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मारपीट मामले में बीजेपी के पूर्व मंडल महामंत्री को हाईकोर्ट से क्लीन चिट, 'नॉट प्रेस्ड' के आधार पर याचिका निस्तारित

पारस चुग को उत्तराखंड हाईकोर्ट से राहत, एफआईआर रद्द करने की याचिका निस्तारित, बीजेपी पहले ही निष्कासित कर चुकी है

BJP LEADER PARAS CHUGH CLEAN CHIT
नैनीताल हाईकोर्ट (File Photo- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : August 21, 2026 at 12:00 PM IST

5 Min Read
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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय से भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मंडल महामंत्री पारस चुग को मारपीट मामले में राहत मिली है. अदालत ने याचिका को "नॉट प्रेस्ड" के आधार पर निस्तारित कर दिया है. न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ में इस मामले में 19 अगस्त को सुनवाई हुई.

याचिकाकर्ता चुग की ओर से उसके खिलाफ विगत 08 अगस्त को दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गयी. यह प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 109, 115(2), 118(1), 191(2), 191(3), 3(5) और 324(2) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत दर्ज की गई थी.

याचिकाकर्ता का पक्ष: अधिवक्ता ललित शर्मा, विपुल शर्मा और अनमोल संधू ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए दलील दी कि पारस चुग को झूठा फंसाया गया है. घटना के समय वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे. उनका कहना था कि गिरफ्तारी की कोशिश किसी ठोस साक्ष्य पर नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों और धरनों के दबाव में की जा रही थी. बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज है.

राज्य सरकार का जवाब: पिछली सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को इस बारे में विशिष्ट निर्देश प्राप्त करने को कहा था कि क्या याचिकाकर्ता घटनास्थल पर मौजूद था. क्या उसे प्राथमिकी में वर्णित तरीके से हमलावरों में से एक के रूप में पहचाना गया था. इसके अनुपालन में राज्य के अधिवक्ता वी.एस. पाल ने अदालत को सूचित किया कि- जांच अधिकारी को याचिकाकर्ता घटनास्थल पर मौजूद नहीं मिला. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 के तहत दर्ज परिवादी के बयान में भी याचिकाकर्ता की उपस्थिति या भागीदारी का उल्लेख नहीं है.

बयान के अनुसार याचिकाकर्ता की पहचान केवल अस्पताल के बाहर एकत्र भीड़ की ओर इशारा करने के आधार पर हुई थी, न कि घटना में भागीदार या हमलावर के रूप में. राज्य के अधिवक्ता ने स्वयं सीसीटीवी फुटेज देखी, जिसमें याचिकाकर्ता संबंधित समय पर घटनास्थल पर दिखाई नहीं दिया. जांच में एकत्र सामग्री के सत्यापन पर जांच अधिकारी को याचिकाकर्ता को आरोपित अपराधों से जोड़ने वाला कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिसके आधार पर उसे आरोपों से मुक्त कर दिया गया.

अदालत का निर्णय: इन तथ्यों के सामने आने के बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि अब याचिका में कोई शेष विवाद नहीं बचा, इसलिए वे इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहते. अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को जांच अधिकारी द्वारा जांच के दौरान दोषमुक्त किया गया है और सीसीटीवी फुटेज भी घटनास्थल पर उसकी उपस्थिति सिद्ध नहीं करती. इस आधार पर अदालत ने कहा कि याचिका में अब कोई और सुनवाई की आवश्यकता नहीं है.

अदालत की टिप्पणी सिर्फ पारस चुग तक सीमित: अदालत ने राज्य के अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत लिखित निर्देशों को रिकॉर्ड पर लिया और रजिस्ट्री को इन्हें पत्रावली में शामिल करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने अन्य आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है. यह टिप्पणी केवल पारस चुग तक सीमित है.

रिट याचिका 'नॉट प्रेस्ड' के साथ निस्तारित: अंततः वर्तमान आपराधिक रिट याचिका को "नॉट प्रेस्ड" घोषित कर निस्तारित कर दिया गया, तथा लंबित अन्य आवेदनों का भी उसी अनुसार निपटारा कर दिया गया.

क्या था मामला? उत्तराखंड के रुद्रपुर में अभिषेक वाल्मीकि के साथ मारपीट की घटना 7 अगस्त 2026 की रात को हुई थी. एलायंस कॉलोनी के पास फ्लाईओवर के नजदीक अभिषेक अपने दोस्त जतिन के साथ स्कूटी से जा रहे थे. विवाद के दौरान उन पर हमला हुआ था. हमले में अभिषेक गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उन्हें बरेली रेफर किया गया था. बरेली में हालत बिगड़ने के बाद उन्हें एम्स ऋषिकेश ले जाया जा रहा था कि रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

वाल्मीकि समाज के लोगों ने इसके बाद कोतवाली घेर ली थी. सन्नी चुग की गिरफ्तारी के बाद लोग शांत हुए थे. इस मामले में बीजेपी के पूर्व मंडल महामंत्री पारस चुग और उनके भाई सन्नी चुग समेत 10 अन्य लोग नामजद हुए थे. पारस चुग ने 8 अगस्त को उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग की थी. उनका कहना था कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है.

बीजेपी ने पारस चुग को निष्कासित कर दिया था: अभिषेक वाल्मीकि मामले हुए बवाल के बाद बीजेपी ने पारस चुग को उनके पद से हटाते हुए पार्टी से भी निष्कासित कर दिया था. बीजेपी ने ये कार्रवाई 10 अगस्त को पत्र जारी करते हुए की थी.

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