जैसलमेर से खुशखबरी: आठ साल में बढ़े 70 गोडावण, राष्ट्रीय सर्वे में 128 से हुए 198
डेजर्ट नेशनल पार्क में 130 पक्षी प्राकृतिक आवास तथा 68 ब्रीडिंग सेंटर्स में पाए गए.

Published : February 23, 2026 at 6:44 PM IST
जैसलमेर: राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण को लेकर जैसलमेर से सुकून भरी खबर है. वर्ष 2025 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के कराए राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक सर्वे में जैसलमेर और आसपास के लगभग 22 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में कुल 198 गोडावण दर्ज किए गए. 7 से 17 अप्रैल 2025 तक विशेष अभियान में 50 टीमों के 200 से ज्यादा वैज्ञानिक, स्वयंसेवक और वनकर्मियों ने मैदानी स्तर पर आंकड़े जुटाए.
128 से 198 हुए: डेजर्ट नेशनल पार्क के डीएफओ ब्रजमोहन गुप्ता ने बताया कि 2025 के ताजा विस्तृत सर्वे में कुल 198 गोडावण दर्ज किए गए. इनमें 130 पक्षी प्राकृतिक आवास तथा 68 ब्रीडिंग सेंटर्स में पाए गए. करीब 22 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को सात प्रमुख रेंज-मयजालर, सुदासरी, रामगढ़, मोहनगढ़, रासला, रामदेवरा और पोकरण में विभाजित कर वैज्ञानिक पद्धति से गणना की. प्रक्रिया 10 दिन चली. वर्ष 2017 में पिछली गणना में 128 गोडावण थे. तब विशेषज्ञों ने इस दुर्लभ पक्षी के भविष्य को लेकर गंभीर आशंका जताई थी. वर्ष 2025 तक यह वृद्धि संरक्षण प्रयासों के सकारात्मक असर का नतीजा है.
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ब्रीडिंग सेंटर्स बने उम्मीद की किरण: गुप्ता ने बताया कि गणना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्रीडिंग सेंटर्स की उपलब्धि रही. वर्ष 2017 में इन केंद्रों में एक भी गोडावण दर्ज नहीं था. अब रामदेवरा और सम ब्रीडिंग सेंटर्स में कुल 68 गोडावण मौजूद हैं. कैप्टिव ब्रीडिंग के तहत जंगलों से सुरक्षित अंडे एकत्र कर नियंत्रित वातावरण में हैचिंग कराई और चूजों की विशेष देखरेख की. अभी 68 पक्षी प्रजाति के संरक्षण के लिए सुरक्षित बैकअप आबादी के रूप में देखे जा रहे हैं.

खुले क्षेत्र में 130 गोडावण सक्रिय: सर्वे में सामने आया कि खुले जंगल, डेजर्ट नेशनल पार्क और सेना के पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज क्षेत्र में 130 गोडावण विचरण कर रहे हैं. हालांकि खुले क्षेत्र में संख्या में बड़ी छलांग नहीं दिखती. फिर भी बिजली लाइनों से टकराव और अवैध शिकार जैसी चुनौतियों के बीच संख्या का स्थिर रहना संरक्षण के लिहाज से सकारात्मक संकेत है.
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नई पद्धति से गणना: इस बार पारंपरिक वॉटर होल पद्धति के बजाय ‘ऑक्यूपेंसी एंड डिस्टेंस सैंपलिंग’ तकनीक अपनाई गई. विशेषज्ञों के अनुसार, पानी के स्रोतों पर बैठकर गिनती की पुरानी विधि में एक ही पक्षी की दोहरी गणना या कुछ पक्षियों के छूटने की आशंका रहती है. नई पद्धति के जरिए बड़े क्षेत्र को ब्लॉकों में बांटकर अधिक सटीक आंकड़े जुटाए गए.
संरक्षण प्रयासों को मिला मजबूती का आधार: विशेषज्ञों का मानना है कि जैसलमेर का पारिस्थितिक तंत्र अभी भी गोडावण के अनुकूल है. हालांकि बिजली लाइनों से टकराव बड़ा खतरा है, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, कैप्टिव ब्रीडिंग और सामूहिक प्रयासों के कारण प्रजाति को नई उम्मीद जगी है. 198 का आंकड़ा भविष्य की रणनीतियों के लिए मजबूत आधार साबित हो सकता है.
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