शाहजहांपुर में होली से पहले मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढका गया, जानिए 'लाट साहब' की कहानी
जुलूस रूट पर पड़ने वाले मस्जिदों ओर मजारों पर कोई रंग न फेंक दे, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से ढक दिया जाता है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 24, 2026 at 6:43 PM IST
|Updated : February 24, 2026 at 6:52 PM IST
शाहजहांपुर : होली पर निकलने वाले पारंपरिक ‘लाट साहब’ जुलूस और उसमें होने वाली ‘जूतामार होली’ को देखते हुए इस बार प्रशासन ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं. जुलूस मार्ग में पड़ने वाली मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया गया है. साथ ही पिछले साल की तुलना में करीब डेढ़ गुना अधिक पुलिस बल और 200 से ज्यादा मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारियों की तैनाती की जाएगी.
शाहजहांपुर में पूरे विश्व की अनोखी जूतामार होली खेली जाती है. यहां एक शख्स को भैसागाड़ी पर बैठाया जाता है और फिर उसे जूते, चप्पल और झाड़ू से पीटा जाता है. इस तरह का जुलूस अंग्रेजों के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने के लिए निकाला जाता है. शाहजहांपुर में होली का त्योहार बेहद संवेदनशील माना जाता है. कोई शरारती तत्व मस्जिद और मजार पर रंग ना डाल दे, इसके लिए जिला प्रशासन ने मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया है.
नगर निगम के नगर आयुक्त डॉ. विपिन मिश्रा ने बताया, होली में बड़े लाट साहब का और छोटे लाट साहब का जुलूस निकलता है. बड़े लाट साहब के जुलूस रूट में 72 मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक दिया गया है. छोटे लाट साहब के रूट पर पड़ने वाली 20 मस्जिदों और मजारों को भी ढका गया है. 98 जगह बैरिकेडिंग का काम हो रहा है, ताकि कोई रंग ना डाल सके.
होली से आठ दिन पहले ही शाहजहांपुर की 92 से ज्यादा मस्जिदों और मजरों को तिरपाल से पूरी तरह से ढक दिया जाता है. जूतामार होली का जुलूस लगभग सात किलोमीटर लंबा निकाला जाता है. जुलूस में हजारों की संख्या में लोग होते हैं.
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. विकास खुराना ने बताया, शाहजहांपुर में रहने वाले नवाब अब्दुल्ला खान अपने परिवार से नाराज होकर फर्रुखाबाद चले गए थे और 1728 में जब लौटे तो संयोग से उस दिन होली थी. तब हिंदू-मुस्लिम समुदाय ने उनके साथ होली खेली और शहर का चक्कर लगाया, तभी से यह परंपरा शुरू हुई.
साल 1859 में अंग्रेजों ने शाहजहांपुर पर फिर से कब्जा कर लिया. उसके बाद जिला प्रशासन स्वयं नवाब साहब के जुलूस का आयोजन करने लगा. आजादी के बाद कई दशकों तक इसे ‘नवाब साहब का जुलूस’ कहा जाता रहा, लेकिन 1988 में तत्कालीन जिलाधिकारी कपिल देव ने इसका नाम ‘लाट साहब का जुलूस’ कर दिया. समय के साथ जुलूस का स्वरूप बदलता गया और ‘लाट साहब’ को जूते-चप्पलों से मारने की परंपरा शुरू हो गई.
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