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1799 विक्रम संवत् में बने रियासतकालीन मंदिर में होती है नृसिंह भगवान की 'साक्षात लीला'

आज नृसिंह चतुर्दशी के दिन पढ़िए जयपुर के अनोखे मंदिर के बारे में जहां भगवान नृसिंह शांत मुद्रा में विराजमान हैं. अंकुर जाकड़ की रिपोर्ट...

नृसिंह जयंती पर विशेष
नृसिंह जयंती पर विशेष (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : April 30, 2026 at 11:55 AM IST

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जयपुर : भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नृसिंह की छवि जहां आमतौर पर प्रचंड और आक्रामक रूप में देखी जाती है, वहीं जयपुर के परकोटे स्थित एक प्राचीन मंदिर में उनके एक बिल्कुल अलग और दुर्लभ स्वरूप के दर्शन होते हैं. यहां भगवान नृसिंह शांत मुद्रा में पद्मासन लगाए विराजित हैं. एक ऐसा रूप जो भक्तों को भय से नहीं, बल्कि गहरी शांति और आध्यात्मिक संतुलन का अनुभव कराता है. यही विशिष्टता इस रियासतकालीन मंदिर को खास बनाती है.

छोटी काशी के परकोटा क्षेत्र के पुरोहित पाड़ा में स्थित प्राचीन नृसिंह जी का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है. लगभग 284 वर्ष पुराना ये मंदिर आज भी अपनी स्थापत्य, दुर्लभ प्रतिमाओं और जीवंत परंपराओं के कारण खास पहचान रखता है.

जयपुर का अनोखा नृसिंह भगवान मंदिर (ETV Bharat Jaipur)

मंदिर के पुजारी अनिल शर्मा बताते हैं कि इस मंदिर का निर्माण 1799 विक्रम संवत में रियासत काल के दौरान हुआ था. यहां स्थापित भगवान नृसिंह की संगमरमर की प्रतिमा अपने आप में अनूठी है. सामान्यतः उग्र रूप में पूजे जाने वाले नृसिंह भगवान यहां शांत मुद्रा में पद्मासन लगाकर विराजित हैं. उनके साथ दो सेविकाओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जो इस मूर्ति को और विशिष्ट बनाती हैं. मंदिर में राधा-कृष्ण की प्राचीन प्रतिमाएं भी मौजूद हैं, जो इसकी आध्यात्मिक विविधता को दर्शाती है.

रियासतकालीन मंदिर
रियासतकालीन मंदिर (ETV Bharat GFX)

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भित्ति चित्रों में सजी रियासतकालीन कला : मंदिर की दीवारों पर बने भित्ति चित्र आज भी उस दौर की कलात्मकता की झलक दिखाते हैं. हालांकि, समय के साथ ये चित्र दुर्लभ होते जा रहे हैं. मंदिर पुजारी के अनुसार, आज के समय में इसी तरह की चित्रकारी करवाने की लागत 25 से 30 लाख रुपए तक आंकी जाती है. मंदिर का तिबारेनुमा ढांचा और संगमरमर के कमलाकार खंभे इसकी स्थापत्य सुंदरता को और बढ़ाते हैं, जो जयपुर की पारंपरिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं.

नृसिंह जयंति पर विशेष लीला का आयोजन
नृसिंह जयंति पर विशेष लीला का आयोजन (ETV Bharat GFX)

साल में एक दिन जीवंत होती है 'नृसिंह लीला' : पुजारी परिवार से जुड़े सौम्य शर्मा बताते हैं कि वैशाख मास की नृसिंह चतुर्दशी को यहां का सबसे बड़ा और विशेष आयोजन होता है. इस दिन लगभग 280 वर्षों से लगातार नृसिंह लीला का आयोजन किया जा रहा है. इस परंपरा की सबसे खास बात ये है कि पुजारी परिवार का ही एक सदस्य भगवान नृसिंह का स्वरूप धारण करता है. लीला के दौरान ऐसा वातावरण बनता है कि श्रद्धालुओं को साक्षात भगवान के अवतरण का अनुभव होता है. वर्ष में केवल इसी दिन नृसिंह स्वरूप को बाहर निकाला जाता है. विधि-विधान से पूजा के बाद लीला संपन्न होती है और फिर स्वरूप को सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है. यही कारण है कि ये विग्रह वर्षों से सुरक्षित बना हुआ है.

नृसिंह चतुर्दशी पर होती नृसिंह लीला
नृसिंह चतुर्दशी पर होती नृसिंह लीला (ETV Bharat Jaipur (File))

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आस्था और लोकमान्यताएं : मंदिर से जुड़ी कई लोकमान्यताएं भी लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती हैं. यहां मान्यता है कि जिस खंभे को फाड़कर भगवान प्रकट होते हैं, उसके अंश को लोग औषधि के रूप में उपयोग करते हैं. वहीं, लीला के दौरान गिरने वाली भगवान की जटाओं को श्रद्धालु प्रसाद के रूप में अपने पास रखते हैं. लोगों का विश्वास है कि इससे रोग और दोषों का निवारण होता है.

शांत मुद्रा में पद्मासन लगाए विराजित भगवान नृसिंह
शांत मुद्रा में पद्मासन लगाए विराजित भगवान नृसिंह (ETV Bharat Jaipur)

पीढ़ियों से जुड़ा है भक्ति का रिश्ता : मंदिर में नियमित रूप से आने वाली श्रद्धालु भाविका बताती हैं कि यहां का वातावरण उन्हें विशेष आध्यात्मिक शांति देता है. वे नियमित रूप से नृसिंह स्तुति करती हैं और भजन-कीर्तन में हिस्सा लेती हैं. उन्होंने अपनी आस्था से प्रेरित होकर बिना देखे ही भगवान नृसिंह के हिरण्यकश्यपु वध का चित्र भी कागज पर उकेरा. वहीं, स्थानीय महिला शीला पारीक बताती हैं कि नृसिंह चतुर्दशी के अलावा यहां अन्नकूट और पौष बड़े जैसे आयोजन भी होते रहते हैं. पारीक समाज में भगवान नृसिंह को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है, जिससे इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है.

मंदिर की दीवारों पर बने भित्ति चित्र
मंदिर की दीवारों पर बने भित्ति चित्र (ETV Bharat Jaipur)

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हर एकादशी को महिलाएं यहां भजन-कीर्तन करती हैं और ये परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. ये मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां की दुर्लभ प्रतिमाएं और सदियों पुरानी परंपराएं इसे खास बनाती हैं. बदलते समय में भी ये मंदिर अपने मूल स्वरूप और आस्था को संजोए हुए है, जो इसे एक जीवंत विरासत स्थल बनाता है.

करीब 284 साल पुराना नृसिंह भगवान का मंदिर
करीब 284 साल पुराना नृसिंह भगवान का मंदिर (ETV Bharat Jaipur)