जरु से सुनिए मुंबई के सिनेमा से आगे की कहानी, कैसे इस शहर के पारस बन गए थे पारसी?
मुंबई की चकाचौंध के पीछे छिपी एक ऐसी कहानी, जिसे लोग नहीं जानते. मुंबई की पहचान असल में है क्या? शेफाली पांडे की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : September 1, 2026 at 1:18 PM IST
|Updated : September 2, 2026 at 5:16 PM IST
मुंबई/भोपाल: जरु बरुचा की आवाज़ में मुंबई मायानगरी से बाहर निकल आती है. जरु उस मुंबई से आपका सामना कराती हैं, जिसमें अमिताभ बच्चन सिनेमा के किसी सितारे का ज़िक्र भी नहीं आता. वह बताते-बताते सवाल करती हैं "मुंबई में इतना पैसा आया कहां से, बॉम्बे जिसे आप हम आज मुंबई कहते हैं इसे मुंबई बनाया किसने?" और फिर मुस्कुराते हुए एक सांस में कहती हैं "जेएन पेटिट लाइब्रेरी, सर जेजे कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर, रीगल सिनेमा, टाटा मेमोरियल कुसरो बाग. मुंबई जिस इतिहास से रोशन है, ये उस सुनहरे इतिहास की हर लकीर पारसियों की खींची हुई है."
जरु बरुचा गाइड हैं, जो मुंबई आने वाले दुनिया भर के सैलानियों के आगे मुंबई का दरवाज़ा खोलती हैं. गेटवे ऑफ इंडिया से खुलने वाले इस दरवाज़े के साथ वह उन चेहरों तक ले जाती हैं, जो मुंबई के इतिहास में दर्ज होते हुए उस तरह से चीन्हे नहीं गए. जरु कहती हैं "इस मुंबई को मुंबई बनाने वाले हाथ पारसियों के हैं."
मुंबई के पारस हैं पारसी, हर दीवार की एक कहानी
साउथ मुंबई की हर दूसरी सड़क से लगी ब्रिटिशकालीन इमारत पारसियों के खून पसीने और मेहनत की दास्तान लिए खड़ी है. गाइड जरु बताती हैं "हैरत की बात ये है कि पारसियों का मुंबई को खड़ा और बड़ा करने में जो योगदान रहा, वो विदेशों से आए सैलानी सुनते हैं. जानना चाहते हैं लेकिन भारत के लोगों में सैलानियों में इसको लेकर उतनी दिलचस्पी नहीं है."
वे फिर उस दौर में पहुंच जाती हैं, जब पारसियों ने समन्दर से घिरे इस शहर में पहला कदम रखा था. वे कहती हैं "ब्रिटिशर्स पारसियों को सूरत से लेकर आए थे. केवल सूरत नहीं गुजरात का नवसारी भी वह इलाका है, जहां काफी पारसी हैं. यहां आकर उन्होंने अपना बिजनेस बढाया. हाउसिंग सोसायटी बनाईं. आज भी ऐसे मकान हैं मुंबई में जो केवल 50 से 100 रुपए के भाड़े पर हैं. जिनका पूरा खर्च ट्रस्ट करती है. जब मुंबई को बसाया जा रहा था तब इस शहर में 80 फीसदी पारसी ही थे."

