ETV Bharat / state

पतंजलि समूह की इकाइयों से जुड़े कथित धोखाधड़ी मामले में सुनवाई, कारोबारी और उसकी बेटियों को नहीं मिली राहत

पतंजलि समूह की इकाइयों से जुड़े करोड़ों रुपए के कथित धोखाधड़ी मामले में कारोबारी की याचिका खारिज, जानिए क्या है पूरा मामला

Nainital High Court
नैनीताल हाईकोर्टनैनीताल हाईकोर्ट (फोटो- ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : June 19, 2026 at 8:51 PM IST

3 Min Read
Choose ETV Bharat

नैनीताल: पतंजलि समूह की इकाइयों से जुड़े करोड़ों रुपए के कथित धोखाधड़ी मामले में आरोपी कारोबारी राकेश मेहरा और उनकी दोनों बेटियों को हाईकोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया है. न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने राकेश मेहरा की धारा 482 सीआरपीसी की याचिका और उनकी बेटियों की आपराधिक रिट याचिका को खारिज कर दिया. साथ ही ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई कानून के अनुसार आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है. इसके अलावा पूर्व में पारित सभी अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए गए हैं.

न्यायालय ने क्या कहा? न्यायालय ने कहा कि राकेश मेहरा के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य, बैंक रिकॉर्ड, चार्टर्ड अकाउंटेंट की रिपोर्ट और अन्य सामग्री सामने आई है. ऐसे में इस स्तर पर ये नहीं कहा जा सकता कि मामला केवल सिविल विवाद का है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि उपलब्ध तथ्यों से आपराधिक अपराध का प्रथमदृष्टया मामला बनता है, तो केवल यह आधार कि पक्षकारों के बीच व्यावसायिक संबंध थे, आपराधिक कार्रवाई समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता. अदालत ने राकेश मेहरा की याचिका की सुनवाई योग्य होने पर भी गंभीर टिप्पणी की.

न्यायालय ने कहा कि राकेश मेहरा जांच में शामिल नहीं हुए, उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट, उद्घोषणा और लुकआउट सर्कुलर जारी हुआ. उन्हें अपराधी घोषित किया गया. ऐसे व्यक्ति की ओर से पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से धारा 482 की याचिका दायर करना स्वीकार्य नहीं है. न्यायालय ने कहा कि जो व्यक्ति खुद न्यायिक प्रक्रिया से बच रहा हो, उसके पक्ष में हाईकोर्ट अपनी असाधारण अधिकारिता का प्रयोग नहीं कर सकता.

याचिकाकर्ताओं का तर्क: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि पतंजलि समूह की कंपनियों के साथ साल 2007 से 2018 तक व्यावसायिक लेन-देन रहा और विवाद पूरी तरह व्यापारिक एवं सिविल प्रकृति का है. उनका ये भी कहना था कि समझौतों में मध्यस्थता का प्रावधान था. एफआईआर (FIR) दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई.

वहीं, शिकायतकर्ता और राज्य की ओर से कहा गया कि जांच में ये सामने आया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद बड़ी धनराशि आरोपी की बेटियों के खातों में स्थानांतरित की गई और पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर ही आरोपपत्र दाखिल किया गया. हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि जांच के दौरान एकत्र साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया मुकदमे के संचालन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है.

इस चरण पर साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन या उनकी विश्वसनीयता की जांच करना हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. न्यायालय ने कहा कि यदि एक ही घटनाक्रम से सिविल और आपराधिक दोनों प्रकार की जिम्मेदारी उत्पन्न होती है, तो केवल सिविल उपचार उपलब्ध होने से आपराधिक कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती.

ये भी पढ़ें-