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कर्मचारी कार्य करने के इच्छुक हैं तो नहीं लागू होता 'नो वर्क नो पे' का सिद्धांत: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

रीवा में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को फॉरेस्ट गार्ड पर स्थाई रूप से नियुक्त करने का मामला. 15 साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिला हक.

REWA FOREST GUARDS APPOINTMENT CASE
रीवा में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को फॉरेस्ट गार्ड पर स्थाई रूप से नियुक्त करने का मामला (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : March 3, 2026 at 12:14 PM IST

6 Min Read
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जबलपुर: हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि कर्मचारी कार्य करने के इच्छुक हैं तो ऐसी स्थिति में नो वर्क नो पे का सिद्धांत लागू नहीं होता है. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए रीवा वन विभाग के याचिकाकर्ताओं को बकाया वेतन, एरियर्स (Back wages) सहित सेवा संबंधित अन्य लाभ प्रदान करने के आदेश जारी किये हैं.

दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को फॉरेस्ट गार्ड पर नियुक्त करने का मामला

रीवा निवासी फॉरेस्ट गार्ड राजेश कुमार पांडे सहित अन्य की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि वन विभाग में साल 1980 में उनकी नियुक्ति दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के पद पर हुई थी. उन्होंने 20 साल से अधिक सेवा की थी. सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश पर प्रदेश सरकार ने उपयुक्त दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को फॉरेस्ट गार्ड पर स्थाई रूप से नियुक्ति करने का फैसला लिया था. मध्य प्रदेश के चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट ने सितम्बर 2008 को फॉरेस्ट गार्ड के 1500 खाली पदों को नोटिफाई किया गया था. जिनमें से 1006 पद जरूरी योग्यता पूरी करने के बाद भरे जाने थे.

रीवा सर्कल के चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट द्वारा 03.11.2008 जारी नोटिफिकेशन में 262 कैंडिडेट में से 217 कैंडिडेट कामयाब घोषित किए गए. जिसमें से 89 कैंडिडेट को अपॉइंट कर दिया गया और 92 पोस्ट खाली थीं. अपील करने वालों को, सिलेक्शन लिस्ट में शामिल होने और वेरिफिकेशन के लिए अपने टेस्टिमोनियल जमा करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद, अपॉइंटमेंट ऑर्डर जारी नहीं किए गए. सिलेक्शन लिस्ट की वैलिडिटी 28.05.2010 के ऑर्डर से बढ़ा दी गई थी.

अगस्त 2010 में दी नियुक्ति और सितंबर 2010 में कर दी निरस्त

अपीलकर्ताओं ने नोटिफिकेशन के अनुसार आवेदन किया था और लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और फिजिकल टेस्ट में सफल रहे. अपीलकर्ता को वेरिफिकेशन के लिए अपने टेस्टिमोनियल जमा करने का निर्देश देने के बावजूद नियुक्ति आदेश जारी नहीं किये गए. अपीलकर्ताओं को अगस्त 2010 में नियुक्ति पत्र जारी किए गए और फिजिकली और मेडिकली फिट घोषित होने के बाद उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली. एक माह बाद सितम्बर 2010 में उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई. जिसके खिलाफ उन्होने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.

हाईकोर्ट ने दिए स्टेट वाइज मेरिट लिस्ट बनाने के दिए आदेश

हाईकोर्ट ने जुलाई 2011 में आदेश जारी किये थे कि नियुक्ति के लिए जिला स्तर मेरिट लिस्ट जारी करना गलत थी. हाईकोर्ट ने स्टेट वाइज मेरिट लिस्ट बनाने और याचिकाकर्ताओं को मेरिट के हिसाब से नियुक्ति देने के निर्देश जारी किये थे. जिसके बाद युगलपीठ ने भी इसी आदेश को बरकरार रखा था. राज्य सरकार के द्वारा विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2015 को खारिज कर दिया था.

