SURGUJIHA: वनाचंल में रहकर अनिरुद्ध नीरव ने सरगुजिहा को बनाया उत्कृष्ट साहित्य
21 फरवरी अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 भाषाओं के संरक्षण, बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने और भाषाई विविधता के प्रति जागरूक करने मनाया जाता है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : February 21, 2026 at 11:32 AM IST
देशदीपक गुप्ता की रिपोर्ट
सरगुजा: हमारे देश की मात्रभाषा तो हिन्दी है लेकिन पूरे देश में ना जाने कितनी स्थानीय बोली और भाषायें हैं. जिनमे वहां रहने वाले लोग बातचीत और लेखन का काम करते हैं. हर क्षेत्र अपनी रीजनल लैंग्वेज पर गर्व करता है और उसके उत्थान का प्रयास वहां रहने वाले साहित्यकारों के जिम्मे होता है. छत्तीसगढ़ में भी कई स्थानीय बोली है जिनमें से एक है सरगुजिहा. इस बोली को बोलचाल की भाषा में तो प्रयोग किया जाता लेकिन बदलते वक्त के साथ कुछ साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में भी सरगुजिहा को भी स्थान दिया. उस दौर के महान साहित्यकार अनिरुद्ध नीरव ने सरगुजिहा लेखन पर इतना गहरा काम किया कि इसे एक विशेष पहचान दिलाई.
अनिरुद्ध नीरव ने सरगुजिहा बोली को देश में दिलाई पहचान
नीरव के नव गीतों में पूरा सरगुजा बसता है. महज उनके गीतों को सुनकर आप पूरे सरगुजा भ्रमण की कल्पना कर सकते हैं. उनकी रचनाओं में सरगुजा की प्रकृति का समावेश दिखता है. साहित्यकार मानते हैं कि नीरव अपनी रचनाओं में उपमा यानी तुलना का जो स्तर रखते थे वो बड़ा ही आनंददायक है. कई साहित्यकारों ने सरगुजिहा बोली पर काम किया लेकिन नीरव ने इसे राष्ट्रीय मंच पर स्थान दिलाया. जब वो हिन्दी काव्य पाठ के लिए बाहर जाते तो वहां के मंचों पर सरगुजिहा गीत भी सुनाते. यही वजह थी कि जब देश के एक महान युवा साहित्यकार नीलोत्पल मृणाल सरगुजा पहुंचे तो उन्होंने मंच से नीरव की रचना "सरगुजा हवे छत्तीसगढ़ के मुरेठा" गाकर दर्शकों का दिल जीत लिया.

नीरव का जीवन परिचय
अनिरुद्ध नीरव का जन्म 1 जुलाई 1945 को हुआ .उन्होंने बी कॉम की पढ़ाई की और बैंक में सेवा देने लगे. बैंक की नौकरी के साथ हिन्दी साहित्य में उनका काम जारी रहा और इस बीच वो सरगुजिहा बोली से प्रभावित हुए और फिर 46 वर्षों तक सरगुजिहा में कविता व लेख लिखते रहे. उनकी कुछ रचनाएं इतनी प्रसिद्द हुई कि अंबिकापुर आकाशवाणी ने उसे अपना टाइटल सॉन्ग बना लिया. आज भी अंबिकापुर आकाशवाणी में उनका गीत "सरगुजा कर भुइंया के मया महतारी असन हाय रे" सुनाई देता है.
नीरव की रचना
अनिरुद्ध नीरव की प्रमुख रचनाओं का प्रकाशन धर्मयुग, नयाज्ञानोदय, हंस, वागर्थ, कादम्बिनी, अक्षरा, अक्षरपर्व, साम्य, परस्पर छत्तीसगढ़ी में प्रकाशित हुई. इनके गीत भी प्रकाशित हुए. आकशवाणी में नाटक रूपक प्रहसन का लेखन भी अनिरुद्ध नीरव ने किया था. इनके अनेक गीत जो आज भी सरगुजा के लोक कलाकारों के मंच पर सुनाई देते हैं. कई कलाकारों ने इनसे ही प्रेरणा लेकर अपनी यात्रा शुरू की. सरगुजिहा बोली के एक्सपर्ट के रूप में शासन के लिए काम करने वाले रंजीत सारथी ने भी इनसे ही सरगुजिहा साहित्य का सबक सीखा था.
