर है. इनको खत्म करने के लिए मोदी जी की सरकार बनने के बाद बहुत सारे एफर्ट किए गए हैं. खास तौर से छत्तीसगढ़ को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कई प्रभावी काम और फैसले लिए हैं. अमित शाह लगातार इस दिशा में काम भी कर रहे हैं. मेरी कई बार उनसे मीटिंग हुई है, जिस पर उन्होंने कड़ी समीक्षा की और 31 मार्च 2026 तक की डेट माओवाद के खात्मे की रखी. जब उन्होंने डेट रखी तो किसी ने सोचा नहीं था कि ऐसा संभव होगा. यह न तो नक्सली मानते थे ना सुरक्षा एजेंसी भी मानती थी. मैंने कई बार इस चीज को कहा है. नक्सली समस्या और उसके खात्मे को लेकर यह वास्तव में सरकार प्रभावी रणनीति के तहत काम कर रही है. जिस तरीके से सुरक्षा एजेंसियों ने काम किया है उसी डर से आज यह स्थिति बनी है. उनके पास बचने का कोई रास्ता बचा ही नहीं है इसलिए आत्मसमर्पण कर रहे हैं. अब उन्हें अपनी जान बचाने के लिए मुख्यधारा में आना पड़ रहा है.

सवाल: नक्सलियों का जो समर्पण हुआ है क्या यही इनकी अंतिम संख्या बल है क्योंकि अभी भी एक ऐसा नक्सलियों का गुट है जो आत्मसमर्पण के पक्ष में नहीं है?

जवाब: यह बात मीडिया में आ रही है कि माओादियों का एक गुट सरेंडर करने को लेकर सहमत नहीं है. यह बहुत बड़ा संगठन था. बहुत बड़ा डोमिनेंस था. अपना जो दंडकारण्य का क्षेत्र है उसे पूरा उन्होंने कब्जे में कर रखा था, और इसी के दम पर भी पूरे देश में और देश के बाहर धाक जमाए हुए थे. नक्सली कहते थे कि हमारे पास लिब्रेटेड जोन है. यह हमारा एरिया है और यहां कोई कुछ नहीं कर सकता है. नक्सलियों ने हमें नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. जिस तरीके से उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों पर हमले किए हैं, राजनीतिकों पर हमले किए हैं उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. उनका डोमिनेंस बढ़ता गया. जिन इलाकों पर उनका कब्जा था आज वहां सुरक्षा बलों का कब्जा है. अब उनके लिए जगह बची ही नहीं तो आगे क्या करेंगे. अब जो नक्सली बचे हैं उन्हें देर सबेर आत्मसमर्पण की दिशा में जाना ही पड़ेगी. नहीं तो सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे हैं अभियान में उनको न्यूट्रलाइज कर दिया जाएगा. मैं समझता हूं कि जो हथियारबंद नक्सली हैं उनका कोई कैडर बचा है. बंदूक के सहारे जो सत्ता चलाई जा रही थी अब उसका वजूद नहीं बचा है. क्योंकि जिस तरीके से इलाके दर इलाके खाली हो रहे हैं. बस्तर के बाद कांकेर और उसके ऊपर का जो इलाका है नारायणपुर या उसके अलावा गढ़चिरौली. कहीं भी उनके लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं बची. उनकी कुछ संख्या अभी हो सकती है लेकिन जो लीडरशिप थी वो नहीं बची. इनका वजूद और आधार दोनों खत्म हो चुके हैं.

सवाल: रूपेश ने ईटीवी भारत से कहा था कि मैं संगठन को 6 करोड़ देकर आया हूं. यह 6 करोड़ लेकर संगठन को चलाने के लिए अब कौन बचा होगा ?

