Special: शहादत के 78 साल बाद भी अपनों के हक की लड़ाई, मिलिए शेरगढ़ के वीर शहीद राइफलमैन धोंकल सिंह भाटी के परिवार से
1948 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए धोंकल सिंह भाटी का परिवार आज भी गांव में स्मारक और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है. पढ़िए मनोज वर्मा की रिपोर्ट..

Published : June 27, 2026 at 8:29 AM IST
|Updated : June 27, 2026 at 8:39 AM IST
जोधपुर : राजस्थान की मरुधरा ने देश को हमेशा ऐसे जांबाज दिए हैं, जिनकी वीरता की गाथाएं इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज हैं. जोधपुर का शेरगढ़ इलाका एक ऐसा ही सैन्य बाहुल्य क्षेत्र है, जहां के लगभग हर घर से कोई न कोई सदस्य सेना में रहकर देश की सेवा कर रहा है. इसी वीर धरा के एक सपूत को आज से ठीक 78 साल पहले देश का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य सम्मान 'महावीर चक्र' मिला था.
आज भी अपनों के हक के लिए तरस रहा परिवार : हैरान करने वाली बात यह है कि आज की आम जनता को इस महानायक के बारे में शायद ही कोई जानकारी हो. इसका कारण यह है कि यह सर्वोच्च सम्मान देश के आजाद होते ही साल 1948 में पाकिस्तान के साथ हुए पहले युद्ध में मिली शहादत पर दिया गया था. इस महान शहीद का नाम है राइफलमैन धोंकल सिंह भाटी. आज उनकी शहादत को करीब आठ दशक बीत चुके हैं, लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि उनका परिवार आज भी उनके मान-सम्मान और एक अदद स्मारक के लिए प्रशासनिक व्यवस्था से संघर्ष कर रहा है. परिवार चाहता है कि उनका स्मारक उनके गांव में घर के पास बने जिसके लिए एक बीघा जमीन भी दे दी है.
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महज 25 साल की उम्र और 5 पाकिस्तानियों का खात्मा : शहीद धोंकल सिंह भाटी का जन्म 1 दिसंबर 1923 को जोधपुर के जूनावास गांव में हुआ था. देश सेवा का जज्बा ऐसा था कि वे 1 दिसंबर 1944 को भारतीय सेना में भर्ती हो गए. कठिन ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्हें सेना की प्रतिष्ठित '6 राजपूताना राइफल्स' में नियुक्ति मिली. साल 1948 में जब कबीलाइयों के भेष में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला किया, तब धोंकल सिंह की पलटन को मोर्चे पर भेजा गया. 30 अप्रैल 1948 को राइफलमैन धोंकल सिंह की पलटन को कश्मीर के उरी सेक्टर में दक्षिण की तरफ 'पॉइंट 8370' पर कब्जा करने का बेहद कठिन और महत्वपूर्ण जिम्मा सौंपा गया था.

जैसे ही धोंकल सिंह अपनी पलटन का नेतृत्व करते हुए दुश्मन के ठिकाने के करीब पहुंचे, पाकिस्तानी सेना ने एलएमजी (लाइट मशीन गन) से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. इस गोलाबारी में एक गोली सीधे धोंकल सिंह के बाएं कंधे में जा लगी और वे गंभीर रूप से घायल हो गए. लेकिन इस वीर राजपूत के कदम पीछे नहीं हटे. अत्यधिक खून बहने के बावजूद वे जमीन पर रेंगते हुए आगे बढ़े और एक सटीक ग्रेनेड फेंककर दुश्मन के बंकर (संगर) को पूरी तरह तबाह कर दिया. इस धमाके में तीन पाकिस्तानी सैनिक मौके पर ही ढेर हो गए. इस बहादुरी के दौरान दुश्मन के जवाबी ग्रेनेड के छर्रे धोंकल सिंह के सीने और चेहरे पर भी लगे. वे लहूलुहान हो चुके थे, लेकिन उनका हौसला अटूट था. उन्होंने एक और ग्रेनेड फेंका और भाग रहे दो अन्य दुश्मनों को भी मार गिराया, जिसमें उनका एक कमांडर भी शामिल था. अपनी चौकी को दुश्मन के चंगुल से मुक्त कराने के बाद, अत्यधिक रक्तस्राव के कारण इस 25 वर्षीय कुंवारे नौजवान ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. उनके इसी अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत 'महावीर चक्र' से नवाजा गया.

