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एक मंडप, दो पीढ़ियां और सात फेरे: गुमला में मां-बेटी ने एक साथ रचाई शादी, 121 'लिव-इन' पार्टनर्स का हुआ विवाह

गुमला के तिलगा गांव में 121 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया गया, जो वर्षों से लिव-इन में थे और सामाजिक बहिष्कार झेल रहे थे.

TILGA VILLAGE OF GUMLA
सामूहिक विवाह कार्यक्रम (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : February 23, 2026 at 2:01 PM IST

3 Min Read
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गुमला: तिलगा गांव में नवयुवक संघ ने 121 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया. ये जोड़े वर्षों से लिव-इन में थे और सामाजिक बहिष्कार झेल रहे थे. इस आयोजन से उन्हें सामाजिक पहचान और सम्मान मिला. एक ही मंडप में मां और बेटी ने अपने पतियों के साथ फेरे लिए. यह पहल उपेक्षित जिंदगियों के लिए उम्मीद बनी है.

गुमला सदर प्रखंड के तिलगा गांव में नवयुवक संघ द्वारा रविवार को आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि वर्षों से उपेक्षा और तिरस्कार झेल रहे कई परिवारों के लिए समाज में लौटने का द्वार बन गया.

विवाह के बंधन में बंधने वाले 121 जोड़ियों में वही लोग थे, जिन्हें कभी समाज ने स्वीकार नहीं किया, जो मजबूरी में वर्षों से लिव-इन रिलेशनशिप में जीवन गुजार रहे थे. सामाजिक बहिष्कार का दंश इतना गहरा था कि किसी भी शुभ कार्यक्रम में उनका प्रवेश वर्जित था.

उनकी पुश्तैनी प्रॉपर्टी पर भी उनके अधिकार छिन गए थे. उनकी पीड़ा यहीं नहीं रुकी, उनके बच्चे बड़े हुए, जवान हुए, लेकिन सामाजिक स्वीकृति के अभाव में उनकी भी शादियां नहीं हो सकीं. इस बेबसी ने कई जिंदगियों को भीतर से तोड़ दिया था.

एक ही मंडप में मां और बेटी ने लिए फेरे

विवाह मंडप में वह दृश्य हर आंख को नम कर गया, जब सात फेरे लेने आई आश्रिता उरांव अपने होने वाले पति के साथ और आश्रिता की मां झांझो उरांइन और पिता विष्णु उरांव एक ही मंडप में सात फेरे ले रहे थे.

फेरे लेने वालों में किसी के गोद में बच्चे थे, कोई मां बन चुकी थी, तो कोई उम्र की ढलान पर खड़े होकर अपने जीवन को सामाजिक पहचान देने आया था. ये फेरे केवल रीति नहीं थे, ये सम्मान, स्वीकार्यता और नए जीवन की उम्मीद के फेरे थे.

विवाह के बाद अब समाज करेगा स्वीकार

आंचल में छुपे आंसू और कांपते हाथों में बंधी मंगलसूत्र की डोर, वर्षों के दर्द को जैसे एक पल में बहा ले गई. इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि समाज अगर चाहे तो टूटे हुए रिश्तों को जोड़ सकता है, बिखरी हुई जिंदगियों को सम्मान के साथ अपना सकता है.

विवाह के बाद अब इन्हें समाज स्वीकार करेगा वे भी हर शुभ-अशुभ कार्यक्रम में शामिल होंगे, बच्चों का भविष्य भी सामान्य सामाजिक दायरे में आगे बढ़ेगा. तिलगा गांव की यह पहल एक उम्मीद बनकर उभरी है कि बहिष्कार की दीवारें गिर सकती हैं, और इंसानियत की जीत हो सकती है.

वैदिक मंत्रों के साथ-साथ जनजातीय परंपरा के गीत भी गाए गए. कार्यक्रम को सफल बनाने में नवयुवक संघ के संस्थापक सह सेवानिवृत पुलिस पदाधिकारी जगरनाथ उरांव, सेवानिवृति प्रशासनिक पदाधिकारी पुनई उरांव, सेवानिवृत कृषि पदाधिकारी विजय कुजूर और सतीश सहित काफी संख्या में लोग शामिल रहे.

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