राष्ट्रीय खेल दिवस : मंदिर के छोटे से हॉल से निकल रहे जूडो के 'धुरंधर', सुशील ढाई दशक से तराश रहे प्रतिभाएं
राष्ट्रीय खेल दिवस पर पढ़िए ऐसे कोच की कहानी, जो ढाई दशक से बच्चों को निशुल्क में जूडो सिखा रहे हैं. कपिल पारीक की रिपोर्ट.

Published : August 29, 2026 at 1:46 PM IST
उदयपुर : ये है उदयपुर का छोटा सा जूडो सेंटर, जहां किसी बच्चे के पास संसाधन नहीं तो किसी के पास महंगी खेल अकादमी की फीस नहीं है, लेकिन हर बच्चे के पास एक सपना है देश के लिए पदक जीतने का. शहर के सज्जनगढ़ रोड स्थित सज्जन बालाजी हनुमान मंदिर के एक छोटे से हॉल में सुबह-शाम जूडो की पाठशाला लगती है. यहां मैट सीमित हैं, जगह छोटी है और सरकारी मदद भी नहीं मिलती, लेकिन बच्चों के सपने अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के हैं. कोच सुशील सेन इन्हीं बच्चों को जूडो का निशुल्क प्रशिक्षण देकर तराशने में लगे हैं.
सुशील सेन की कहानी : सुशील सेन खुद सरकारी स्कूल में शारीरिक शिक्षक हैं. स्कूल की ड्यूटी के बाद वे अपना समय बच्चों को जूडो सिखाने में लगाते हैं. सुबह 5 से 8 बजे और शाम 4.30 से 8.30 बजे तक वे बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं. प्रतियोगिताओं के समय बच्चों के लिए अतिरिक्त अभ्यास भी कराया जाता है. कोच सुशील सेन बताते हैं कि उन्होंने बचपन में जूडो खेलना शुरू किया था. स्कूल में होने वाली जूडो प्रतियोगिताओं को देखकर उनकी रुचि इस खेल में बढ़ी. उनका बेस कुश्ती रहा, लेकिन उन्हें कुश्ती और जूडो की कई तकनीकें समान लगीं. सुशील ने पहली बार स्कूल स्तर की जूडो प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पहले ही प्रयास में राज्य स्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय और मास्टर इवेंट में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिस्सा लिया. खुद खिलाड़ी बनने के बाद उनके मन में विचार आया कि उन्हें जो सीख मिली है, वह आगे बच्चों तक पहुंचाई जाए.
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ये सोच धीरे-धीरे मिशन में बदल गई : इसी सोच को जमीन पर उतारते हुए सुशील ने बच्चों को निशुल्क जूडो का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया. सुशील बताते हैं कि उनकी ओर से प्रशिक्षित किए गए 200 से ज्यादा बच्चे राज्य स्तर पर, 50 से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. उनके खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर 15 से अधिक पदक जीत चुके हैं, जबकि राज्य स्तर पर 100 से ज्यादा पदक उनके खाते में हैं. उनकी ओर से प्रशिक्षित खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. इनमें ग्रामीण, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी शामिल हैं. सुशील कहते हैं कि उनके लिए बच्चे की आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और मेहनत महत्वपूर्ण है. जिसके अंदर आगे बढ़ने की लगन होती है, उसे प्रशिक्षण और अवसर देने का प्रयास किया जाता है.

सफाई कर्मचारी की बेटी सोनाक्षी ने बनाई पहचान : सुशील के सिखाए हुए बच्चों में 15 वर्षीय सोनाक्षी पंडित सरकारी स्कूल की छात्रा भी शामिल हैं. उनके पिता जगदीश पंडित नगर निगम में सफाई कर्मचारी हैं. सोनाक्षी ने महज 9 साल की उम्र से जूडो प्रशिक्षण लेना शुरू किया. सीमित संसाधनों के बावजूद उसने पढ़ाई के साथ नियमित अभ्यास जारी रखा और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया. अब दिसंबर में ब्राजील में होने वाली अंतरराष्ट्रीय स्कूल प्रतियोगिता के लिए भारत की संभावित टीम में सोनाक्षी का नाम शामिल है.

