प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु को अवमानना नोटिस जारी, 3 हफ्ते में देना होगा जवाब, जानिए पूरा मामला?
नैनीताल हाईकोर्ट ने आईएफएस अधिकारी पंकज कुमार की अवमानना याचिका पर सुनवाई, प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण आरके सुधांशु को अवमानना नोटिस जारी

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : July 8, 2026 at 9:45 PM IST
नैनीताल: उत्तराखंड के आईएफएस अधिकारी पंकज कुमार की अवमानना याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई. मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु को अवमानना नोटिस जारी किया है. साथ ही कोर्ट ने 3 हफ्ते के भीतर जवाब पेश करने को कहा है. आज पूरे मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोगित जी एकलपीठ में हुई.
क्या है मामला? बता दें कि नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 4 सितंबर 2025 को अंतरिम आदेश जारी कर याचिकाकर्ता पंकज कुमार के संबंध में कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं करने के निर्देश दिए थे. आरोप है कि इसके बावजूद भी राज्य सरकार ने 13 अप्रैल 2026 को याचिकाकर्ता के स्थानांतरण एवं नई तैनाती का आदेश जारी कर दिया. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह खंडपीठ के निर्देशों की अवहेलना है.
याचिकाकर्ता की ओर से ये भी कहा गया कि उसकी ओर से शासन को प्रतिनिधित्व (रिमाइंडर) भी दिया गया, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. अवमानना याचिका में ये भी आरोप लगाया गया है कि इस मामले में भारतीय वन सेवा (कैडर) नियमों और सिविल सर्विसेज बोर्ड की अनिवार्य प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया. जिस पर कोर्ट ने प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण रमेश कुमार सुधांशु से जवाब मांगा है.
पति की ओर से अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देती याचिका पर सुनवाई: नैनीताल हाईकोर्ट में पति की ओर से अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई. न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद याचिका को निरस्त कर दिया है. साथ ही कहा कि पत्नी को गरिमा के साथ जीने और अपने पति की आर्थिक क्षमता के अनुसार जीवन का आनंद लेने का अधिकार है. आर्थिक रूप से अपनी पत्नी को सहारा देने का विधिक दायित्व पति का है.
क्या है मामला? दरअसल, हल्द्वानी निवासी भारतीय सेना के एक सिपाही ने हाईकोर्ट में याचिका के माध्यम से परिवार न्यायालय हल्द्वानी के आदेश को आर्थिक आधार पर चुनौती दी, जिसमें अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था. परिवार न्यायालय ने अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर प्रति माह 10 हजार रुपए देने का आदेश दिया था.
याचिकाकर्ता जवान ने कहा कि वो भारी जोखिम वाले क्षेत्र में तैनात है और उसका वेतन प्रति माह 92,000 रुपए है. प्रोविडेंट फंड, बीमा और ऋण की किस्तों जैसी कटौतियों के बाद उसके पास सीमित राशि बचती है. उसने ये भी कहा कि हाई-रिस्क पोस्टिंग से हटने के बाद उसका वेतन घटकर करीब 72 हजार रुपए रह जाएगा. याचिका में कहा गया कि आर्थिक उत्तरदायित्व के रूप में अपनी मां और भाई की मदद करने का जिम्मा भी उसी पर है.
परिवार न्यायालय ने उनके इन तथ्यों पर विचार नहीं किया. न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने परिवार न्यायालय के आदेश को यथावत रखते हुए माना कि जवान की मानी गई कमाई को देखते हुए अंतरिम भरण-पोषण की 10 हजार रुपए की राशि अधिक या मनमानी नहीं लगती. पत्नी का भरण-पोषण मांगने का अधिकार सही है.
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