जिस पराली को जलाकर बढ़ता था प्रदूषण, उसी से फैक्ट्रियों का जहरीला पानी होगा साफ, एमडीयू ने तैयार किया जहरीली धातुएं सोखने वाला नैनो कंपोजिट
एमडीयू शोध में धान की भूसी से बना नैनो कंपोजिट औद्योगिक पानी से क्रोमियम और सीसा हटाने में प्रभावी साबित हुआ.

Published : August 25, 2026 at 2:19 PM IST
रोहतक: धान की पराली और भूसी को अक्सर खेतों में जलने वाले कचरे के तौर पर देखा जाता है, लेकिन महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में हुई एक रिसर्च ने इसे प्रदूषण कम करने के संभावित संसाधन के रूप में सामने रखा है. बढ़ते वायु प्रदूषण, औद्योगिक जल प्रदूषण और क्लाइमेट चेंज की चुनौती के बीच शोधकर्ताओं ने धान की भूसी से तैयार जैव-कोयले को वैज्ञानिक तरीके से संशोधित कर ऐसा नैनो कंपोजिट तैयार किया है, जो फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले पानी में मौजूद भारी धातुओं को काफी हद तक कम कर सकता है.
अनु ने प्रो. रचना के मार्गदर्शन में किया शोध: एमडीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की शोधार्थी अनु कुमारी ने प्रोफेसर डॉ. रचना भाटेरिया के मार्गदर्शन में यह अध्ययन किया. शोध में धान की भूसी से तैयार जैव-कोयले को अलग-अलग पदार्थों के साथ संशोधित कर उसकी प्रदूषक सोखने की क्षमता का परीक्षण किया गया. अध्ययन का फोकस खास तौर पर औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद क्रोमियम-6 और सीसे जैसे खतरनाक भारी धातुओं को कम करने पर रहा.
वास्तविक औद्योगिक पानी में भी किया परीक्षण: इस रिसर्च की खास बात यह है कि इसका परीक्षण केवल प्रयोगशाला में तैयार पानी तक सीमित नहीं रहा. शोधकर्ताओं ने रोहतक से प्राप्त वास्तविक इलेक्ट्रोप्लेटिंग अपशिष्ट जल पर भी नैनो कंपोजिट का परीक्षण किया. शोध के अनुसार वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल में क्रोमियम-6 की मात्रा को 86.88 प्रतिशत और सीसे को 85.10 प्रतिशत तक कम किया गया. इससे इस तकनीक के वास्तविक औद्योगिक परिस्थितियों में उपयोग की संभावना मजबूत होती है.
प्रयोगशाला में क्रोमियम-6 पर 91.45 प्रतिशत तक असर: प्रयोगशाला में तैयार प्रदूषित पानी पर नैनो कंपोजिट का प्रदर्शन और बेहतर रहा. अध्ययन के दौरान क्रोमियम-6 को हटाने की अधिकतम क्षमता 91.45 प्रतिशत, जबकि सीसे को हटाने की क्षमता 89.34 प्रतिशत तक दर्ज की गई. शोधकर्ताओं के मुताबिक ये परिणाम संकेत देते हैं कि कृषि अपशिष्ट से तैयार सामग्री को वैज्ञानिक तरीके से संशोधित कर औद्योगिक जल शोधन में इस्तेमाल किया जा सकता है.

तीन तरह के जैव-कोयले की हुई तुलना: शोध में सामान्य जैव-कोयले के अलावा जिंक ऑक्साइड से संशोधित जैव-कोयला और आयरन ऑक्साइड से संशोधित जैव-कोयले की तुलना की गई. तीनों सामग्रियों की प्रदूषक हटाने की क्षमता का परीक्षण करने के बाद आयरन ऑक्साइड से संशोधित जैव-कोयला सबसे प्रभावी पाया गया. इसके जरिए भारी धातुओं को सोखने की क्षमता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया.
ऐसे तैयार हुआ जहरीले पानी को साफ करने वाला पदार्थ: शोध के दौरान सबसे पहले धान की भूसी को नियंत्रित तापीय प्रक्रिया के जरिए जैव-कोयले में बदला गया. इसके बाद जैव-कोयले को जिंक ऑक्साइड और आयरन ऑक्साइड से संशोधित किया गया. इस प्रक्रिया से इसकी सतह के ऐसे गुण विकसित हुए, जिनसे पानी में मौजूद भारी धातुओं को सोखने की क्षमता बढ़ गई. यानी जिस कृषि अपशिष्ट को बेकार समझकर जला दिया जाता था, उसी को प्रदूषित पानी से हानिकारक तत्व हटाने वाली सामग्री में बदलने का प्रयास किया गया.