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अभाव के जीवन में भी पदक जीतने का सपना : दिव्या पंवार की कहानी संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की मिसाल है. उसके पिता निजी अस्पताल में सफाई कर्मचारी हैं और मां गृहिणी हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर रही कि कई बार घर में रोटी बनाने के लिए आटा तक नहीं होता था. प्रतियोगिता की फीस जुटाने के लिए मां को गहने तक बेचने पड़े. दिव्या ने पांच साल की उम्र में जूडो का प्रशिक्षण लेना शुरू किया. कोच सुशील सेन के मार्गदर्शन में रोजाना कई घंटे अभ्यास किया और राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते. राष्ट्रीय सब जूनियर जूडो प्रतियोगिता और गोवा की वेस्ट जोन वुमन लीग में भी उन्होंने रजत पदक हासिल किया. वर्तमान में वह भोपाल स्थित साई सेंटर में प्रशिक्षण ले रही हैं और उनका सपना देश के लिए अंतरराष्ट्रीय पदक जीतना है. दिव्या के चारों भाई-बहन जूडो खिलाड़ी हैं.

जंगल की झोपड़ी से नेशनल तक पहुंचा मुकेश : उदयपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर डोडावली ग्राम पंचायत के पीपलिया गांव का 13 वर्षीय आदिवासी खिलाड़ी मुकेश मीणा भी इसी जूडो पाठशाला से पहचान बना रहे हैं. जंगल और पहाड़ियों के बीच रहने वाले मुकेश के घर में बिजली तक नहीं है. सड़क और खेल सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं. माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. मुकेश ने स्कूल में जूडो खेलते बच्चों को देखा तो खुद खिलाड़ी बनने की ठान ली. सुविधाएं नहीं मिलीं तो झोपड़ी में ही दरी और गद्दे बिछाकर अभ्यास शुरू कर दिया. शिक्षक किशन सोनी ने उसकी प्रतिभा पहचानी और उसे आगे बढ़ने का मौका मिला. सुशील सेन के प्रशिक्षण में मुकेश ने राष्ट्रीय स्तर तक सफर तय किया और स्कूल नेशनल में स्वर्ण व रजत पदक जीते.

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अपनी सैलरी और सहयोग से चल रही पाठशाला : यह जूडो सेंटर किसी बड़े बजट या सरकारी अनुदान से नहीं चल रहा. सुशील सेन अपनी सैलरी से बच्चों के प्रशिक्षण का खर्च उठाते हैं. उनकी ओर से प्रशिक्षित खिलाड़ी आज राजकीय सेवा में हैं, वे भी सहयोग करते हैं. इसके अलावा दोस्त और परिचित भी जरूरत के अनुसार मदद करते हैं. सुशील बताते हैं कि प्रशिक्षण लेने वाले बच्चों की मांग है कि सरकार की ओर से उन्हें बेहतर हॉल और अच्छे मैट उपलब्ध कराए जाएं. उन्हें बेहतर खेल सुविधाएं मिलें तो उनके प्रदर्शन में और निखार आ सकता है.

जूडो पाठशाला एक मिसाल : सुशील सेन कहते हैं कि दक्षिण राजस्थान के बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. पहाड़ी इलाकों में दौड़ना, खेतों में काम करना और कठिन परिस्थितियों में रहना बच्चों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाता है. कमी सिर्फ सही तकनीक, संसाधन और आत्मविश्वास की है. उनका मिशन केवल जूडो खिलाड़ी तैयार करना नहीं, बल्कि बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास, मानसिक मजबूती और कभी हार न मानने की सोच विकसित करना है. उदयपुर की यह जूडो पाठशाला एक मिसाल है कि खेल प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, लेकिन प्रतिभा को मंजिल तक पहुंचाने के लिए सही मार्गदर्शन और अवसर जरूरी है. मंदिर के छोटे से हॉल में अभ्यास कर रहे इन बच्चों का लक्ष्य है कि एक दिन वे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराएंगे.


