राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस: बहन को नहीं मिला समय पर इलाज, 9 साल के बच्चे ने लिया संकल्प, अब उसी सड़क पर बनाया अस्पताल
डॉ बगड़िया बताते हैं कि डॉक्टर बनने का उनका सपना केवल पेशे से जुड़ा फैसला नहीं था. पेश है जसवंत सिंह रिपोर्ट.

Published : July 1, 2026 at 1:40 PM IST
जयपुर: कहते हैं कुछ संकल्प किताबों से नहीं, दर्द से जन्म लेते हैं. 2003 में जयपुर के शास्त्री नगर की एक सड़क पर हुई दुर्घटना ने 9 साल के बच्चे की दुनिया बदल दी. बहन के सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने से निधन हो गया. उस समय इलाके में तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी. परिवार के दर्द और बेबसी ने 9 साल के छोटे भाई के मन पर गहरा असर छोड़ा. एक भाई के रूप में उस क्षण एक संकल्प लिया कि वो डॉक्टर बनेंगे और उसी सड़क पर ऐसा अस्पताल बनाएंगे, जहां इलाज के अभाव में किसी भाई की कलाई सूनी न रहे. वर्षों की पढ़ाई, संघर्ष और चिकित्सा सेवा के बाद उसी भाई ने शास्त्री नगर में अस्पताल स्थापित किया. यह केवल एक मेडिकल संस्थान नहीं, बल्कि उस अधूरे रिश्ते की स्मृति और एक संकल्प का प्रतीक है. राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस पर हम आपको मिलाते हैं 'एक हादसे से अस्पताल तक का सफर' पूरा करने वाले डॉ अश्वनी बगड़िया से....
'किसी भाई की बहन न बिछड़े': डॉ अश्वनी बगड़िया बताते हैं कि उनकी बहन सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गई थीं. परिवार पहले उन्हें नजदीकी सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचा, लेकिन वहां तत्काल इलाज संभव नहीं हो सका. इसके बाद उन्हें एसएमएस अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उनकी बहन को बचाया नहीं जा सका. डॉ बगड़िया कहते हैं कि बहन को खोने का दर्द जितना बड़ा था, उससे ज्यादा तकलीफ इस बात की थी कि अगर आसपास बेहतर चिकित्सा सुविधा होती, तो शायद परिणाम अलग हो सकता था.
उसी घटना ने उनके भीतर एक संकल्प पैदा किया कि वे डॉक्टर बनेंगे और ऐसा अस्पताल बनाएंगे, जहां इलाज के अभाव में किसी परिवार को अपनों को न खोना पड़े. आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने मेडिकल शिक्षा पूरी की. कुछ समय दिल्ली में चिकित्सा सेवा दी और फिर जयपुर लौट आए. बाद में उन्होंने उसी क्षेत्र में अस्पताल स्थापित किया. अश्वनी कहते हैं कि उनके पास यूएसए का भी ऑफर था, लेकिन उसे भी स्वीकार नही किया. अश्वनी कहते हैं कि अस्पताल में इमरजेंसी और ट्रॉमा मामलों को प्राथमिकता दी जाती है ताकि किसी मरीज की जान इलाज में देरी से प्रभावित न हो.
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'पैसे के अभाव में इलाज नहीं रुकता': डॉ अश्वनी बगड़िया कहते हैं कि अस्पताल केवल इलाज की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसे संकल्प का विस्तार है जो उन्होंने अपनी बहन को खोने के बाद खुद से किया था. उनका कहना है कि अस्पताल की शुरुआत से ही एक बात तय की गई थी कि किसी मरीज का उपचार केवल आर्थिक कारणों से प्रभावित नहीं होना चाहिए. डॉ बगड़िया बताते हैं कि यदि कोई गरीब या जरूरतमंद परिवार आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचता है, तो कोशिश रहती है कि पहले चिकित्सा सहायता शुरू की जाए और बाद की औपचारिकताएं बाद में पूरी हों. उनके अनुसार स्टाफ को भी स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि इमरजेंसी में इलाज शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने एक हालिया मरीज का उदाहरण देते हुए बताया कि सड़क दुर्घटना में एक गंभीर रूप से घायल की चेहरे की कई हड्डियां प्रभावित हुई थीं. परिवार पहले दिल्ली, गुड़गांव में इलाज के लिए गया, लेकिन आर्थिक दबाव बढ़ने के बाद जयपुर लौट आया. ऐसे में अस्पताल ने परिवार की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उपचार लागत में राहत देने का निर्णय लिया. इतना ही नहीं जिस इलाज में 4 लाख का खर्च आता, उसे मात्र 1 लाख में किया गया. इतना ही नहीं, शुरुआत में मात्र 5 हजार रुपए जमा कराई गए, उसमें भी इलाज जारी रखा. डॉ बगड़िया कहते हैं कि डॉक्टर होने का अर्थ केवल चिकित्सा सेवा देना नहीं, बल्कि कठिन समय में मरीज और उसके परिवार के साथ खड़ा होना भी है.

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'बहन के नाम से रखा अस्पताल का नाम': डॉ अश्वनी बगड़िया बताते हैं कि डॉक्टर बनने का उनका सपना केवल पेशे से जुड़ा फैसला नहीं था, बल्कि बचपन में लिया गया एक निजी संकल्प था. वे कहते हैं कि आर्थिक परिस्थितियां इतनी मजबूत नहीं थीं कि आसानी से अपना अस्पताल स्थापित कर सकें, लेकिन बहन को खोने के बाद लिया गया निर्णय हमेशा उनकी सबसे बड़ी ताकत बना रहा. मेडिकल शिक्षा और नौकरी के बाद उन्होंने दिल्ली छोड़कर जयपुर लौटने का फैसला किया. इसके बाद सरकारी लघु उद्योग योजना के तहत आवेदन कर अस्पताल स्थापित करने की दिशा में काम शुरू किया. अस्पताल का नाम उन्होंने अपनी स्वर्गीय बहन वंदना की स्मृति में रखा.

