हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, चेक पर हस्ताक्षर न होने के बावजूद जवाबदेही से नहीं बच सकता है फर्म का सक्रिय साझेदार
नैनीताल हाईकोर्ट ने 50 लाख रुपए का चेक बाउंस होने के मामले पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 19, 2026 at 4:41 PM IST
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले (अफसार अली बनाम वैष्णवी फूड प्रोडक्ट व अन्य) में महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति चेक जारी होने की तिथि पर किसी पार्टनरशिप फर्म का सक्रिय भागीदार (Active Partner) है, तो केवल चेक पर उसके हस्ताक्षर न होने के आधार पर वह धारा 138 एनआई एक्ट (Negotiable Instruments Act) की आपराधिक कार्यवाही से बच नहीं सकता. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता ललित मोहन चंद्र भट्ट की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ बाजपुर स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित शिकायत दर्ज कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी.
चेक बाउंस मामले में हाईकोर्ट का फैसला: यह पूरा मामला मेसर्स वैष्णवी फूड प्रोडक्ट फर्म द्वारा जारी 50 लाख रुपये के चेक के अनादर (Dishonour) से जुड़ा हुआ है. शिकायतकर्ता अफ़सार अली के अनुसार, 6 जनवरी 2025 को जारी किया गया 50 लाख रुपये का चेक "पर्याप्त राशि न होने" (Funds Insufficient) के कारण बाउंस हो गया था. याचिकाकर्ता ललित मोहन चंद्र भट्ट ने तर्क दिया कि वह चेक के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता नहीं थे और चेक पर राजेंद्र कुमार शर्मा तथा अनिल कुमार शर्मा के हस्ताक्षर थे. हालांकि, कोर्ट के समक्ष उपलब्ध दस्तावेजों और स्वयं याचिकाकर्ता के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि वह 1 अप्रैल 2023 से फर्म में पार्टनर के रूप में शामिल हो चुके थे और चेक जारी होने की तिथि पर फर्म के रोजमर्रा के कामकाज और प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे.
फर्म के अपराध के लिए सभी सर्किय साझेदार जिम्मेदार: न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने पराक्रम्य लिखित अधिनियम (NI Act) की धारा 141 का हवाला देते हुए कहा कि पार्टनरशिप फर्म अपने साझेदारों से अलग कोई स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं होती और फर्म द्वारा किए गए अपराधों के लिए उसके व्यवसाय के संचालन के प्रभारी सभी सक्रिय साझेदार प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष (Vicarious Liability) रूप से जिम्मेदार होते हैं. उच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 528 (पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482) के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने से इनकार करते हुए कहा कि निचली अदालत ने सम्मन जारी करने में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं की है. इसके साथ ही याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार मामले की सुनवाई आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.
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