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आसमान में आज दिखेंगी तीन शानदार खगोलीय घटनाएं, जानिए कब और कैसे देखें?

पृथ्वी अपनी कक्षा (orbit) में सूर्य के सबसे निकटतम बिंदु पर होगी. उल्का वृष्टि और वुल्फ मून का कर सकेंगे दीदार

खगोलीय घटनाओं की तस्वीर.
खगोलीय घटनाओं की तस्वीर. (Astronomer Amarpal Singh)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : January 3, 2026 at 7:03 AM IST

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गोरखपुर: नए साल के तीसरे दिन आसमान में अद्भुत नजरे देखने को मिलेंगे. 3 जनवरी को पूर्णिमा होने के कारण फुल मून (पूर्ण चाँद) भी होगा. इस दिन चांद पूरी तरह से चमकता हुआ दिखाई देगा, जिसे जनवरी का “Wolf Moon” (वुल्फ मून) कहा जाता है. इस दौरान उल्का वर्षा भी होगी. हालांकि पूर्णिमा की उजली चांदनी के कारण उल्काएं देखने में कुछ थोड़ी सी कठिनाई भी हो सकती है.

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला गोरखपुर के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी हर साल जनवरी माह के शुरुआत में सूर्य के सबसे करीब होती है. ऐसा तब होता है जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों का मौसम होता है. सर्दियों के दौरान उत्तरी गोलार्ध सूर्य से दूर झुका हुआ होता है, इसलिए तिरछी किरणें प्राप्त होती है. जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट आ जाती है तो इसे पेरीहेलियन कहा जाता है.

खगोलविद अमर पाल सिंह . (ETV Bharat)

पैरी का अर्थ निकट और हेलिओस का है सूर्य. सौर मण्डल में परिक्रमा करने वाले आकाशीय पिंड या प्राकृतिक पिंड पूर्णतया वृताकार पथ में नहीं बल्कि वे सभी अंडाकार (ओवल) या दीर्घवृत्ताकार पथ में परिक्रमा कर रहे हैं. धरती भी सूर्य की परिक्रमा दीर्घवृत्ताकार पथ में ही करती है. जिसका अर्थ है कि इस पथ पर एक बिंदु सूर्य के सबसे निकट है और एक बिंदु सूर्य से सबसे दूर है.

खगोलविद ने बताया कि जनवरी की शुरुआत में सूर्य से लगभग 3% करीब हैं, जो लगभग (147.01 मिलियन किलोमीटर) होता है. लेकिन पेरीहेलियन मोटे तौर पर दिसंबर संक्रांति के लगभग 2 सप्ताह बाद होता है. सूर्य से दूरी ऋतु परिवर्तन का कारण नहीं बल्कि यह पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है जो लगभग (23.5 डिग्री है). इसे पृथ्वी पर ऋतुओं के परिवर्तन का कारण बनता है. इस दौरान उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की रोशनी सबसे कम सीधी पड़ती है, इसलिए उन्हें सर्दी का सामना करना पड़ता है.

खगोलविद ने बताया कि 3 जनवरी 2026 को उपसौर (Perihelion) है. इस दिन पृथ्वी अपनी कक्षा (orbit) में सूर्य के सबसे निकटतम बिंदु पर होगी. खगोलीय गणनाओं के अनुसार, यह घटना भारतीय समयानुसार (IST) रात के लगभग 10:45 बजे पर होगी. उपसौर के दौरान पृथ्वी सूर्य से लगभग 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर (91.4 मिलियन मील) की दूरी पर होगी. जो इसकी कक्षा का वह बिंदु है जहाँ यह सूर्य के सबसे निकट होती है.

जनवरी में उत्तरी गोलार्ध सूर्य से दूर झुका होता है, इसलिए हमें कम धूप और ठंड मिलती है. 3 जनवरी को एक विशेष संयोग ही घटित हो रहा है, क्योंकि इस साल का पहला वुल्फ फुल मून (Wolf full Moon) दिखाई देगा, जो खगोल विज्ञान में रुचि रखते वाले खगोल प्रेमियों के लिए बहुत ख़ास होने बाला है.

कैसे और कब देखें ये वूल्फ फुल मून: खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल विज्ञान की भाषा में (Wolf moon) वुल्फ मून जनवरी की पूर्णिमा को कहा जाता है. जब चंद्रमा पृथ्वी के करीब होते हुए सामान्य से कुछ बड़ा और चमकीला दिखाई देता है. इसे वुल्फ मून इसलिए कहा जाता है. क्योंकि पुराने जमाने में ग्रामीण इलाकों में सर्दियों में भेड़ियों की आवाजें कुछ ज्यादा सुनाई देती थीं, जिस के कारण इसका यह नाम वुल्फ मून पड़ा. साफ मौसम में इसे बिना किसी ख़ास खगोलीय उपकरण के आसानी से देखा जा सकता है.

पूर्णिमा तब होती है, जब चंद्रमा पृथ्वी के दूसरी तरफ होता है जो सूर्य के सामने होता है और इसका चेहरा पूरी तरह से प्रकाशित होता है. चूंकि चंद्रमा का कक्ष पृथ्वी के सापेक्ष अण्डाकार होता है, इसलिए चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी पूरे महीने में बदलती रहती है. पूर्ण चंद्र के दौरान चंद्रमा अपनी उच्च अवस्था में दिखाई देगा.

खगोलविद ने बताया कि उल्का वृष्टि रात 12 बजे के बाद से भोर तक उत्तर पूर्वी आकाश में यह नजारा स्पष्ट दिखाई देगा. उल्काएं, बूट्स ( bootes ) तारामण्डल के पास से निकलती हुईं प्रतीत होंगी. जिसे इसका रेडियंट पॉइंट कहा जाता है, जो सप्तऋषि के पास स्थित है. अगर आप के पास छोटी दूरबीन या बाईनोकुलर या कैमरा युक्त छोटी दूरबीन भी हैं तो स्पष्ट देख सकते हैं.

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