दुनिया की धरोहरों को बदलेंगे मोहन यादव! वर्ल्ड हेरिटेज भीमबेटका, रातापानी के नए नामों का ऐलान
रायसेन में मौजूद वर्ल्ड हैरिटेज साइट भीमबेटका अब डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम से जाना जाएगा. राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में मोहन यादव का ऐलान.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 9, 2026 at 4:22 PM IST
|Updated : January 9, 2026 at 6:27 PM IST
भोपाल: राजधानी भोपाल से सटे रायसेन में मौजूद वर्ल्ड हैरिटेज साइट भीमबेटका का नाम बदलने जा रहा है. अब इसे डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम से जाना जाएगा. मुख्यमंत्री ने इसका नाम बदलने का ऐलान किया है. भीमबेटका रातापानी अभ्यारण्य क्षेत्र में आता है, इसलिए रातापानी अभ्यारण्य का नाम भी डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर अभ्यारण्य किया जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में आयोजित डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में यह ऐलान किया. इस साल इस पुरस्कार से पुरातत्वविद पद्मश्री डॉ.यशोधर मठपाल को सम्मानित किया गया.
भीमबेटका और रातापानी अभ्यारण्य का बदला जाएगा नाम
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में यह ऐलान किया कि भीमबेटका और रातापानी अभ्यारण्य का नाम बदलकर इसे डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम से किया जाएगा. डॉ मोहन यादव ने बताया कि "भोपाल से नागपुर जाते वक्त ट्रेन से इन चट्टानों को देखा और फिर अगले स्टेशन पर उतर गए और घने जंगल में घूमकर उन्होंने भीमबेटका को खोज. जिसके चित्रों के बारे में कहा जाता है कि वे लाखों साल पुराने हैं. इसलिए अब भीमबेटका को डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम से जाना जाएगा. यह पूरा वन क्षेत्र भी उनके नाम से जाना जाएगा."
1957 में की थी भीमबेटका की गुफाओं की खोज
वाकणकर के काम को पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने आगे बढ़ाने का काम किया है. उन्होंने वाकणकर के साथ लंबे समय तक काम किया. इसलिए मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें आज पुरस्कृत किया है. भीमबेटका राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले में मौजूद है. डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने वर्ष 1957 में भीमबेटका की गुफाओं की खोज की थी। इन शैलाश्रयों में प्रागैतिहासिक काल के करीबन 400 शैल चित्र पाए गए. इनकी कार्बन डेटिंग कराई गई, जो लाखों साल पुराने पाए गए.

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'वाकणकर की वजह से मुश्किल में पड़ गए थे सीएम'
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि "वाकणकर ने अपना पूरा जीवन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में बिता दिया. उन्होंने अपने शोध से देश की समृद्ध प्राचीन संस्कृति और सभ्यता से पूरे विश्व को परिचित कराया. उन्होंने अपने शोध से बताया कि सरस्वती नदी भारत में बहती थी, उन्होंने इस नदी का मार्ग भी बताया."
डॉ मोहन यादव ने बताया कि "वे संघ से जुड़े हुए थे, इसलिए जब वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें पद्म श्री दिए जाने का ऐलान किया, तो तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी के सामने संकट खड़ा हो गया. वाकणकर ने कह दिया कि वे संघ की गणवेश में ही जाएंगे, बाद में सेठी जी ने उन्हें जैसे-तैसे मनाया और सिर्फ संघ की टोपी पहनने के लिए तैयार किया."

