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हाईकोर्ट के पास नहीं है आर्टिकल 142 के उपयोग का अधिकार, दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट का निर्णय बरकरार

पास्को और दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट के आजीवन कारावास की सजा के आदेश को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रखा बरकरार.

MP HIGH COURT ON ARTICLE 142
हाईकोर्ट के पास नहीं है आर्टिकल 142 के उपयोग का अधिकार (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : January 2, 2026 at 5:37 PM IST

3 Min Read
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जबलपुर: पास्को और दुष्कर्म के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा को आर्टिकल 142 के तहत निरस्त करने को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. इस मामले में हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस राम कुमार चौबे की युगलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के उपयोग का अधिकार हाईकोर्ट के पास नहीं है. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ पास्को और दुष्कर्म के अपराध में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है.

ट्रायल कोर्ट के निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका

ट्रायल कोर्ट के द्वारा पास्को और दुष्कर्म के अपराध में दी गई आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ इटारसी निवासी एक व्यक्ति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी. अपील में कहा गया था कि प्रकरण में जमानत मिलने के बाद उसने पीड़ित से शादी कर ली है और दोनों का एक बच्चा भी है, जिसकी देखरेख पीड़ित के द्वारा की जाती है. पीड़ित की देखभाल करने वाला कोई नहीं है और परिजन ने उसे छोड़ दिया है.

पीड़ित ने ट्रायल कोर्ट में दिये बयान में माना था कि दोनों के बीच आपसी सहमति से संबंध स्थापित हुए थे. इसके बावजूद भी ट्रायल कोर्ट ने सजा से दंडित किया है. हाईकोर्ट में दायर अपील में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किशोरों की प्राइवेसी के अधिकार के संबंध में पारित 3 निर्णयों को उल्लेख करते हुए आर्टिकल 142 के तहत सजा निरस्त करने की राहत चाही गयी थी.

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को रखा बरकरार

हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस राम कुमार चौबे की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "घटना के समय पीड़ित की उम्र 17 साल थी. पास्को एक्ट की परिभाषा के अनुसार 18 साल से कम बच्चे की श्रेणी में आते हैं. नाबालिग होने के कारण उसकी सहमति के कोई मायने नहीं थे.

पीड़ित ने अपनी शिकायत में कहा कि अपीलकर्ता ने उसके साथ कई बाद पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट किया है. ट्रायल कोर्ट ने सजा से दंडित करने में कोई गलती नहीं की है. सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों मामलों में भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए नरमी दिखाई है. हाईकोर्ट के पास यह अधिकार उपलब्ध नहीं है." युगलपीठ ने इस आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया.

क्या है भारतीय संविधान का आर्टिकल 142

भारतीय संविधान का आर्टिकल 142 भारत के सुप्रीम कोर्ट को किसी भी लंबित मामले में पूरी तरह से न्याय करने के लिए असाधारण आदेश देने की शक्ति देता है, जिसके लिए कानून में प्रावधान न हो तब भी सुप्रीम कोर्ट इस अनुच्छेद के तहत आदेश दे सकता है. इस आर्टिकल के तहत सुप्रीम कोर्ट किसी को बुलाने, दस्तावेज मंगवाने या अपनी अवमानना के लिए दंड देने के लिए भी आदेश जारी कर सकता है. इसके आर्टिकल के प्रयोग में संतुलन और संयम की आवश्यकता होती है. सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में ऐसे मामलों में यह देखा गया है. यह अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास है.