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मध्य प्रदेश में 10 साल बाद शुरू हो रही प्रमोशन प्रक्रिया पर मंडराया संकट! सपाक्स ने दी कड़ी चेतावनी

मध्य प्रदेश में 10 साल बाद प्रमोशन प्रक्रिया की नई नीति पर सरकार घिरी. सपाक्स ने कोर्ट के आदेशों की अनदेखी के लगाए आरोप.

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मध्य प्रदेश में 10 साल बाद शुरू हो रही प्रमोशन प्रक्रिया पर मंडराया संकट! (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : July 1, 2026 at 8:36 PM IST

4 Min Read
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भोपाल: मध्य प्रदेश में करीब 10 साल बाद सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति का रास्ता खुल गया है. सामान्य प्रशासन विभाग ने नई पदोन्नति नीति के तहत सभी विभागों को प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं. सरकार इसे कानूनी राय के आधार पर लिया गया वैधानिक फैसला बता रही है, लेकिन फैसले के साथ ही विवाद भी गहरा गया है.

सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था यानि सपाक्स ने सरकार पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए नई नीति का कड़ा विरोध किया है. संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया तो अदालत से लेकर प्रदेशव्यापी आंदोलन तक लड़ाई लड़ी जाएगी.

कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप

सपाक्स के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ के एस तोमर बताते हैं, "सरकार ने हाईकोर्ट में यह आश्वासन दिया था कि अंतिम फैसला आने तक पदोन्नति नहीं की जाएगी. इसके बावजूद नई पदोन्नति नीति लागू कर दी गई. 2002 के नियम पहले ही निरस्त हो चुके हैं, फिर भी उन्हीं नियमों के आधार पर लाभ पाने वालों को बनाए रखा गया है."

सपाक्स ने लगाया कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप (ETV Bharat)

उन्होंने मांग की है कि पहले ऐसे अधिकारियों को पदावनत किया जाए और ग्रेडेशन सूची में संशोधन किया जाए. डॉ तोमर ने आरोप लगाया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एम. नागराज और जरनैल सिंह फैसलों में क्रीमी लेयर संबंधी निर्देशों की भी अनदेखी की है. उनके अनुसार बिना पुराने विवाद सुलझाए नई पदोन्नतियां करना न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है.

आंदोलन और कानूनी लड़ाई की चेतावनी

प्रांतीय अध्यक्ष डॉ के एस तोमर ने कहा, "नई नीति से सामान्य, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों के साथ भेदभाव होगा और पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हो जाएंगे. उनका दावा है कि आरक्षण का लाभ लेकर आए कर्मचारियों को अनारक्षित पदों पर समायोजित करना मेरिट व्यवस्था के खिलाफ है."

उन्होंने आरोप लगाया कि "इससे प्रशासनिक व्यवस्था और विकास दोनों प्रभावित होंगे. सपाक्स ने सरकार को ज्ञापन सौंप दिया है और अब प्रदेश के सभी जिलों में विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे. संगठन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाएगा." डॉ तोमर ने सरकार पर विधि विभाग की राय लेने के बजाय निजी कानूनी सलाह के आधार पर निर्णय लेने का भी आरोप लगाया और कहा कि अंततः न्यायालय से उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद है.

2002 में प्रमोशन पाने वालों के डिमोशन की मांग

प्रांतीय अध्यक्ष डॉ के एस तोमर ने नई पदोन्नति नीति का विरोध करते हुए आरोप लगाते हुए कहा, "सरकार ने हाईकोर्ट में दिए गए आश्वासन और सुप्रीम कोर्ट की यथास्थिति की अनदेखी कर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू कर दी. 2002 के निरस्त नियमों से लाभ पाने वालों को पहले पदावनत यानि उनका डिमोशन किया जाना चाहिए. साथ ही क्रीमी लेयर संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी पालन नहीं किया गया."

'सामान्य, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के पास कम होंगे अवसर'

डॉ के एस तोमर ने कहा, "नई नीति से सामान्य, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर कम होंगे." सपाक्स ने सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी है कि संगठन प्रदेशभर में आंदोलन करेगा और जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगा. उनका आरोप है कि "सरकार ने विधि विभाग की राय के बजाय निजी कानूनी सलाह के आधार पर निर्णय लिया है."

सरकार के फैसले पर सपाक्स ने उठाए सवाल

मध्यप्रदेश सरकार ने करीब 10 साल से रुकी पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश जारी कर दिए हैं. सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों को आवश्यक कार्रवाई के आदेश दिए हैं. सरकार का कहना है कि वरिष्ठ अधिवक्ता की कानूनी राय के अनुसार पदोन्नति नियम-2025 पर हाईकोर्ट की कोई अंतरिम रोक नहीं है, इसलिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है.

कानूनी राय पर विवाद, आंदोलन की चेतावनी

सरकार का दावा है कि बदली परिस्थितियों और महाधिवक्ता कार्यालय की सहमति के बाद पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करना वैधानिक है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत होगी. डॉ के एस तोमर ने आरोप लगाया, "सरकार ने विधि विभाग की राय लेने के बजाय वरिष्ठ अधिवक्ता की सलाह के आधार पर फैसला लिया. इस निर्णय के खिलाफ प्रदेश भर में आंदोलन के साथ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती दी जाएगी."