जवाब: नक्सलियों का हिसाब किताब बहुत साफ सुथरा होता है. जिस एरिया में यह होते हैं उसमें उनका हिसाब बहुत बढ़िया होता है. हर इलाके में जो ठेकेदार होते हैं, काम करने वाले लोग होते हैं, उनके वसूली का एक पैटर्न बना हुआ है और उसका वह हिसाब किताब रखते हैं. केंद्रीय संगठन को भी उसका पैसा भेजते हैं. हम लोगों ने छापेमारी में उनकी बहुत सारी डायरियां बरामद की हैं. कई बार जांच में हम लोगों ने भी पाया कि कुछ नक्सलियों ने पैसे का गोलमाल किया. रुपेश जिस पैसे को छोड़कर आने की बात कर रहे हैं उसमें कई लोग ऐसे होंगे जो उस पैसे का हिसाब किताब रखेंगे.

सवाल: इनके फंडिंग को देखा जाए तो बालू से इनको जो पैसा मिलता था उसे फोर्स ने बंद कर दिया. ठेकेदारों से पैसा मिलना बंद हो गया. जंगल से कोई वसूली नहीं कर पा रहे हैं. वसूली का इनका जो स्ट्र्क्चर था वो पूरी तरह से खत्म हो गया ?

जवाब: इनकी आर्थिक संरचना का ही ध्वस्त होना इसके बिखरने का सबसे बड़ा कारण है, इनके ऊपर हमले हो रहे हैं, उनके पास हथियार खरीदने के पैसे नहीं हैं. इनके पास गोली खरीदने का पैसा नहीं है. रसद खरीदने के लिए उनके पास पैसा नहीं है. यह हर जगह पर आतंक का वातावरण बनाकर चलते थे. दूसरे एरिया की मीटिंग में भी जाते थे. लगातार उस एरिया में घूमने के कारण उनके डर का वातावरण बना रहता था. इस तरह की परिस्थितियों को लेकर जिस तरीके के डायनामिक उन्होंने बना रखे थे वह खत्म होते जा रहे हैंं. यही वजह है कि उनके पास कोई और रास्ता बच नहीं. वित्तीय संरचना पूरी तरह से नक्सलियों की खत्म हो चुकी है.

सवाल: 210 नक्सलियों के समर्पण के बाद कई जगह SP को पत्र मिल रहे हैं. गरियाबंद में भी इस तरह का पत्र आया है. क्या माना जाए कि पूरा संगठन बिखर चुका है ?

जवाब: इससे पहले भी ईटीवी के साक्षात्कार में हमने यह कहा था की बसवराजू के मारे जाने के बाद अब संगठन में बिखराव होगा. मैंने आपको यह कहा था कि एक समय आएगा जब बसंत के पतझड़ के पत्तों की तरह यह बिखर जाएंगे. आज वह समय आ गया है जब नक्सलियों में इस तरह का भय दिख रहा है. इधर एक आत्मसमपर्ण कर रहा है, सुजाता ने सरेंडर किया उसके बाद भूपति का सरेंडर हुआ फिर रूपेश का सरेंडर हुआ और उसके बाद एक दो नक्सली कमांडर मारे गए. अब यह बिल्कुल तय है कि नक्सली पूरे तौर पर लड़ाई हार चुके हैं. नक्सलियों का पूरा मनोबल ही टूट चुका है. सुरक्षा बल उन पर भारी पड़ रहे हैं. सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति का यह नतीजा है. यह साफ तौर पर उनसे कहा गया है कि अगर आप मान जाएं तो ठीक है अगर आप नहीं मानते हैं तो कार्रवाई होगी. इसमें कोई इफ एंड बट की स्थिति नहीं है. कार्रवाई की बिल्कुल क्लियरटी है. मैं मान रहा हूं कि जो लोग सुकमा और बीजापुर में नक्सली कमांडर हैं और जिन लोगों ने समर्पण नहीं किया है अगर वह सरेंडर कर गए तो समझ लीजिए कि इस क्षेत्र में नक्सलियों का नाम लेने वाला कोई नहीं होगा. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना के एरिया में नक्सली बचेगा ही नहीं.

सवाल: एक और चुनौती सुरक्षा एजेंसियों के सामने आ रही है कि जो शहर में अर्बन नक्सली घूम रहे हैं. हाल के दिनों में रायपुर से कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं इसे कैसे देखते हैं ?