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धोंकल सिंह भाटी महज 25 वर्ष की आयु में पांच पाकिस्तानियों को खत्म कर शहीद हो गए थे. अविवाहित थे. अब उनके भतीजे खेतसिंह उनके घर पर रहते हैं. वो कहते हैं कि जमीन और चाहिए तो मैं दे दूंगा लेकिन यहां पर ही मूर्ति लगनी चाहिए. शेरगढ की शेखाला पंचायत समिति का गांव जूनावास जिसे अब गोगादेव गढ़ के नाम से जाना जाता हैं. यही महावीर चक्र से सम्मानित राइफल मैन धोंकल सिंह भाटी का गांव हैं. उनके घर जाने के लिए खेतों में से ही निकलना पड़ता हैं. धोंकल सिंह के परिवार के युवा सांग सिंह ने बताया कि तीन साल से रास्ते के लिए भटकने के बाद अब जाकर स्वीकृति मिली हैं. उम्मीद है कि अब घर के नजदीक तक सड़क आ जाएगी, लेकिन आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव हैं.

गोगादेवगढ़ गांव के सरपंच प्रतिनिधि देवीलाल ने बताया कि परिवार अनपढ़ होने से यह परेशानी हुई हैं. हमनें 12वीं तक की स्कूल का नाम इनके नाम करने के प्रस्ताव के लिए सैनिक कार्यालय से बात कर ली है, जल्द इसका प्रस्ताव भेज रहे हैं. इसके अलावा इनके घर तक सड़क के लिए आदेश जल्द आ जाएगा. देवीलाल ने बताया कि स्थानीय विधायक ने हाल ही में शहीद के घर के पास ही वाचनालय बनाने के लिए पांच लाख रुपए का अनुदान पारित करवाया हैं. शेखाला निवासी पूर्व सैनिक अनूपसिंह ने बताया कि महावीर चक्र बहुत बड़ा सम्मान हैं. आने वाले दिनों में हमारे क्षेत्र में सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेमसिंह बाजौर एक शहीद की मूर्ति का अनावरण करने आएंगे हम धोंकलसिंह भाटी के स्मारक की मांग रखेंगे.

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सेना ने तो अपने इस रणबांकुरे को कभी नहीं भुलाया. मुख्य हाईवे पर बालेसर के पास कुई जोधा स्थित जिला सैनिक कल्याण कार्यालय में 29 जनवरी 2008 को शहीद धोंकल सिंह भाटी की भव्य मूर्ति स्थापित की गई और उनके नाम से एक स्मृति भवन भी बनाया गया. लेकिन कड़वा सच यह है कि उनके अपने पैतृक गांव में उन्हें वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे. धोंकल सिंह अविवाहित थे, इसलिए आज उनके भतीजे खेतसिंह उनके पुराने घर में रहते हैं, जहां राइफलमैन का एक छोटा सा 'थान' (धार्मिक स्थल) बना हुआ है. जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कर्नल बलदेवसिंह चौधरी ने बताया कि महावीर चक्र बहुत बड़ा सम्मान हैं. मैं खुद उनके गांव जाकर आया था, लोगों से कहा कि इनको सम्मान देना चाहिए. मेरे पास स्कूल नामकरण की फाइल आते ही शिक्षा विभाग भेज दूंगा.

शूरवीरों की खान है जोधपुर का यह इलाका : जोधपुर जिला (फलोदी सहित) से हजारों। की संख्या जवान फौज में सेवा देते रहे हैं. खासतौर से शेरगढ़ और बालेसर इलाके से लगभग हर घर से या तो कोई सेवा में सेवा दे रहा है या कोई न कोई रिटायर्ड आदमी मिल जाता है. बालेसर स्थित सैनिक कल्याण कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, अकेले जोधपुर जिले से 16 जांबाज सैनिकों को अलग-अलग गैलंट्री अवॉर्ड्स (वीरता पुरस्कार) मिल चुके हैं. इनमें 1962 के युद्ध के नायक मेजर शैतान सिंह भाटी को 'परमवीर चक्र' (मरणोपरांत) मिला, जबकि ब्रिगेडियर उदय सिंह भाटी और राइफलमैन धोंकल सिंह को 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया गया. इसके अलावा सूबेदार मेघ सिंह और राइफलमैन मोहन सिंह को 'वीर चक्र', जबकि लेफ्टिनेंट कर्नल माल सिंह, हवलदार छतर सिंह, सूबेदार मेजर समंद खान और सूबेदार गंगाराम को उनकी उत्कृष्ट वीरता के लिए 'शौर्य चक्र' से नवाजा जा चुका है. इनके साथ ही सात अन्य सैनिकों को 'सेना मेडल' भी मिल चुके हैं. ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासन अब कागजी फाइलों से बाहर निकलकर धोंकल सिंह भाटी के परिवार की मांगों को जल्द पूरा करेगा, ताकि देश के लिए जान देने वाले इस महावीर को उनके अपने ही गांव में सच्ची श्रद्धांजलि मिल सके.

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