सलूम्बर में 2 और बच्चों की मौत, अब तक 7 ने तोड़ा दम, जयपुर और पुणे भेजे गए सैंपल
प्रभावित गांवों में मेडिकल टीमें घर-घर जाकर बच्चों और आमजन की जांच कर रही है. जरूरत पड़ने पर मरीजों को अस्पताल भेजा जा रहा है.

Published : April 9, 2026 at 1:41 PM IST
|Updated : April 9, 2026 at 2:46 PM IST
उदयपुर : दक्षिणी राजस्थान के सलूम्बर जिले में रहस्यमयी बीमारी से पिछले दो दिनों में दो और बच्चों की मौत हो गई है. झल्लारा और लसाड़िया क्षेत्र में बीते सात दिनों में मृतकों की संख्या बढ़कर सात हो गई है. सात बच्चों की मौत ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी है. प्रशासन और चिकित्सा विभाग सतर्क है, लेकिन खराब सड़क, नेटवर्क की कमी और अंधविश्वास जैसी समस्याएं हालात को और गंभीर बना रही हैं. वहीं, परिवारों में मातम पसरा हुआ है. इस बीच स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से घबराने के बजाय सतर्क रहने की अपील की है. सीएमएचओ डॉ. महेंद्र परमार ने कहा है कि बुखार, उल्टी या ऐंठन जैसे लक्षण दिखते ही तुरंत अस्पताल जाएं, साफ पानी पिएं और स्वच्छता का ध्यान रखें. उन्होंने भरोसा दिलाया कि अस्पतालों में पर्याप्त इलाज की व्यवस्था है और प्रशासन हर संभव मदद के लिए तैयार है.
इनकी हुई मौत : मंगलवार को अलग-अलग गांवों से परिजन 4.5 साल के रौनक और दो महीने के बंशी को सलूंबर अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां जांच में दोनों को मृत घोषित कर दिया गया. परिजनों के अनुसार बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत थी और हालत बिगड़ने पर अस्पताल लाया गया. सीएमएचओ डॉ. महेंद्र कुमार परमार के मुताबिक, झल्लारा के आमलोदा निवासी रौनक को उल्टी के बाद बुखार, घबराहट और शरीर में जकड़न होने लगी थी. लसाड़िया क्षेत्र के कालीभीत निवासी दो माह के बंशी को दस्त की शिकायत के बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन सुधार नहीं हुआ और मौत हो गई.
वहीं, जिला प्रशासन ने इसे रहस्यमयी बीमारी से अलग बताया है. सलूंबर कलेक्टर ने ईटीवी भारत से बातचीत में साफ किया कि दोनों बच्चों में वह लक्षण नहीं पाए गए, जो अब तक सामने आई संदिग्ध बीमारी के मामलों में देखे गए थे. कलेक्टर के अनुसार, दोनों बच्चों की मौत अलग-अलग बीमारियों के कारण हुई है और इन्हें रहस्यमयी बीमारी से जोड़ना सही नहीं है. प्रशासन ने इस मामले में किसी तरह की अफवाह से बचने की अपील भी की है.
बुझ गए कई परिवारों के चिराग : स्थानीय व्यक्ति सुनील ने बताया कि सलूम्बर जिले के लालपुरा और आसपास के गांवों में रहस्यमयी बीमारी से सात बच्चों की मौत के बाद हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. परिवारों में मातम पसरा है और पूरे इलाके में डर और अनिश्चितता का माहौल है. राहत की बात यह है कि फिलहाल कोई नया मामला सामने नहीं आया है, लेकिन लगातार हुई मौतों ने ग्रामीणों के मन में गहरा भय पैदा कर दिया है. प्रशासन और चिकित्सा विभाग ने स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए व्यापक अभियान शुरू किया है. प्रभावित गांवों में मेडिकल टीमें घर-घर जाकर बच्चों और आमजन की जांच कर रही है. जहां भी बुखार, ऐंठन या उल्टी जैसे लक्षण मिल रहे हैं, वहां तुरंत दवाइयां दी जा रही हैं और जरूरत पड़ने पर मरीजों को अस्पताल भेजा जा रहा है.

