मुस्लिम महिलाएं बना रहीं कान्हा की बांसुरी, जन्माष्टमी के बाजार में दिखेगी मुजफ्फरपुर के मुर्गियाचक की हुनरमंदी
मुजफ्फरपुर में मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से कन्हैया की बांसुरी बना रहे हैं. मुख्यमंत्री योजना की मदद से महिलाओं की भागेदार बढ़ी. रिपोर्ट- विवेक कुमार

Published : September 2, 2026 at 7:17 AM IST
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर से सामाजिक सौहार्द और महिला सशक्तिकरण की बेहद खूबसूरत तस्वीर निकलकर आई है. यहां कृष्ण की बांसुरी से कई मुस्लिम परिवारों के घर गुलजार हो रहे हैं. जिले के कुढ़नी प्रखंड स्थित बड़ा सुमेरा के मुर्गियाचक गांव में बांसुरी की धुन के साथ करीब 80 मुस्लिम परिवारों की जिंदगी चलती है.
जन्माष्टमी की तैयारी: गांव के कई घरों के एक कोने में रखे नरकट के टुकड़े, हाथों में बांसुरी को आकार देतीं महिलाएं. कोई सुर के लिए नरकट में छेद कर रहा है तो कोई तैयार बांसुरी को अंतिम रूप दे रहा है. बाहर जन्माष्टमी के मेले की तैयारी चल रही है. घर में महिलाएं बांसुरी बना रही हैं और परिवार के पुरुष उसे लेकर बाजार की ओर निकलने की तैयारी में हैं. इन दिनों यहां कमोबेश हर परिवार में ही यह तस्वीर देखने को मिल जाएगी.
बांसुरी बना रही मुस्लिम महिलाएं: गांव में जन्माष्टमी से पहले कारोबार में तेजी आई है. मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत मिले 10 हजार रुपये से महिलाओं ने कच्चा माल खरीदा और पुश्तैनी काम में पूंजी लगाई. घर में तैयार बांसुरी अब प्रदेश के सभी जिलों के अलावा झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल और भूटान तक पहुंचती है.

चार पीढ़ियों से बांसुरी ही रोजगार: इस गांव में बांसुरी बनाना कोई नया काम नहीं है. कई परिवारों में यह हुनर चार पीढ़ियों से चला आ रहा है. बुजुर्ग कारीगर नूर अहमद बताते हैं कि उन्होंने बांसुरी बनाना अपने पिता से सीखा था. उनके मुताबिक उस दौर में रोजगार के साधन सीमित थे और परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी. ऐसे में उन्होंने बांसुरी बनाना और उसे बाजार में बेचकर परिवार चलाना शुरू किया.
बांसुरी बनाने का हुनर नहीं छोड़ा: नूर अहमद के मुताबिक आज भी परिवार इसी काम से अपनी जिंदगी चला रहा है. समय बदला, रोजगार के नए साधन आए, लेकिन उनके परिवार ने बांसुरी बनाने का हुनर नहीं छोड़ा. अब नई पीढ़ी के साथ घर की महिलाएं भी इस कारोबार में सक्रिय रूप से जुड़ गई हैं.
"बांसुरी बनाना अपने पिता से सीखा था. उस दौर में रोजगार के साधन सीमित थे और परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी. ऐसे में बांसुरी बनाना और उसे बाजार में बेचकर परिवार चलाना शुरू किया था. अब परिवार की महिलाएं भी इससे जुड़ गई हैं."- नूर अहमद, बांसुरी निर्माता
10 हजार रुपये ने बदली तस्वीर: वहीं महिला कारीगर अख्तरी खातून बताती हैं कि मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत उन्हें 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद मिली थी. परिवार के लिए यह रकम छोटी जरूर है, लेकिन कारोबार के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण साबित हुई.

पैसे की कमी थी बाधा: अख्तरी खातून के अनुसार, पहले पूंजी की कमी के कारण परिवार जरूरत के मुताबिक कच्चा माल नहीं खरीद पाता था. काम करना चाहते थे, लेकिन पैसे की कमी आड़े आती थी. अब योजना से मिले पैसे को कारोबार में लगाया गया है. अलग से इसके लिए बाहर से कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ी. इससे बांसुरी बनाने के लिए सामान खरीदा जा रहा है.
"पहले पूंजी की कमी के कारण परिवार जरूरत के मुताबिक कच्चा माल नहीं खरीद पाता था और पैसे की कमी आड़े आती थी. अब योजना से मिले पैसे को कारोबार में लगाया गया है. इसके लिए बाहर से कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ी."- अख्तरी खातून, बांसुरी निर्माता
खिलौने और पंखे भी करते हैं तैयार: अख्तरी बताती हैं कि परिवार केवल बांसुरी ही नहीं बनाता, बल्कि खिलौने और पंखे भी तैयार करता है. इन सामानों में भी पूंजी लगाई जाती है. महिलाएं घर पर सामान तैयार करती हैं और उनके पति तथा परिवार के अन्य पुरुष सदस्य अलग-अलग बाजारों और मेलों में जाकर इन्हें बेचते हैं.
सास और बहू बना रही हैं बांसुरी: इस कारोबार में अब गांव की महिलाओं की भूमिका काफी बढ़ गई है. सुबह से ही घरों में बांसुरी बनाने का काम शुरू हो जाता है. महिलाएं परिवार के दूसरे काम निपटाने के साथ बांसुरी तैयार करती हैं. कई जगहों पर सास और बहू मिलकर बांसुरी बनाती हैं.

