Special : मोहता परिवार के सेवा का संकल्प बना 'वट वृक्ष', यहां 5 रुपए में होता है इलाज, 110 साल से जारी है सफर
बीकानेर की मोहता आयुर्वेद रसायनशाला 'नो प्रॉफिट-नो लॉस' के सिद्धांत पर शुद्ध औषधियों और निःशुल्क परामर्श के जरिए मानवता की सेवा कर रही है.

Published : February 20, 2026 at 2:48 PM IST
बीकानेर : रेलवे स्टेशन से उतरने के बाद सबसे पहले नजर आने वाली बिल्डिंग मोहता आयुर्वेद रसायनशाला आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है. 1915 में बीकानेर के मोहता परिवार की ओर से समाज सेवा की संकल्प के साथ शुरू किया गया एक औषधालय मरीजों की इलाज के लिए एक बेहतर स्थान बना और उसी की सफलता से मोहता रसायनशाला का निर्माण हुआ. बीकानेर में मोहता परिवार ने मरीजों के इलाज के लिए औषधालय की शुरुआत की और बाद में छोटे रूप में यहीं पर आयुर्वेदिक दवाइयों का निर्माण शुरू किया. आज इस और रसायन शाला में 500 से ज्यादा दवाइयां का निर्माण हो रहा. 80 से ज्यादा दवाइयां का पेटेंट रसायनशाला के पास है.
नो प्रॉफिट संस्था के रूप में काम : सामाजिक सरोकार के दृष्टिकोण से शुरू की गई इस संस्था में 110 साल बाद भी लाभ के लिए काम नहीं होता और संस्था में बनने वाली दवाइयों की लागत जितनी होती है उसकी बिक्री भी कमोबेश उसी मूल्य पर होती है. मतलब की संस्था में लाभ के लिए काम नहीं होता. संस्था के एचआर मैनेजर विक्रम सिंह राठौड़ कहते हैं कि अपने स्तर पर संस्था खुद पहले दिन से सक्षम है और "नो लॉस और नो प्रॉफिट" के सिद्धांत पर काम कर रही है. विक्रम राठौड़ बताते हैं कि आज भी संचालित औषधालय में इलाज के लिए दिखाने आने वाले मरीजों को 7 दिन की दवाइयां नि:शुल्क दी जाती है. केवल उन्हीं दवाइयों का भुगतान किया जाता है जो पैकेजिंग के रूप में मिलती है लेकिन वह भी किफायती दामों पर.
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बदलते समय में मार्केटिंग में भी सिद्धांत : संस्था की मार्केटिंग हेड मनोज पुरोहित ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में संस्था की कार्यशैली में बदलाव आया है और अब एक कॉरपोरेट शैली में संस्था काम कर रही है. लेकिन जिन सिद्धांत के साथ इसकी शुरुआत हुई उसमें किसी तरह का कोई समझौता नहीं है. केवल संस्था के द्वारा तैयार की जाने वाली दवाइयां का प्रचार प्रसार और आम लोगों तक उसकी पहुंच हो इसके लिए मार्केटिंग की जाती है ताकि लोगों में संस्था की दवाइयां पहुंचे. पुरोहित ने बताया कि हमारे यहां मार्केटिंग का मतलब रुपया कमाने से नहीं बल्कि प्रोडक्ट की मार्केटिंग से है ताकि लोग उसे रूबरू हो और उन्हें इसका फायदा मिले.

मानक स्तर और गुणवत्ता के साथ निर्माण : संस्था के महाप्रबंधक प्रमोद भट्ट कहते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और सरकार और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के मानक स्तर और गुणवत्ता के साथ यहां दवाइयां का निर्माण होता है. बाहर से मंगाई जाने वाली औषधीय और निर्माण सामग्री की भी गुणवत्ता की जांच हमारी खुद की बनाई लेब्रोरेटरी में होती है, ताकि मरीजों के इलाज में किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं हो.

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लोगों का विश्वास : रसायन शाला और औषधालय एक साथ ही संचालित है. यहां हर रोज करीब 200 से ज्यादा रोगी अपनी इलाज के लिए आते हैं और करीब 5 से 7 आयुर्वैदिक डॉक्टर उनके परामर्श के लिए यहां मौजूद रहते हैं जिनकी फीस मात्र 5 रुपए टोकन के रूप में है. औषधालय में मिलने वाली दवाइयां पूरी तरह से 7 दिन के लिए नि:शुल्क दी जाती है और यदि कोई दवा मरीज के लिए जरूरी है और ओषालय में भी नहीं है तो रसायनशाला के बिक्री केंद्र से मिल सकती है. यहां कार्यरत आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. सुनील बुढ़ानिया कहते हैं कि यह लोगों का विश्वास है इसीलिए यह क्रॉनिक डिजीज के इलाज के लिए लोग आते हैं और कई जगह जाकर भी उसका इलाज नहीं होता तो यहां आने से उसको लाभ मिलता है. लोगों का भरोसा आज तक कायम है.

धर्मार्थ में व्यापार नहीं : मुंबई रहने वाले मूल बीकानेर निवासी प्रदीप किराडू कहते हैं कि वे पिछले 10-12 सालों से इस रसायनशाला के औषधालय से जुड़े हुए हैं. पहले एसिडिटी की तकलीफ से पीड़ित होकर यहां इलाज के लिए आए थे और जब यहां के बारे में सुना और देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि संस्था इतने बड़े सेट अप के साथ समाज सेवा और धर्मार्थ की कार्य से जुड़ी हुई है. ऐसे में जब यह लोग लाभ के लिए काम नहीं कर रहे तो तो गुणवत्तापूर्ण काम होने से मरीज को भी फायदा होता है.

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बीकानेर में 6 औषधालय एक अब जोधपुर में : दरअसल मोहता परिवार द्वारा बीकानेर में शुरुआत में एक औषधालय की शुरुआत की गई. बाद में बीकानेर में अलग-अलग पांच जगह पर और औषधालय खोली गई. पिछले दिनों जोधपुर में भी एक और औषधालय खोला गया है और अब संस्था का प्रयास है कि प्रदेश के हर जिले में इसका दायरा बढ़े. वहीं रसायन शाला में बनने वाली दवाइयां भी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. वर्तमान में राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में अपने काउंटर्स के माध्यम से दवाइयां की बिक्री कर रही है.