घर-घर हो रहा सैंपलिंग : स्वास्थ्य विभाग का फोकस समय रहते पहचान, उपचार और जन जागरूकता पर है, जिससे बीमारी के प्रसार को रोका जा सके. हालांकि, इस पूरे अभियान में अंधविश्वास एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. कई ग्रामीण बीमारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और मेडिकल जांच से बच रहे हैं. एक मामले में बच्ची को अस्पताल नहीं ले जाकर झाड़-फूंक के लिए ले जाया गया, जहां इलाज के अभाव में उसकी मौत हो गई. ग्रामीण उमेश का कहना है लसाड़िया-धरियावाद मार्ग की हालत पिछले कई सालों से खराब है, जिससे एंबुलेंस भी आने से कतराती है. कई मामलों में मरीजों को अस्पताल पहुंचने में 2 से 3 घंटे लग गए, जो बच्चों के लिए घातक साबित हुआ.
लालपुरा गांव के मानूराम मीणा के परिवार की कहानी इस दर्दनाक स्थिति को बयां करती है. उनके दो बेटों की कुछ ही दिनों के अंतराल में मौत हो गई. पहले बेटे दीपक की तबीयत अचानक बिगड़ी और इलाज के दौरान रास्ते में उसकी मौत हो गई. इसके बाद दूसरे बेटे लक्ष्मण को भी गंभीर हालत में रेफर किया गया, लेकिन दो दिन इलाज के बाद उसने भी दम तोड़ दिया. ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है. करीब 35 किलोमीटर के दायरे में कोई प्रभावी स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भरता भी एक गंभीर समस्या है. प्रशासन का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए जनसहयोग और जागरूकता बेहद जरूरी है.

सैंपल की रिपोर्ट आने के बाद होगा खुलासा : इस रहस्यमयी बीमारी से अब तक 7 बच्चों की मौत हो चुकी है. इनमें से अधिकांश बच्चों के सैंपल उदयपुर के महाराणा भूपाल अस्पताल में लिए गए हैं, जिन्हें जांच के लिए जयपुर और पुणे भेजे गए हैं. उदयपुर एमबी अस्पताल के अधीक्षक आर एल सुमन ने बताया कि रिपोर्ट आने के बाद ही मौत का खुलासा हो पाएगा कि किन कारणों से मौत हुई है. फिलहाल अस्पताल में तीन बच्चे भर्ती हैं, जिनकी स्थिति ठीक बताई जा रही है.
एमबी अस्पताल में इलाज जारी : घाटा के रहने वाले व्यक्ति ने बताया कि उनकी 4 साल की बेटी को उल्टी, दस्त और शरीर में जकड़न की शिकायत हुई, जिसके बाद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दिखाया गया. वहां से उदयपुर की एमबी अस्पताल रेफर किया गया है, जहां उसका इलाज जारी है. उन्होंने बताया कि सभी बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखाई दिए. अभी भी लोगों में डर का माहौल है. सबसे बड़ी दिक्कत आदिवासी इलाके में स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद जन सुविधाओं की रहती है. वर्षों बीच जाने के बाद भी सड़के ठीक नहीं हुई. इतना ही नहीं इमरजेंसी में एंबुलेंस को पहुंचने में भी 1 घंटे से ज्यादा का वक्त लग जाता है. इससे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. एक अन्य स्थानीय व्यक्ति जगदीश ने बताया कि इन इलाकों में मोबाइल इंटरनेट की सुविधा भी नहीं है.
इन इलाकों में पहले भी देखा गया कि जैसे ही कोई बीमारी होगी तो कुछ लोग इसके डर से अंधविश्वास के चक्कर में फंस जाते हैं. स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए चिकित्सकों की जरूरत होती है. मेरा स्थानीय लोगों से निवेदन है कि आस्था अपनी जगह है, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने पर उसे अस्पताल लेकर आएं. राज्य सरकार से अनुरोध है कि आदिवासी बच्चों की समस्या पर जांच होनी चाहिए, जिससे इस तरह की बीमारी नहीं फैले. - थावरचंद डामोर, धरियावद विधायक