बिना कर्ज लिए कारोबार का विस्तार: महिला कारीगर रिजवाना खातून बताती हैं कि उनके परिवार में पहले से बांसुरी बनाने का काम होता रहा है. अब आर्थिक मदद मिलने के बाद इसी काम को थोड़ा और विस्तार दिया गया है. उनका कहना है कि सरकारी सहायता से मिली राशि को कारोबार में लगाकर बिना कर्ज लिए काम आगे बढ़ाने का अवसर मिला है.
"परिवार में पहले से बांसुरी बनाने का काम होता रहा है. सरकारी सहायता से मिली राशि को कारोबार में लगाकर बिना कर्ज लिए काम आगे बढ़ाने का अवसर मिला है."- रिजवाना खातून, बांसुरी निर्माता
जन्माष्टमी का पूरे साल इंतजार: महिलाओं के लिए यह काम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हें रोजगार के लिए घर से बाहर नहीं जाना पड़ता. घर पर रहते हुए वे बांसुरी तैयार कर परिवार की आमदनी बढ़ाने में सहयोग कर रही हैं. इन परिवारों के लिए जन्माष्टमी सिर्फ आस्था का त्योहार नहीं, बल्कि साल की बड़ी कमाई का मौका भी है. जैसे-जैसे जन्माष्टमी नजदीक आती है, बांसुरी बनाने का काम तेज हो जाता है.
"जन्माष्टमी के दौरान बांसुरी की बिक्री काफी बढ़ जाती है, इसलिए परिवार पहले से ही बड़ी संख्या में बांसुरी तैयार करना शुरू कर देता है. तैयार बांसुरियों को अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों में ले जाकर बेचा जाता है."- रिजवाना खातून, बांसुरी निर्माता
दस दिनों तक लगातार निर्माण का काम: बुजुर्ग कारीगर नूर अहमद बताते हैं कि जन्माष्टमी के मौके पर करीब पांच हजार से 30 हजार रुपये तक का माल तैयार करके बिक्री के लिए बाहर ले जाते हैं. इसके लिए आठ से दस दिनों तक लगातार बांसुरी बनाने का काम चलता है. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बांसुरी पहुंचती है.
जयनगर तक पहुंचती है बांसुरी: मुर्गियाचक गांव की बांसुरी की मांग सिर्फ मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं है. कारीगर तैयार बांसुरियां लेकर समस्तीपुर, रोसड़ा, मिर्वली, जयनगर, राजनगर, खजौली, ससनपुर और मुसरीघरारी सहित कई इलाकों तक पहुंचते हैं. जन्माष्टमी के दौरान इन इलाकों में लगने वाले मेलों में बांसुरी की अच्छी बिक्री होती.
नरकट की बांसुरी, पीढ़ियों पुराना हुनर: गांव के कारीगर पारंपरिक तरीके से नरकट से बांसुरी तैयार करते हैं. दरअसल नरकट का तना अंदर से खोखला होता है और बांसुरी बनाने के लिए इसे उपयुक्त माना जाता है. कारीगरों के मुताबिक पहले आसपास के इलाकों में नरकट आसानी से मिल जाता था, लेकिन अब इसकी उपलब्धता कम हो गई है.
पारंपरिक तरीका बरकरार: बुजुर्ग कारीगर नूर अहमद के मुताबिक तमाम अड़चनों और दिक्कतों के बावजूद गांव के परिवारों ने पारंपरिक तरीका नहीं छोड़ा है. उन्होंने बताया कि एक बांसुरी तैयार करने में करीब चार से पांच रुपये तक खर्च आता है और बाजार में यह 10 से 50 रुपये तक में बिकती है.

परिवार की उम्मीद: बड़ा सुमेरा मुर्गियाचक गांव में तैयार होने वाली हर बांसुरी के पीछे एक परिवार की मेहनत छिपी है. महिलाओं के हाथों से तैयार बांसुरी जब जन्माष्टमी के मेले में पहुंचती है तो वह सिर्फ भगवान कृष्ण की पहचान से जुड़ा वाद्य यंत्र नहीं रहती, बल्कि इन परिवारों के लिए रोजी-रोटी का जरिया बन जाती है.
कारोबार में महिलाओं की भागीदारी: मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत मिली 10 हजार रुपये की सहायता ने इन महिलाओं को कारोबार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका दिया है. घर में बैठकर बांसुरी बनाने वाली महिलाएं अब परिवार की कमाई बढ़ाने के साथ-साथ अपने पूर्वजों से मिले हुनर को भी आगे बढ़ा रही हैं.
पीढ़ियों पुराने हुनर की नई उम्मीद: जन्माष्टमी करीब है और गांव में बांसुरी बनाने का काम जोर पकड़ चुका है. घरों से निकलती बांसुरी की धुन शायद सिर्फ कृष्ण की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह भी बताती है कि परंपरा, मेहनत और थोड़ी-सी आर्थिक मदद मिल जाए तो पीढ़ियों पुराना हुनर भी नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ सकता है.
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