डॉक्टर या कलाकारः दिनभर मरीजों का इलाज शाम को करते हैं स्मोक पेंटिंग्स...ऐसे आया आइडिया
पेशे से डॉक्टर और दिल से स्मोक आर्टिस्ट डॉ. अनिल बांगा 45 सालों से हजारों पेंटिंग्स बना चुके हैं. पढ़िए पीयूष पाठक की रिपोर्ट...

Published : July 1, 2026 at 2:30 PM IST
अलवर : अलवर के अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल बांगा ने डॉक्टर के पेशे में व्यस्त रहने के बाद भी स्मोक आर्ट की दुनिया में नाम कमाया है. वर्ष 1981 में शुरू हुआ उनका सफर आज भी अनवरत जारी है. डॉ. अनिल बांगा बताते हैं कि कला में रुचि उन्हें शुरू से रही. तीन साल की आयु से वे संगीत व अन्य प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कार जीतते रहे हैं. चिकित्सीय पेशे से जुड़ने के बाद उन्हें मेडिकल ट्रेनिंग के दौरान स्मोक आर्ट का विचार आया. इसके बाद वे धुएं की परत पर नुकीली सुई से उकेर कर पेंटिंग बनाने लगे. डॉ. बांगा 45 सालों में हजारों पेंटिंग बना चुके हैं. उनकी 45 साल पुरानी पहली पेंटिंग आज भी सुरक्षित और जीवंत हैं, जो इस अनोखी कला की स्थायित्व और खूबसूरती का प्रमाण है.
ईटीवी भारत से खास बातचीत में डॉ. अनिल बांगा ने बताया कि 1980 में उन्होंने अपने मेडिकल करियर की शुरुआत की. उन्हें मेडिकल ट्रेनिंग के दौरान एक प्रयोग को देख इस कला का ख्याल आया. उस दौर में मेंढक की मांसपेशियों पर प्रयोग किया जाता था, जो कि आज के समय में बैन है. उस प्रयोग को देखकर उन्होंने सोचा कि क्यों न धुएं से भी कुछ किया जाए. शुरुआत में जब उन्होंने इस कला को शुरू किया तो लोगों को लगता था कि इस कला में भविष्य क्या है? यह एक स्टेबल कला है या नहीं? कितने दिनों तक यह पेंटिंग जीवित रहेगी? इस तरह के सवाल लोगों के मन में थे. डॉ. बांगा ने बताया कि उनकी सबसे पहली पेंटिंग करीब 45 साल पुरानी है, जो कि आज भी उसी तरह जीवंत है, जिस तरह पहले दिन थी.
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शुरुआत से ही कला के प्रति रही रुचि : डॉ. बांगा ने बताया कि कला के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही थी. मेडिकल क्षेत्र में वे बाद में आए. बचपन में उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और जीता. यह सिलसिला लगातार आज भी जारी है. उन्होंने बताया कि वह ट्रेंड आर्टिस्ट नहीं हैं, उन्हें कला का कोई ज्ञान नहीं, क्योंकि उन्होंने कभी इसकी पढ़ाई नहीं की. इसके बावजूद भी वह अपनी पेंटिंग को इस तरीके से तैयार करते हैं, जो लोगों को काफी पसंद आती है.
अब तक बनाई हजारों पेंटिंग : उन्होंने बताया कि 1981 से शुरू हुआ स्मोक आर्ट का यह सफर आज भी अनवरत जारी है. अब तक वह इस कला में हजारों पेंटिंग तैयार कर चुके हैं. कई सालों तक उन्होंने इस कला को संजोए रखा. इसके बाद इस कला को लाइट में भी लेकर आए, जहां इसमें उकेरे हुए चित्रों में अलग-अलग तरह के रंग दिखाई देते हैं. शुरुआत में इस कला को कोई नहीं जानता था, लेकिन आज जब उनकी बनाई गई पेंटिंग्स लोगों के बीच पसंद की जा रही है. इस कला के बारे में लोगों को जानकारी मिलने लगी है.

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इस तरह तैयार करते हैं पेंटिंग : उन्होंने बताया कि इस पेंटिंग को बनाने के लिए शुरुआत में एक कागज की शीट पर धुएं की परत को जमाना होता है. इसके बाद उसे किसी नुकीली चीज से खुरचने पर काजल जैसी चीज अपनी जगह से हटेगी और नीचे की शीट उसी आकार में दिखाई देने लगती है. जिस तरह शीट पर चित्र उकेरा जाएगा, उसी डिजाइन में वह शीट पर पेंटिंग के रूप में तैयार दिखाई देगा. यह बहुत ही बारिक काम है. पेंटिंग करते समय धुएं पर हाथ टच हुआ तो पेंटिंग खराब हो जाती है. उसे फिर से शुरू करना पड़ता है. इसमें किसी तरह का कोई इंस्ट्रूमेंट काम में नहीं लिया जाता. बस एक नुकीली सूई जैसी चीज से पूरी पेंटिंग को तैयार किया जा सकता है. इस पेंटिंग के दौरान कोई चीज गलत हो गई तो उसे छुपाया नहीं जा सकता.