राज्य सरकार ने 2017 में फॉरेस्ट गार्डों को दी नियुक्ति

न्यायिक आदेश का पालन करते हुए राज्य सरकार ने स्टेट वाइज मेरिट लिस्ट लिस्ट तैयार की और अपीलकर्ता को जनवरी 2017 में प्रोवेशन पर फॉरेस्ट गार्ड के तौर पर नियुक्ति प्रदान की थी. जबकि उनसे कनिष्ठ और कम मेरिट वाले उम्मीदवारों को साल 2008 में ही नियुक्ति प्रदान कर दी गई थी. अपीलकर्ताओं ने वरिष्ठता और बकाया वेतन देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.

वन विभाग ने एरियर्स और अन्य लाभ देने से किया इंकार

हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2017 को याचिका का निराकरण करते हुए अपने आदेश में कहा था कि अपीलकर्ता को साल 2008 में कम काबिल उम्मीदवारों की नियुक्ति की तारीख से वरिष्ठता प्रदान की जाए. वन विभाग ने सैलरी का एरियर देने से इंकार कर दिया था. जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में दोबारा याचिका दायर की गई थी. एकलपीठ ने नवंबर 2023 में उक्त याचिका को खारिज कर दिया था. एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि याचिकाकर्ताओं की साल 2008 में नियुक्ति नहीं हुई थी. एकलपीठ के इस आदेश को याचिकाकर्ता ने फिर अपील दायर की थी.

एकलपीठ के आदेश के खिलाफ पुर्नरिवीजन याचिका की दायर

दोबारा दायर की गई याचिका में कहा गया था कि उनका चयन 16.09.2008 के नोटिफिकेशन के तहत शुरू हुई भर्ती प्रक्रिया के तहत हुआ था. उन्होंने चयन के सभी स्टेज सफलतापूर्वक पार कर लिए थे. साल 2008 में उनकी नियुक्ति सिर्फ जिलेवार मेरिट लिस्ट तैयार किये जाने के कारण नहीं हो पाई थी.

जिसे न्यायालय ने गलत माना था और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था. न्यायालय के आदेश पर स्टेट-वाइज मेरिट लिस्ट तैयार करने के बाद उन्हें 13.01.2017 को उन्हें नियुक्ति प्रदान की गई. पूर्व में पारित आदेश के अनुसार उन्हें वरिष्ठता प्रदान की गई. अपीलकर्ता हमेशा सेवा करने के लिए तैयार थे और अनावेदकों की गलत कार्रवाई की वजह से उन्हें अपनी ड्यूटी करने से रोका गया.

याचिकाकर्ताओं को बकाया वेतन, एरियर्स देने के आदेश

हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि "अपीलकर्ता साल 2008 में जारी नोटिफिकेशन के जरिए शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया के तहत सही तरीके से चयनित हुए थे. उस समय उनकी नियुक्तियां अयोग्यता की वजह से नहीं थीं बल्कि सिर्फ जिले के हिसाब से मेरिट लिस्ट नहीं बनाने के कारण निरस्त की गई थीं."

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "अपील करने वालों को साल 2008 से रेट्रोस्पेक्टिव सीनियरिटी दी गई है. रेट्रोस्पेक्टिव सीनियरिटी इस आधार पर दी गई कि अपील करने वालों को उस समय गलत तरीके से अपॉइंटमेंट देने से मना कर दिया गया था, तो उस बीच के समय के लिए सैलरी का एरियर न देना, निर्देशों को अधूरा और गलत तरीके से लागू करना है.

नो वर्क नो पे का सिद्धांत ऐसे मामले में मैकेनिकल तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, जहां कर्मचारी काम करने के लिए तैयार और इच्छुक था. लेकिन एम्प्लॉयर की गैर-कानूनी कार्रवाई की वजह से उसे ऐसा करने से रोक दिया गया. याचिकाकर्ता अपनी शुरुआती अपॉइंटमेंट की तारीख से सीनियरिटी और सैलरी के अंतर के हकदार हैं."