क्रोमियम-6 और सीसा स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा: औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद भारी धातुएं पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं. क्रोमियम-6 अत्यधिक विषैला औद्योगिक प्रदूषक माना जाता है और इसके लंबे समय तक संपर्क को गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से जोड़ा जाता है. वहीं सीसा शरीर में जमा होकर तंत्रिका तंत्र, रक्त निर्माण और गुर्दों को प्रभावित कर सकता है. बच्चों पर सीसे के संपर्क का असर विशेष रूप से चिंता का विषय माना जाता है.
प्रो. रचना बोलीं- एक साथ दो समस्याओं का समाधान: ईटीवी भारत ने प्रोफेसर डॉ. रचना भाटेरिया से बातचीत की. बातचीक के दौरान डॉ रचना ने कहा कि, "हमने धान की पराली पर इसलिए काम किया, क्योंकि किसान इसे जलाते हैं और इससे प्रदूषण बढ़ता है. हमारा प्रयास है कि इसी कृषि अपशिष्ट का उपयोग पर्यावरण संरक्षण में किया जाए. उद्योगों का चलना भी जरूरी है, लेकिन औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले जहरीले पानी का उचित उपचार भी उतना ही जरूरी है."

पराली जलाने की समस्या भी हो सकती है कम: डॉ. रचना भाटेरिया ने कहा कि, "अगर पराली को जलाने के बजाय उसका उपयोग जैव-कोयला और नैनो कंपोजिट तैयार करने में किया जाए, तो इसके दो फायदे हो सकते हैं. एक तरफ खेतों में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी, दूसरी तरफ औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद खतरनाक तत्वों को कम करने का विकल्प मिलेगा. इस तरह कृषि अपशिष्ट को समस्या के बजाय उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है."
क्लाइमेट चेंज के दौर में उपयोगी पहल: क्लाइमेट चेंज, बढ़ती गर्मी और हीटवेव जैसी चुनौतियों के बीच प्रदूषण कम करने के लिए स्थानीय और कम लागत वाले विकल्पों की जरूरत बढ़ रही है. पराली जलाने से निकलने वाले प्रदूषक पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं. ऐसे में धान की भूसी का वैज्ञानिक उपयोग कृषि अवशेष प्रबंधन के साथ-साथ औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में भी उपयोगी साबित हो सकता है.
करीब डेढ़ डॉलर की लागत ने बढ़ाई उम्मीद: शोध में किए गए लागत-लाभ विश्लेषण के अनुसार सीसा हटाने की अनुमानित लागत करीब 1.63 डॉलर, जबकि क्रोमियम-6 हटाने की लागत करीब 1.66 डॉलर रही. कम लागत में प्रदूषक हटाने की क्षमता इस तकनीक को भविष्य में कम खर्च वाले जल शोधन विकल्प के तौर पर विकसित करने की संभावना दिखाती है. हालांकि इसे बड़े औद्योगिक स्तर पर लागू करने से पहले विस्तृत परीक्षण और तकनीकी मूल्यांकन की जरूरत होगी.

सरकार से किसानों तक संसाधन पहुंचाने की अपील: प्रोफेसर रचना भाटेरिया ने कहा कि, "किसानों को पराली प्रबंधन के लिए उचित संसाधन और योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए. केवल पराली जलाने से रोकना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों को जागरूक करना और उन्हें व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है. इस तरह की रिसर्च किसानों और उद्योगों दोनों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है."
लैब से बड़े स्तर तक पहुंचाना अगली चुनौती: एमडीयू की यह रिसर्च पराली और औद्योगिक प्रदूषण से जुड़ी दो अलग-अलग समस्याओं को एक साथ देखने का रास्ता खोलती है. हालांकि शोध के परिणाम उत्साहजनक हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए तकनीक की लागत, लगातार प्रदर्शन, अपशिष्ट प्रबंधन और औद्योगिक मानकों के अनुरूप परीक्षण जैसे पहलुओं पर आगे काम करना होगा. यदि इसे व्यावहारिक स्तर पर सफलतापूर्वक अपनाया जाता है, तो धान की भूसी भविष्य में प्रदूषण का कारण बनने के बजाय प्रदूषण कम करने का जरिया बन सकती है.
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