नेपाल आपदा के बाद उत्तराखंड अलर्ट, ग्लेशियर झीलों की होगी मॉनिटरिंग, लगेंगे अर्ली वार्निंग सिस्टम
उत्तराखंड में फिलहाल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है. जिनमें से चार का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 27, 2026 at 7:37 PM IST
देहरादून: नेपाल में आई आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरों को लेकर तैयारियां तेज कर दी हैं. राज्य की 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी मजबूत करने के साथ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के निर्देश दिए गए हैं.
नेपाल में हाल में हुई आपदा के बाद उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में ग्लेशियर झीलों और उनसे जुड़े संभावित खतरों को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित और वैज्ञानिक निगरानी के साथ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के निर्देश दिए हैं. इसके साथ ही जरूरत के अनुसार सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण और संचार व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा.
उत्तराखंड में फिलहाल 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है. जिनमें से चार का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है. अब शेष झीलों का चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक सर्वे और अध्ययन कराया जाएगा. इसी क्रम में जल्द ही चमोली स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी स्थित केदारताल के सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना किया जाएगा. सर्वेक्षण के दौरान झीलों की मौजूदा स्थिति, जलस्तर, आकार में बदलाव, संभावित खतरे के कारकों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाएगा. सरकार का फोकस सिर्फ झीलों की निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संभावित आपदा का असर कम करने के लिए पहले से जरूरी इंतजाम करने पर भी रहेगा.
इसके तहत संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, संभावित प्रभावित इलाकों का चिन्हांकन, सुरक्षित निकासी मार्ग, स्थानीय चेतावनी तंत्र और राहत-बचाव की तैयारियों को मजबूत किया जाएगा. ग्लेशियर झीलों से रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था विकसित करने के साथ आधुनिक सेंसर और अर्ली वार्निंग उपकरणों की संख्या भी आवश्यकता के अनुसार बढ़ाई जाएगी.
नेपाल की घटना के बाद आपदा प्रबंधन विभाग ने सभी जिलाधिकारियों के साथ भी तैयारियों की समीक्षा की है. बैठक में ग्लेशियर झीलों के अलावा नदियों के जलस्तर, संवेदनशील स्थलों, अर्ली वार्निंग सिस्टम, संचार व्यवस्था और आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया की तैयारियों की समीक्षा की गई. जिलाधिकारियों को संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी और किसी भी असामान्य गतिविधि की तत्काल सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं.
नदियों और डैम से पानी छोड़ने पर भी नजर: राज्य सलाहकार समिति, आपदा प्रबंधन विभाग के उपाध्यक्ष विनय रुहेला ने कहा कि उत्तराखंड और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां काफी हद तक समान है. ऐसे में नेपाल की घटना से सीख लेते हुए प्रदेश में संभावित जोखिमों को लेकर पहले से तैयारी करना जरूरी है. उन्होंने संवेदनशील स्थलों की लगातार मॉनीटरिंग के साथ डैम और बैराज प्रबंधकों के साथ नियमित बैठकें करने के निर्देश दिए. डैम से पानी छोड़े जाने की स्थिति में निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को समय रहते अलर्ट करने पर भी जोर दिया गया.
स्थानीय स्तर पर मजबूत होगा अलर्ट सिस्टम: ले. कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने कहा हर आपदा अपने साथ महत्वपूर्ण सीख लेकर आती है. उन्होंने आपदा की स्थिति में स्थानीय स्तर पर मौजूद लोगों और प्रशासन की भूमिका को अहम बताते हुए ग्राम प्रधानों और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ मजबूत एवं त्वरित संचार नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया. सरकार की योजना अब ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें ग्लेशियर झील में किसी असामान्य बदलाव से लेकर संभावित खतरे की चेतावनी और प्रभावित आबादी तक सूचना पहुंचाने के बीच का समय न्यूनतम हो, इसके लिए तकनीकी निगरानी के साथ स्थानीय स्तर पर जागरूकता और आपदा प्रतिक्रिया क्षमता को भी मजबूत किया जाएगा.
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