जवाब: अर्बन नक्सली बड़ी चुनौती हैं और यह रहेगी भी. इसके दो प्रमुख कारण हैं. जब सुरक्षाबलों ने नक्सलियों का आत्मसमर्पण कराकर उनको समाज की मुख्यधारा में लाया गया. अब वह खेती करें या नौकरी करें. पुलिस की नौकरी करें तो एक तरह से अंडरग्राउंड से वह ओवर ग्राउंड हो गए. उसके अलावा वह घूमेंगे शहर में, घूमेंगे गांव में, घूमेंगे लोगों से मिलेंगे तो कुछ ऐसे लोग हैं जो इस विचारधारा में रहेंगे. सामान्य जो अपराधी होते हैं वह कुछ अन्य प्रभाव में आकर भी तरह-तरह की घटनाएं करते हैं. तो यह माना जाना चाहिए की कुछ परसेंट ऐसा है जो अंडरग्राउंड बैटल से अब यह मुख्य धारा में गए हैं जो कि शहरों में उनके बहकावे में आ जाएं या कुछ और करें. इसके लिए पुलिस को सजग रहना बेहद महत्वपूर्ण है. इंटेलिजेंस को बहुत सजग रहने की जरूरत है चाहे वह केंद्र की हो चाहे राज्य की हो. कुछ समय तक इनपर बहुत तगड़ी वॉच रखनी होगी.

सवाल: अर्बन नक्सल को ठीक करने के लिए दिल्ली से भी कहा जाता है. कौन से ऐसे पैरामीटर हैं जिन पर कड़ी निगरानी अब रखने की जरूरत है. यहां से कुछ चीज रिवर्स भी हो सकती है ?

जवाब: रिवर्स होने की स्थिति अब नहीं है. वैसी स्थिति नहीं है जो पहले होती थी. जो सिस्टम खड़ा किया गया और जो खड़ा हुआ था उसे नक्सलियों ने बहुत मेहनत से बनाया था. 80 के बाद से लगातार मेहनत करते-करते नक्सली इसे खड़ा कर पाए. इन लोगों ने 200 के आसपास जिले का देशव्यापी संगठन खड़ा कर लिया था. नक्सली उसे वो डोमिनेट करते थे. वह केवल विचारधारा के बल पर नहीं था. लेकिन उसके बाद गोरिल्ला आर्मी में इसे जगह दिया और उसकी विचारधारा और पनपी और इसे सपोर्ट करने के लिए अर्बन नक्सली बहुत हद तक काम करने लगे. उनकी विचारधारा लैंड रिफॉर्म्स की थी लेकिन अब वह नहीं है. स्कूल तोड़ना गांव वालों को मारना यह विचारधारा पूरे तौर पर अलग है. इनके डिफाइंड शब्द थे, सामंती प्रथा और जमींदारी प्रथा. लेकिन जिस क्लास को इन लोगों ने टारगेट किया, जो पुलिस बल है, जो शिक्षक है या गांव वाले हैं इसमें तो कोई सामंती नहीं हैं यह तो आम लोग हैं, आप लोगों के घर के हैं. मुझे यह नहीं लगता कि रिवर्ट करके इस तरह का संगठन खड़ा करेंगे. उसमें बहुत समय लगेगा अब खड़ा कर पाना आसान नहीं है. देश की परिस्थितियों बदल गईं हैं. समाज की परिस्थितियां बदल गईं हैं. लोगों की विचारधारा में बदलाव आ गया है. हो सकता है कि लॉ एंड ऑर्डर के फॉर्म में कुछ कर सकते हैं, थोड़ा हिंसक हो सकते हैं. इसका स्वरूप बदलने की कोशिश अर्बन विचारधारा वाले जरूर कर सकते हैं लेकिन जिस तरीके से जंगल में यह चीज थी अब वह संभव नहीं है.

