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चंबल के संत ने 26 साल बाद फिर पहनी CRPF की वर्दी, ये संघर्ष और हौसले की सच्ची कहानी है

मुरैना के गिरवर सिंह तोमर की जिंदगी की कहानी थ्रिलर मूवी से कम नहीं. झकझोर देगी 26 साल की संघर्ष गाथा. ओमप्रकाश गोले की रिपोर्ट.

Morena Girvar Singh Tomar
गिरवर सिंह तोमर की जिंदगी की कहानी थ्रिलर मूवी से कम नहीं (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : September 2, 2026 at 6:50 PM IST

5 Min Read
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मुरैना : जिंदगी हर कदम एक नई जंग है... ये सच्ची कहानी एक ऐसे शख्स की है, जिसकी जिंदगी में कदम-कदम पर सस्पेंस और थ्रिलर है. जिस वर्दी को उतारकर संत का चोला पहना, 26 साल बाद उसी वर्दी में लौटने की ये सच्ची कहानी है मंदिर की सेवा, परिवार की जिम्मेदारी और हक की लड़ाई लड़ने वाले मुरैना निवासी गिरवर सिंह तोमर की.

गुफा तपसी बाबा मंदिर में डेरा डाला

सीआरपीएफ में हवलदार के रूप में सेवा दे रहे गिरवर सिंह का अपने अधिकारी से विवाद हुआ तो नौकरी से बर्खास्त हो गए. इसके बाद गिरवर सिंह ने मुरैना शहर के गुफा तपसी बाबा मंदिर को अपना आशियाना बना लिया. ढाई दशक तक संत बनकर भगवान की भक्ति और मंदिर सेवा करते रहे. इस दौरान परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं और न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते रहे. आखिरकार 26 साल बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें न्याय दिया और फिर गिरवर सिंह ने सीआरपीएफ की वर्दी पहन ली.

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चंबल के संत ने 26 साल बाद फिर पहनी सीआरपीएफ की वर्दी (ETV BHARAT)

1991 में सीआरपीएफ में नियुक्ति, 8 साल बाद बर्खास्त

मुरैना के छिछावली गांव निवासी 50 वर्षीय गिरवर सिंह तोमर को बचपन से ही सेना में जाने का जुनून था. किशोर अवस्था से तैयारी शुरू की और कड़ी मेहनत के बाद वर्ष 1991 में सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर चयनित हुए. करीब 8 साल तक नौकरी ठीक चली, लेकिन वर्ष 1999 में एक बड़े अधिकारी से बहस हो गई. यहीं से उनकी जिंदगी अचानक बदल गई. अधिकारी द्वारा उन्हें निलंबित किया गया और विभागीय जांच के बाद 21 अक्टूबर 1999 को सीआरपीएफ से बर्खास्त कर दिया गया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट में 26 साल तक कानूनी लड़ाई

नौकरी जाने के बाद गिरवर सिंह परेशान रहने लगे. कुछ समय घर पर रहने के बाद छिछावली गांव से करीब एक किलोमीटर दूर बारहद्वारी मंदिर में 4 से 5 साल बिताए. इसके बाद करीब 20 साल पहले मुरैना शहर की एमएस रोड स्थित गुफा तपसी बाबा मंदिर पहुंचे. यहां उन्होंने संत का जीवन अपना लिया. पूजा-पाठ और मंदिर सेवा करते हुए मुख्य पुजारी ने उन्हें गिरवरदास महाराज नाम दिया.

इस दौरान उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाईं और अपनी नौकरी वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी. पूरे 26 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्हें जीत मिली और सीआरपीएफ की वर्दी फिर लौटने का रास्ता साफ हुआ.

साल 2007 में केस जीता, स्टे ने फंसाया

बर्खास्तगी के विरोध में गिरवर सिंह ने वर्ष 1999 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में केस दायर किया. वर्ष 2007 में कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन सीआरपीएफ ने इसके खिलाफ स्टे ले लिया. इसके बाद गिरवर सिंह ने हाई कोर्ट की डबल बेंच में अपील की. कोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को सीआरपीएफ को आदेश दिया कि 3 महीने में गिरवर सिंह को दोबारा ज्वाइनिंग दी जाए. आदेश के बाद भी छह महीने तक ज्वाइनिंग नहीं मिली. उन्होंने कोर्ट और वकीलों के माध्यम से नोटिस जारी करवाए.

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इलाहाबाद हाई कोर्ट से मिली जीत के बाद गिरवर सिंह तोमर (ETV BHARAT)

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में मिली पोस्टिंग

सीआरपीएफ ने 26 साल पुराने मामले की फाइलें तलाशने में समय लगने का तर्क देकर राहत मांगी. आखिरकार 26 अगस्त को सीआरपीएफ ने गिरवर सिंह को दोबारा नौकरी पर रखने का आदेश जारी कर छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पोस्टिंग दी. गिरवर सिंह तोमर ने बताया "वह अब अपने प्रमोशन के लिए भी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे. देशसेवा का अवसर मिलने पर पूरी जिम्मेदारी निभाएंगे. नौकरी जाने के बाद उन्होंने संत का जीवन जरूर अपना लिया था, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी कभी नहीं छोड़ी."

गिरवर सिंह के परिवार में पत्नी मंजू देवी, दो बेटियां शिवानी और राधा तथा दो बेटे अभिषेक और कृष्णा हैं. उन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई और दोनों बेटियों की शादी की. उनका बेटा अभिषेक एयरफोर्स में है, जबकि छोटा बेटा कृष्णा अभी पढ़ाई कर रहा है.

20 साल बाद मंदिर छोड़ते वक्त भावुक हुए

गुफा मंदिर के महंत महामंडलेश्वर शिव शरण महाराज ने गिरवरदास की करीब 20 साल की तपस्या और संघर्ष को याद करते हुए बताया "वे मंदिर में सेवा के साथ पूजा-पाठ और भक्ति में पूरी तरह लीन रहते थे. बातचीत में अक्सर बताते थे कि वे पहले सीआरपीएफ में थे, लेकिन एक अधिकारी की कार्रवाई के चलते उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और नौकरी पाने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी. मंदिर की सेवा करते हुए वे केस की हर तारीख पर समय से पहुंचते रहे. मंदिर छोड़ते समय उनकी आंखें नम थीं. संघर्ष का सुखद अंत देखकर सभी को प्रसन्नता है."