सरगुजिहा कैसी बोली है
सरगुजा में बोली जाने वाली बोली मुख्यरूप से अवधी, बघेली, भोजपुरी और बघेली का मिश्रण जैसा है. इसके साथ ही इसमें यहां की बोली में गोंडी, कुडुख, कोरवाही, पनिकाही, राज्वारी, कन्वराही जातियों के अपने निजी संवाद के तरीकों का मिश्रण भी मिलता है. संवाद का आदिवासी तरीका इस बोली को बड़ा मधुर बनाता है. इस बोली में बड़ों के लिए आदर सूचक और छोटों के लिए स्नेह सूचक शब्दों का भी समावेश है.
उनके पीछे पीछे पैदल चला और बन गया साहित्यकार
छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम के लिए सरगुजिहा बोली के अनुवादक रंजीत सारथी कहते हैं "नीरव जी के गीतों को गाकर ही उन्होंने आकशवाणी अंबिकापुर का सफर तय किया. नीरव अपनी रचनाओं को लिखने के लिए उस स्थान पर ही जाकर रहते थे, जिस गांव, जिस समाज और जिस क्षेत्र पर उनको गीत लिखना होता था. वो प्रतिदिन पूरे शहर का चक्कर पैदल लगाया करते थे, तब मैं भी ऊनके पीछे पीछे चलता था, ताकी उनसे बातचीत करते हुए सरगुजिहा सीख सकूं, उनकी ही प्रेरणा से आज मैं साहित्यकार बन सका हूं."
पीयर पीयर गांव मोर गोही
गीतकार व गायक एमएल राही बताते है "हम लोगों की एक टीम थी जिसमे नीरव जी के भतीजे राजेन्द्र गुप्ता जी थे वो मेरे गुरु ही थे. उनके घर पर हम लोग बैठते थे. तो नीरव चाचा भी वहां आ जाते थे. उनके गीतों को जब हम लोग गाते थे और गलती होती थी तो वो बताते थे कि इस शब्द को इस तरह से बोलना है. फिर हम लोग सुधारकर उसको गाने का प्रयास करते थे. उनका जो गीत है वो माटी से जुड़ा हुआ है, उसमे आयातीत शब्द नहीं हैं. उनके शब्द बोलते हैं. मुझे भी उनके गीत आकाशवाणी में गाने का सौभाग्य मिला. उनका एक बड़ा ही प्यारा सरगुजिहा ग़ीत है " पीयर पीयर गांव मोर गोही. "

रायपुर साहित्य महोत्सव में अनिरुद्ध नीरव मंडप
युवा साहित्यकार संतोष दास कहते हैं "अनिरुद्ध नीरव सरगुजिहा साहित्य के पित्र पुरुष की तरह थे, हालही में रायपुर साहित्य महोत्सव में मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला वहां पर मैंने देखा कि उनके नाम से वहां पर एक मंडप बना हुआ है और वहां उनके नाम पर अलग अलग कार्यक्रम चल रहे हैं. यह सब देखकर मुझे बड़ा ही अच्छा लगा. सरगुजा के साहित्य को जिस उंचाई तक उन्होंने पहुंचाया, सरगुजा की मिट्टी की महक हम उनकी रचनाओं में सुनते हैं, बड़े राष्ट्रीय कवि नीलोत्पल मृणाल जब सरगुजा आये और उन्होंने नीरव जी की रचना को गाया ये बड़ा समय था. युवाओं को उनकी रचना पढ़नी चाहिए और सभी को ये प्रयास करना चाहिए कि अनिरुद्ध नीरव का साहित्य जन सामान्य तक उपलब्ध हो सके."