डॉ अश्वनी बताते हैं कि उन्होंने वर्षों तक अपने इस संकल्प के बारे में परिवार के किसी सदस्य को नहीं बताया. यहां तक कि उनकी मां भी इस फैसले के पीछे की वजह नहीं जानती थीं. जब उन्होंने उसी इलाके में अस्पताल बनाने की इच्छा जताई, तो मां ने कारण पूछा, लेकिन उन्होंने उस समय कुछ नहीं बताया. वे बताते हैं कि अस्पताल बनने के बाद जब मां पहली बार वहां पहुंचीं और अस्पताल का नाम देखा, तो बिना कुछ कहे सब समझ गईं. उस पल मां की आंखें भर आईं. डॉ अश्वनी कहते हैं, मैं अपनी बहन को वापस नहीं ला सकता, लेकिन अगर किसी और की बहन को बचा पाया तो मुझे लगेगा कि मैंने अपनी बहन का इलाज किया.
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'सरकार योजना से जोड़ दे तो निःशुल्क हो इलाज': डॉ अश्विन कहते हैं कि आज हम राष्ट्रीय डॉक्टर दिवस मना रहे हैं. इस दिन को मनाने का उद्देश्य भी डॉक्टरों के समाज और स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है. इसका उद्देश्य केवल डॉक्टरों का सम्मान करना नहीं, बल्कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और डॉक्टर–मरीज के भरोसे को मजबूत करना भी होता है. अश्विन कहते हैं कि वह पिछले 2 साल से सरकार की 'मां योजना' के लिए आवेदन किया हुआ है, लेकिन सरकारी कमियों के कारण उनके अस्पताल को इस योजना नहीं जोड़ा गया है. अगर सरकार इस योजना से उनके अस्पताल को जोड़ दे, तो वह लोगों का निशुल्क इलाज करेंगे. किसी भी व्यक्ति को पैसे के अभाव में इलाज से वंचित नहीं होना पड़ेगा. सरकार की इस कैशलेस योजना से वह हर एक मरीज की मदद कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि मां योजना बहुत अच्छी है, लेकिन जिनके पास इसे इंप्लीमेंट करने का जिम्मा है, वहां पर कुछ कमियां हैं. इन्हें ठीक किया जाए, तो न केवल हमारा अस्पताल बल्कि ऐसे कई अस्पताल हैं, जो चाहते हैं कि सरकार की योजनाओं का लाभ लोगों को मिले.

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इलाज से पहले इंसान: अस्पतालों में अक्सर लोग इलाज से पहले कागज और भुगतान की प्रक्रिया से गुजरते हैं, लेकिन वंदना मेमोरियल हॉस्पिटल की टीम का दावा है कि यहां प्राथमिकता सबसे पहले मरीज की जान को दी जाती है. अस्पताल की मैनेजमेंट इंचार्ज प्रिया चौधरी बताती हैं कि हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. अश्वनी बगड़िया ने शुरुआत से ही एक स्पष्ट निर्देश दिया है कि उपचार में देरी नहीं होनी चाहिए. खासकर सड़क दुर्घटना या इमरजेंसी में आने वाले मरीजों का इलाज बिना देरी शुरू किया जाए, औपचारिकताएं बाद में पूरी हों. प्रिया कहती हैं कि कई बार परिवार ऐसी स्थिति में पहुंचता है जहां चिंता इलाज से ज्यादा खर्च की होती है, लेकिन अस्पताल की कोशिश रहती है कि आर्थिक स्थिति उपचार के बीच बाधा न बने. उनके अनुसार सेवा भाव और मानवीय दृष्टिकोण ही अस्पताल की कार्य संस्कृति का हिस्सा है.
जेब में थे सिर्फ 5 हजार: अस्पताल में इलाज करा चुके एक मरीज के परिजन बताते हैं कि उनके परिवार के लिए वह समय केवल बीमारी या दुर्घटना से लड़ने का नहीं, बल्कि आर्थिक संकट से जूझने का भी था. सड़क दुर्घटना के बाद मरीज की स्थिति गंभीर थी और बेहतर इलाज की उम्मीद में परिवार पहले गुड़गांव पहुंचा, लेकिन वहां इलाज का अनुमानित खर्च उनकी क्षमता से कहीं अधिक था. बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच परिवार मरीज को लेकर वापस जयपुर लौटा. पेशेंट शिवम के परिजन बताते हैं कि जब वे वंदना मेमोरियल हॉस्पिटल पहुंचे तो उस समय उनके पास शुरुआती तौर पर केवल पांच हजार रुपये थे, जबकि इलाज पर 4 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान था. उनका कहना है कि अस्पताल ने पहले मरीज की स्थिति को प्राथमिकता दी और इलाज शुरू किया. आर्थिक स्थिति को देखते हुए 4 लाख को कम करते हुए 1 लाख में इलाज किया और भुगतान के लिए समय दिया गया, जिससे परिवार को बड़ी राहत मिली. एक अन्य पेशेंट अजरु बताते हैं कि निजी अस्पतालों को लेकर लोगों के मन में जो धारणा रहती है, उनका अनुभव यहां अलग रहा. उनके अनुसार यहां इलाज के साथ भरोसा भी मिला और सबसे अच्छी बात यह रही कि मरीज की हालत को महत्व दिया गया, न कि उसकी आर्थिक स्थिति को.