ये इमारतें पारसियों का मुंबई को तोहफा हैं
जरु मुंबई आने वाले हर सैलानी को उस हिस्से की सैर जरूर करवाती हैं, जो पारसियों के सुनहरे इतिहास से लेकर आज तक की कहानी बयां करता है. वो इमारतें जो सौगात बन गईं मुंबई के लिए. वे बताती हैं "सर कावरसी जहांगीर ने एल्फ्रेंस कॉलेज बनाया था. मैं उसी कॉलेज की पासआउट हूं. टाटा फैमिली में आईएनएस से लेकर ताजमहल और हेल्थ सेक्टर में टाटा मेमोरियल तक क्या नहीं दिया. एयर इंडिया भी तो देश को टाटा ने ही दिया. जेजे कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर जमशेदजी जीजी भाई के डोनेशन से बना था. नवसारी बिल्डिंग में जिस तरह की नक्काशी की गई है, उसे देखने सैलानी यहां आते हैं."
मुंबई की तरक्की में पारसियों का हाथ
गाइड जरु कहती हैं "आज तो मुंबई को मायानगरी कहते हैं, लेकिन शुरुआत में सिनेमा रीगल सिनेमा के तौर पर फ्रामजी सिधवा ने बनवा कर दिया था. 1930 में बना कुसरो बाग, ये रिहायशी बस्ती 1930 से आज तक वैसी ही खड़ी है. जेरबाई वाडिया ने लोगों के रहने के लिए इसे तैयार किया था. सबसे बड़ी बात है मुंबई की तरक्की में अगर कोई मेजर कान्ट्रीब्यूटर था तो वे पारसी ही थे. चाहे कम्यूनिटी के लिए हाउसिंग हो, हेल्थ हो या एजुकेशन पारसियों ने हाथ खोलकर खर्च किया. मुंबई अकेला शहर है भारत में जहां पारसी समुदाय के 46 फायर टैम्पल्स हैं."

क्या कहते हैं मुंबई घूमने आए सैलानी
मुंबई घूमने आए सैलानी दिलशाद कहते हैं "मैं और मेरे जैसे कई लोग मुंबई को अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान के घर के आगे नहीं जानते. मतलब यही समझते हैं कि मुंबई मतलब फिल्म इंडस्ट्री लेकिन एक कम्यूनिटी ने इस शहर को कितना दिया, इसकी गवाही दे रही हैं ये बिल्डिंग्स. लेकिन हैरत की बात है कि इनकी कहानी उस तरह से सामने आई ही नहीं."
जब म्यूनिसपल कमिश्नर ने कहा- मेरी मूर्ति क्यों नहीं
जो इन्फ्रास्ट्रक्चर आज भी मुंबई की पहचान बना हुआ है, वो मुंबई म्यूनिसपल कॉर्पोरेशन के पहले कमिश्नर फिरोजशाह मेहता की देन हैं. उन्होंने इस नगर निगम को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले स्वदेशी बैंक सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना कर दी थी. जरु उनसे जुड़ा एक दिलचस्प हिस्सा साझा करती हैं. जरु कहती हैं "जब किंग एडवर्ड का यहां स्टैच्यू बनने वाला था म्यूनसिपल बिल्डिंग में तो मेहता ने उस पर एतराज जताया और कहा कि जो आया नहीं उसका स्टैच्यू क्यों लगेगा. मैंने 30-40 साल यहां सेवा की है. बाद में फिरोजशाह मेहता का स्टैच्यू रखा भी गया. इसी तरह से विक्टोरिया टर्मिनस पर भी दो भारतीयों का स्टैच्यू है. पहला सर शंकर सेठ का जिन्होंने जमीन दी, दूसरे जमशेद जीजी बॉय जिन्होंने इसे बनाने बड़ा डोनेशन दिया था."

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कौन हैं जरु बरुचा, अभी कितने पारसी मुंबई में?
जरु बरुचा भारत सरकार की अधिकृत टूरिस्ट गाइड हैं. एनशिएंड हिस्ट्री पढ़ चुकी जरु को इतिहास में दिलचस्पी थी. लेकिन ये अंदाजा नहीं था कि वे एक दिन अपनी ही कम्यूनिटी की गाथा को अपनी जुबां से दुनिया को सुनाएंगी. वे खुद पारसी हैं. वह बताती हैं "आज भले मुंबई में दादर के पारसी कॉलोनी में केवल 40-50 हजार पारसी बचे हों, पूरे भारत में करीब एक लाख पारसी बचे हैं लेकिन मुंबई में 80 फीसदी आबादी कभी पारसियों की थी. इसे बसाने वाले और बनाने वाले हाथ पारसियों के ही थे." जरु जब ये कहती हैं तो उनकी आवाज़ एक गाइड के तौर पर एक समुदाय की बलिदान की नहीं, अपनी कहानी बयां कर रही होती हैं.