सवाल: आत्मसमर्पण के समय ईटीवी भारत से बात करते हुए केंद्रीय कमेटी के सदस्य रूपेश ने यह कहा था कि पांचवी और छठी अनुसूची को ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है. क्योंकि जमीनों का हक जबरन छीना जाता है और गरीब इसमें कुछ कर नहीं पाते ?

जवाब: मार्क्स और लेनिन की अगर विचारधारा को आप मानते हैं, अगर हम माओ को देखें तो पूरी विचारधारा कैपटलिज्म के खिलाफ थी. किसी भी प्रकार के पूंजीवाद को एक समान करना इसका मुख्य सोच का मुद्दा था. लेकिन क्या चीन ने जिस तरह से अपने आप को डेवलप किया है, अमेरिका के सामने वह चुनौती के तौर पर खड़ा हो रहा है. वह लेनिन और मार्क्स के विचारधारा के तहत नहीं है. क्योंकि पूंजीवाद की विचारधारा इसलिए जरूरी नहीं है कि अगर किसी एरिया का विकास करना चाहते हैं तो वहां पूंजी की जरूरत पड़ेगी. केवल एग्रीकल्चर इसका आयाम नहीं हो सकता. एग्रीकल्चर एक बहुत बड़ा आधार है लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलप करने के लिए ऐसी चीजों की जरूरत पड़ेगी. हमें इंडस्ट्री चाहिए, स्कूल चाहिए, माइनिंग चाहिए, हॉस्पिटल चाहिए. लेकिन सभी चीजों का एक सही ढंग से उपयोग होना चाहिए. इकोलॉजिकल इंबैलेंस नहीं होना चाहिए.

सवाल: नक्सलियों ने जमीन के पहलू को उठाकर इस आंदोलन को शुरू किया था. उसका एक पहलू आत्मसमर्पण के दौरान रूपेश फिर छोड़ कर चले आए. क्या वह आधार को मजबूत कर सकता है ?

जवाब: यह प्रश्न बहुत सही है. समर्पण के समय यह मुद्दा उछाल भी दिया गया है. नक्सलवाद के पैदा होने की वजह लोगों के बीच फिर से दिया गया है. लेकिन मुझे लगता नहीं है कि सरकार की जो विकास नीति है इस इलाके में ऐसा फिर होगा. केंद्र सरकार सिर्फ माओवादियों के नंबर को नहीं खत्म कर रही है. उसके पीछे के बैकग्राउंड में यह है कि जब एरिया खाली होगा तो वहां हम क्या करेंगे. वहां किस तरह का हम विकास करेंगे. उसको कैसे डेवलप करेंगे. मुख्यधारा में लाने का प्रयास है उसको छोड़ने का प्रयास नहीं है. इसलिए इनका जो पहलू है उसमें बहुत काम नहीं है, यह खत्म होने दीजिए उसके एक-दो साल बाद इस एरिया को देखिएगा पहचान में नहीं आएगा. सबसे बड़ी बात है कि जब लोग ही उनके साथ नहीं जुड़ेंगे तो फिर इनकी कुछ करने की हैसियत नहीं रहेगी.

सवाल: बस्तर को विकसित करने के लिए कौन से मॉडल हो सकता जिसे तत्काल शुरू कर दिया जाए. जिससे स्वास्थ्य के आधार पर शिक्षा के आधार पर थोड़ा सा ज्यादा मजबूत किया जा सकता है ?