एक बार में ही तैयार होती है पेंटिंग : डॉ. बांगा ने बताया कि इस कला में आर्टिस्ट का हाथ पेंटिंग में पारंगत होना चाहिए, जिससे कि वह एक बार में ही उस पेंटिंग को अच्छे से तैयार कर सके. अन्य पेंटिंग में कलाकार बीच में समय लेकर अपनी पेंटिंग को तैयार करते हैं, लेकिन स्मोक आर्ट में एक ही जगह बैठकर कलाकार को अपनी पेंटिंग तैयार करनी होती है. वह इस कला में अब महारथ हासिल कर चुके हैं, जिससे वे 2 घंटे में ही किसी भी तरह के चित्र को कला के जरिए उकेर सकते हैं.
बिना सोचे चित्र होते हैं तैयार : उन्होंने बताया कि उन्हें इस कला के कोई नियम नहीं पता, वह बिना सोचे चित्र तैयार करते हैं, जो उनके मन में आता है वह उस चित्र के जरिए शीट पर उकेरते हैं. उन्हें लगता है कि कुदरत की तरफ से उन्हें यह चीज दी गई है. उन्होंने पेंटिंग्स बनाने से पहले कभी सोचा नहीं और बनाते वक्त भी नहीं पता रहता कि वह किस चित्र को उकेर रहे हैं. चित्र पूरा होने के बाद ही वह सामने आता है. इसी के चलते पेंटिंग कला से जुड़े लोगों को आश्चर्य होता है कि कला के बारे में जानकारी नहीं होते हुए भी इस तरह के चित्र बना रहे हैं. हजारों पेंटिंग्स बनाने के बाद उन्हें इस कला में एक पैटर्न मिला है. स्मोक आर्ट में पेड़, झोपड़ी, पक्षी, सूरज, चांद, तारे नहीं बनाए जाते. इसमें अलग तरह के चित्र इसमें बनाए जाते हैं.

डॉक्टर के साथ कला को दे रहे समय : उन्होंने बताया कि वह सुबह से शाम तक डॉक्टर होने का फर्ज निभाते हैं. इसके बाद रात में 8 बजे बाद फ्री होकर वह इस कला को समय देते हैं. अब तक वह अपनी पेंटिंग्स को लेकर विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं. जिस भी प्रतियोगिता में वह उतरे उसमें पुरस्कार हासिल किए हैं. अब तक उनके पास हजारों पुरस्कार व मेडल हैं. प्रतियोगिता में बैठे जज भी पेंटिंग देखकर आश्चर्यचकित होते हैं. अब उन्हें इतने प्राइज मिल चुके हैं कि प्राइज मिलने का क्रेज खत्म हो गया. उन्हें बस स्मोक आर्ट पेंटिंग बनाने में आनंद आता है.

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पेशे के चलते नहीं जा सकते बाहर : डॉ. अनिल बांगा ने बताया कि लोगों को भी उनकी पेंटिंग्स काफी पसंद आती है. लोग उन्हें बढ़ावा भी देते हैं, लेकिन वह अपने डॉक्टर होने के चलते विभिन्न जगहों पर लगने वाले एग्जीबिशन में नहीं जा पाते हैं. कला के क्षेत्र में अनलिमिटेड स्कोप हैं, लेकिन वह डॉक्टर होने के चलते बाहर नहीं जा पाते. वह बाहर जाएं तो स्मोक आर्ट पेंटिंग की फील्ड में भी वह अच्छा नाम कमा सकते हैं. जब वह डॉक्टरी छोड़ेंगे तो संभावना है कि इस कला को फुल टाइम देंगे. कला की कोई भी कीमत नहीं होती. लोगों को अच्छा लगने पर उसके दाम किसी भी कीमत तक जा सकते हैं.

फैमिली का रहा स्पोर्ट : उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इस स्मोक आर्ट की शुरुआत की तो फैमिली का पूरा सपोर्ट रहा. ट्रॉफी जीत कर आते तो परिवार में उत्साह होता, लेकिन लगातार ट्रॉफी जीतने पर अब घर में जगह कम पड़ने लगी तो ट्रॉफी को कार्टून में भरकर रखना पड़ रहा है. वह अब तक हजारों तरीके व डिजाइन की पेंटिंग बना चुके हैं, लेकिन उन्हें इस कला में कंपलेक्स पेंटिंग बनाने में मजा आता है. यदि वह भगवान की पेंटिंग भी बनाते हैं तो उसमें दूर से व्यक्ति को देखने पर भगवान दिखाई जरूर देंगे, लेकिन स्पष्ट रूप से सीधे सीधे भगवान की पेंटिंग नहीं होती. इस तरह की उन्होंने कई पेंटिंग बनाई है. उन्होंने कहा कि वह हर बार पेंटिंग को नया रूप देते हैं. आज तक उनकी एक भी पेंटिंग दो बार नहीं बनी.

डॉ अनिल बांगा ने डॉक्टर डे पर ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने देश में समाज, विज्ञान को बदलते हुए बड़े पास से देखा है. आज के समय में जब कोई डॉक्टर बन रहा है तो वह पहले अपने आप से पूछे कि वह डॉक्टर क्यों बन रहा है? समाज के अच्छे के लिए डॉक्टर बनें. उन्होंने लोगों से भी अपील की है कि समाज भी डॉक्टर की मनोस्थिति को समझ कर उनसे व्यवहार करे. व्यक्ति जिस भी डॉक्टर के पास जाए तो उसके ऊपर भरोसा करे. डॉक्टर जिस तरीके से समाज का अच्छा कर रहे हैं, उसी तरह से समाज को भी डॉक्टर से बेहतर तरीके से व्यवहार करना चाहिए.

