21,270 करोड़ का स्वास्थ्य बजट, लेकिन टूटी हड्डी पर गत्ता! CHC की तस्वीरों ने खोली बिहार के हेल्थ सिस्टम की पोल
मोतिहारी के सुगौली CHC में स्प्लिंट नहीं मिलने पर डॉक्टरों ने गत्ते से फ्रैक्चर बांधा. करोड़ों के स्वास्थ्य बजट पर गंभीर सवाल खड़े हुए.

Published : June 26, 2026 at 1:32 PM IST
मोतिहारी : बिहार सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है. वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बिहार स्वास्थ्य विभाग के लिए ₹21,270.40 करोड़ों का बजट प्रस्तावित किया गया है. लेकिन पूर्वी चंपारण के सुगौली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से सामने आई तस्वीरें पूछ रही हैं क्या इतने बड़े बजट के बाद भी टूटी हड्डी का इलाज गत्ते और कुछ बैंडेज के सहारे होगा?
चार मौतें, तीन एक ही परिवार के सदस्य : बुधवार को सुगौली थाना क्षेत्र के नयका टोला के पास टेंपू और पिकअप की आमने सामने टक्कर में चार लोगों की मौत हो गई थी. मृतकों में तीन लोग एक ही परिवार के थे. हादसे में चार अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जिन्हें इलाज के लिए सुगौली CHC लाया गया था.

स्प्लिंट नहीं मिला, गत्ते से बांधा पैर : घायलों में दो लोगों के पैर में फ्रैक्चर था. आरोप है कि अस्पताल में फ्रैक्चर को स्थिर रखने के लिए जरूरी स्प्लिंट तक उपलब्ध नहीं था. ऐसे में डॉक्टरों ने अस्पताल में पड़े बेकार गत्ते (कार्टन) को काटकर मरीज के पैर पर लगाया और पट्टी बांधकर प्राथमिक उपचार किया. यह तस्वीर अब सोशल मीडिया पर वायरल है. सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है.
डॉक्टर बोले मरीज को तत्काल राहत देना जरूरी था : ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों का कहना है कि मरीज की स्थिति गंभीर थी. फ्रैक्चर में हड्डी को तत्काल स्थिर करना जरूरी होता है, ताकि दर्द कम हो और हड्डी ज्यादा न खिसके. स्प्लिंट उपलब्ध नहीं होने के कारण अस्थायी व्यवस्था के तौर पर गत्ते का इस्तेमाल किया गया और बाद में मरीज को हायर सेंटर रेफर कर दिया गया.

सरकारी अस्पताल या जुगाड़ केंद्र?: सवाल डॉक्टरों की नीयत पर नहीं, डॉक्टरों ने जो भी अच्छा और उपलब्ध था उन्होंने वो किया. सवाल उस व्यवस्था पर है जिसने उन्हें गत्ते का सहारा लेने के लिए मजबूर कर दिया. जिस अस्पताल में स्प्लिंट, ऑर्थोपेडिक किट और जरूरी प्राथमिक चिकित्सा सामग्री तक उपलब्ध नहीं हो, वहां गंभीर सड़क हादसों के मरीजों का इलाज आखिर कैसे होगा?
गरीबों के सामने सबसे बड़ी मजबूरी : स्थानीय लोगों का कहना है कि गरीब मरीज निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते. सरकारी अस्पताल ही उनकी आखिरी उम्मीद होता है. लेकिन जब वहीं फ्रैक्चर के इलाज के लिए बुनियादी उपकरण नहीं मिलें, तो मरीज और उनके परिजन आखिर किस पर भरोसा करें?

रोज होते हैं हादसे, फिर भी तैयारी नहीं : सुगौली CHC में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं. सड़क दुर्घटनाओं के मामले भी अक्सर आते रहते हैं. इसके बावजूद अस्पताल में बेसिक ऑर्थोपेडिक सामग्री तक का अभाव यह बताता है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी तैयार है.
दावे हाईटेक, हकीकत जुगाड़ू : स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के नेतृत्व में सरकार आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बात कर रही है. लेकिन सुगौली की यह तस्वीर बता रही है कि कई जगहों पर मरीजों को आधुनिक चिकित्सा नहीं, बल्कि जुगाड़ू व्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है. करोड़ों का बजट अपनी जगह है, लेकिन अगर अस्पताल में एक स्प्लिंट तक उपलब्ध नहीं है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह व्यवस्था किसके लिए है?

सबसे बड़ा सवाल : टूटी हड्डी पर गत्ता बांधना डॉक्टरों की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यह स्वास्थ्य तंत्र की मजबूरी नहीं होनी चाहिए. बिहार के स्वास्थ्य सिस्टम की असली परीक्षा बजट भाषणों में नहीं, बल्कि ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में होती है, जहां गरीब अपनी जान बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. सुगौली की तस्वीरें यही पूछ रही हैं- क्या मरीजों को इलाज मिलेगा या फिर हर बार जुगाड़ ही स्वास्थ्य व्यवस्था का विकल्प बना रहेगा?
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