सेंट्रल इंडिया टाइगर टूरिज्म कॉरिडोर से जुड़ेंगे 4 रिजर्व, पर्यटन करेगा मध्य प्रदेश की इकोनॉमी दुरुस्त
सेंट्रल इंडिया टाइगर टूरिज्म कॉरिडोर से जुड़ेंगे मध्य प्रदेश के 4 टाइगर रिजर्व, बनेगा 650 किमी लंबा कॉरिडोर, बाघों के संरक्षण के साथ बढ़ेगा पर्यटन.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : February 10, 2026 at 2:16 PM IST
|Updated : February 10, 2026 at 3:00 PM IST
सागर: दुनिया भर के बाघों में से 70 फीसदी बाघ अकेले भारत में निवास करते हैं. भारत की बाघों की कुल आबादी का आधे से ज्यादा हिस्सा मध्य भारत में निवास करता है. ऐसे में बाघों के संरक्षण के लिए भारत सरकार के भूतल परिवहन विभाग द्वारा मध्य भारत बाघ पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है. जिसको 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. इसमें प्रमुख रूप से पेंच, कान्हा, बांधवगढ़ और पन्ना टाइगर रिजर्व को फोरलेन के जरिए कनेक्ट किया जा रहा है.
इस कॉरिडोर के चलते दूसरे टाइगर रिजर्व अपने आप आपस में जुड़ जाएंगे. कॉरिडोर का उद्देश्य बाघ सुरक्षा, संरक्षण, आनुवांशिक विविधता, मानव और बाघ द्वंद कम करने के साथ पर्यटन के जरिए रोजगार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है. ये कॉरिडोर वन आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा.

4 टाइगर रिजर्व को फोरलेन से कनेक्ट कर टाइगर टूरिज्म कॉरिडोर
वैसे तो मध्य प्रदेश में टाइगर रिजर्व की संख्या 9 है, लेकिन मध्य भारत टाइगर टूरिज्म कॉरिडोर में 4 प्रमुख टाइगर रिजर्व को जोड़ा जा रहा है, क्योंकि दूसरे टाइगर रिजर्व प्रमुख मार्गों से जुड़े हुए हैं और इस कॉरिडोर के अस्तित्व में आने से लगभग सबकी कनेक्टिविटी आपस में हो जाएगी. इसमें पेंच, कान्हा, बांधवगढ़ और पन्ना टाइगर रिजर्व को जोड़ा जाएगा. ये मध्य प्रदेश के वो टाइगर रिजर्व हैं, जिनमें बाघों की संख्या काफी अच्छी है.

इस कॉरिडोर को बनाने में 5500 से लेकर 6000 करोड़ तक की लागत आ रही है. ये कॉरिडोर करीब 650 किमी लंबा होगा. इसका सबसे बड़ा फायदा मध्य प्रदेश में वाइल्डलाइफ टूरिज्म के लिए आने वाले देश और दुनिया के सैलानियों को होगा, जो मध्य प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व और जैवविविधता का आनंद ले सकेंगे.
प्राकृतिक रूप से भी टाइगर कॉरिडोर है मध्य भारत
फोरलेन के जरिए टाइगर रिजर्व को आपस में जोड़ना वाइल्डलाइफ टूरिज्म से रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है, लेकिन प्राकृतिक तौर पर देखें, तो मध्य भारत का काफी बड़ा हिस्सा बाघों के प्रमुख आवास और कॉरिडोर के तौर पर जाना जाता है. भारत में दुनिया के 70 फीसदी बाघ रहते हैं. भारत के बाघों के 37 प्रतिशत बाघ मध्य भारत में निवास करते हैं. जिसे बाघ संरक्षण के उद्देश्य से दुनिया भर में प्राथमिकता में रखा गया है.

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के करीब 152 हजार वर्ग किमी में करीब 14 संरक्षित वन है. जहां पर वनस्पति, वन्यजीव, जैव विविधता और नदियों जैसे कई जलस्त्रोत हैं, लेकिन यहां कोयला खनन, सड़क, रेलवे परियोजनाएं और अन्य गतिविधियों के कारण वन, वन्यजीव और जैवविविधता के कई तरह के खतरे उत्पन्न हो रहे हैं. इन बातों को ध्यान रखते हुए एक दूसरे संरक्षित वनों को आपस में जोड़ना बाघों और वन्यजीवों के अस्तित्व को बचाए रखने की पहल है.
आइए आंकड़ों से समझते हैं कि कैसे मध्य भारत दुनिया का जाना माना बाघों का बसेरा है.

- सागर-कानपुर फोरलेन बदलेगा बुंदेलखंड की किस्मत, हवा में बात करेंगे पहिए, चंद घंटों का सफर
- मध्य प्रदेश के दूसरे राज्यों से फासले होंगे कम, ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे और रिंग रोड बढ़ाएंगे कनेक्टिविटी
क्या कहते है जिम्मेदार
मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह कहते हैं कि "बाघ संरक्षण के साथ टूरिज्म को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ये कॉरिडोर बनाया जा रहा है. इसमें बाघों की सुरक्षा के साथ बाघों की आनुवांशिक विविधता में सुधार होगा. इस कॉरिडोर के कारण वन्यजीवों और इंसानों के बीच संघर्ष कम होगा. सबसे बड़ी बात ये है कि ये कॉरिडोर पर्यटन को बढ़ावा देगा और देश और दुनिया से वाइल्डलाइफ टूरिज्म के लिए आने वाले सैलानियों के लिए आसान सफर मुहैया कराएगा. इस कॉरिडोर को जबलपुर से जोड़ा जाएगा. केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इसे 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य दिया है."