जवाब: मैंने बस्तर में लंबे समय तक काम किया है. जब जोगी जी का समय था उसे समय मैं बस्तर में काम करता था. छत्तीसगढ़ बनने के बाद छत्तीसगढ़ में कोई भर्ती हुई थी तो व कांस्टेबल की भर्ती हुई थी जो दंतेवाड़ा की पुलिस बटालियन के लिए किया गया था. मैं वहां भर्ती करने गया था. वहां पर हमने देखा था किस तरीके से लोग रिक्रूटमेंट के लिए आ रहे थे. उसके बाद में विभिन्न पदों पर रहा आईजी इंटेलिजेंस रहा जिस तरीके से वहां पर गरीबी है, जिस तरीके से वहां छोटी-मोटी चीजों पर केंद्रित उनका जीवन गुजर जाता है, वहां पर सचमुच में एक मॉडल लेकर जाना होगा. ट्राइबल लोगों को क्या चाहिए उसे लेकर वहां जाना पड़ेगा. इलाके की अपनी जरूरत होती है. हर जगह अपने तरीके से चीजें चलाई जाती हैं. अगर बस्तर के बाद आप तेलंगाना की तरफ देखेंगे तो हरी मिर्च की खेती बहुत जबरदस्त होती है. लेकिन सड़क के दूसरी तरफ वह नहीं होता है. एक तरफ सड़क का जो काम होता है वह दूसरी तरफ नहीं होता है. सड़क के दूसरी तरफ जाने से अर्थव्यवस्था इस कदर नहीं बदल जाती, क्योंकि तापमान वही है और मौसम भी वही है. तो यह समझना पड़ेगा कि वहां की जरूरत क्या है. वहां उसी तरह एग्रीकल्चर को डेवलप करने की जरूरत है. वहां पर इंडस्ट्रीज भी लगाने की जरूरत है जो लोगों को रोजगार दे. एक इंडस्ट्री लगने से कई तरह के रोजगार मिल जाते हैं. लोगों को काम चाहिए और लोगों को काम देना पड़ेगा. जहां से हम नक्सलवाद को खाली कर रहे हैं वहां पर जिला प्रशासन को फॉरेस्ट को और पुलिस को पूरी पारदर्शिता के साथ रात दिन काम करना पड़ेगा ताकि उसे एरिया का विकास हो सके.

सवाल: छत्तीसगढ़ ने 25 साल पूरा कर लिए हैं. 26वेंं साल में जा रहा है. आपने छत्तीसगढ़ को प्रशासनिक नजरिया से देखा है. छत्तीसगढ़ का युवा आज जहां खड़ा है युवाओं का नजरिया उनके लिए कौन योजना और चलना चाहिए, खास तौर से अगर बस्तर को हम देखें ?

जवाब: अभी-अभी आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू जी ने गूगल के साथ एक एमओयू किया है और एक डेटाबेस सेट हो रहा है. एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो आंध्र प्रदेश के लिए है. देश का जो साइंटिफिक यूथ है जो मान रहा है कि हिंदुस्तान में यह कहीं नहीं था यह केवल यूनाइटेड स्टेट में था अब इस प्रकार के काम की जरूरत छत्तीसगढ़ में है. अब हमारे यूथ को केवल सरकारी नौकरियों की सोच नहीं रखें, यूथ को बदलना होगा. सब लोग टीचर बनेंगे सब लोग पटवारी बनेंगे सब लोग पब्लिक सर्विस कमीशन देंगे सिर्फ यही तक इसे सीमित नहीं रखना है. जरुरत है कि सरकार के प्रयास से ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप किया जाए. छत्तीसगढ़ में पर्याप्त जगह है. बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज को यहां लाना चाहिए. जो लोकल यूथ है यहां का उसके अंदर एक मोटिवेशन पैदा होगा. यूथ जो बंगलुरु और हैदराबाद, पुणे भाग रहे हैं उनको मोटिवेट करना होगा. उनके लिए यहां पर रोजगार खड़े करने होंगे. सरकार अगर ऐसा करेगी तो निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ का विकास होगा. छत्तीसगढ़ के विकास के लिए एक डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने की जरूरत है. हर एरिया के अनुसार प्लान बनाने की जरूरत है. हम रायपुर के आसपास क्या कर सकते हैं, सरगुजा के आसपास क्या कर सकते हैं. बिलासपुर के आसपास क्या कर सकते हैं और बस्तर के आसपास क्या कर सकते हैं जो जरुरी है. इस प्रकार के डिटेल प्लानिंग की जरूरत है और उसका एग्जीक्यूशन भी हो ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

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Last Updated : October 18, 2025 at 8:22 PM IST