काशी में मसान की होली: भूत-पिशाच, अघोरी के साथ निकली भव्य शोभायात्रा, जलती चिताओं के बीच खेली गई होली
वाराणसी में क्रीम कुंड बाबा कीनाराम स्थल से भव्य शोभायात्रा निकाली जिसमें अघोरी, और किन्नरों के साथ बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : February 27, 2026 at 5:44 PM IST
|Updated : February 27, 2026 at 10:33 PM IST
वाराणसी: बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी पर शुक्रवार को विश्व प्रसिद्ध मसान की होली परंपरा के साथ खेली गई. इस दौरान क्रीम कुंड बाबा कीनाराम स्थल से भव्य शोभायात्रा निकाली जिसमें अघोरी, औघड़ और किन्नर शामिल हुए. शोभायात्रा में कई आकर्षक झांकियां देखने को मिली, जिसमें भगवान शिव के अनेक गण शामिल हुए. इसमें भूत-पिशाच, हाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल और प्रेत भी शामिल रहे. शोभायात्रा में सैकड़ों की संख्या में काशीवासी भी शामिल हुए. यह यात्रा विजया चौराहा से सोनारपुर हरिश्चंद्र रोड से होते हुए हरिश्चंद्र घाट पर समाप्त हुआ.
शोभायात्रा हरिशचंद्र घाट पर पहुंचते ही बाबा मसन्नाथ की पूजा के साथ ओघड़ द्वारा बाबा की आरती की गई. नरमुंड की माला पहनाई गई. इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के भगवान के वेश धारण किए हुए कलाकारों ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दी. चारों तरफ जलती चिताओं से निकलकर भस्म को उड़ाया गया. वहीं घाट पर जलती चिताओं के बीच में सभी ने मसान की होली खेली. साथ ही बाबा की आरती की गई.
लोकमान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना कराकर काशी लाते हैं. इसके बाद देव विग्रहों के साथ होली खेलते हैं. इस दौरान बाबा विश्वनाथ के भूत-पिशाच और गण साथ नहीं होते, जिससे भूत पिशाच गण नाराज हो जाते हैं. इसके बाद बाबा माहाशमशान घाट पहुंचते हैं. जहां जलती चिताओं के बीच से राख निकालकर भूत प्रेत के साथ होली खेलते हैं.
काशी की यह अनोखी परंपरा कब से चली आ रही है, इसका सटीक प्रमाण किसी को नहीं पता है, लेकिन हर काशीवासी इस परंपरा में शामिल होते हैं. कुछ लोग मंदिर में बाबा के साथ रंग गुलाल खेलते हैं. कुछ लोग मसान घाट पर जाकर जलती चिताओं की राख से बाबा के साथ होली खेलते हैं.
आयोजक मंडल के सदस्य पंकज ने बताया कि शोभायात्रा बहुत पुरानी परंपरा है. पहले यह काफी छोटे रूप में होती थी. केवल आसपास के लोग होते थे. पिछले कई वर्षों से विदेश से लोग शामिल होते हैं.
काशी में रंगभरी एकादशी और गौना उत्सव की धूम: वाराणसी में शुक्रवार को रंगभरी एकादशी का पावन उत्सव अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. काशी के लिए यह दिन बेहद पवित्र और खास माना जाता है क्योंकि यह माता पार्वती की विदाई यानी गौने का प्रतीक है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान भोलेनाथ आज के दिन माता पार्वती को विदा करने के लिए कैलाश से काशी पधारते हैं. इसी परंपरा के तहत महंत आवास से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की चल रजत प्रतिमा भव्य रजत सिंहासन पर सवार होकर निकलती है.
नगर भ्रमण और विश्वनाथ मंदिर में विशेष आरती: भक्तों के कंधों पर सवार होकर भगवान की यह प्रतिमा काशी के भ्रमण पर निकलती है और अंत में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचती है. यहाँ मुख्य गर्भगृह में प्रतिमा को स्थापित कर विशेष सप्तऋषि आरती संपन्न की जाती है. इसी प्राचीन परंपरा के निर्वहन के साथ शुक्रवार से काशी में आधिकारिक रूप से होली की शुरुआत हो गई है. श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य को गुलाल चढ़ाकर उत्सव का शुभारंभ किया और पूरी काशी रंगों के सराबोर नजर आई.
परंपरा और ऐतिहासिक गौना उत्सव: होली में अभी कुछ दिन शेष हैं, लेकिन विश्वनाथ की नगरी में आज से ही रंग उत्सव शुरू हो चुका है. महाशिवरात्रि पर विवाह संपन्न होने के बाद आज भोलेनाथ माता पार्वती का गौना लेकर निकलते हैं. भक्त अपने महादेव और गौरा पर गुलाल फेंककर इस खुशी को साझा करते हैं. पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी के निधन के बाद उनके पुत्र वाचस्पति तिवारी ने इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया है.
4 मार्च तक चलेगा वाला उत्सव: महंत आवास पर सुबह से चल रहे पूजा-पाठ के बाद रजत प्रतिमा गलियों से होती हुई मंदिर पहुंची, जहां अद्भुत नजारा देखने को मिला. भक्तों ने एक-दूसरे पर अबीर-गुलाल उड़ाकर और महादेव के जयकारों के साथ इस उत्सव को यादगार बना दिया. मंदिर परिसर में आज रात सप्तऋषि आरती के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों और फूलों की होली का विशेष आयोजन भी किया गया है. काशी में शुरू हुआ रंगों का यह सिलसिला अब आगामी 4 मार्च तक निरंतर जारी रहेगा.
काशी विश्वनाथ मंदिर में होली: काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी पर भव्य होली खेली गई. काशी में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का 'गौना' कराकर काशी लौटे थे.मंदिर परिसर में बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती के विशेष श्रृंगार के बाद भक्तों ने उन पर अबीर और गुलाल अर्पित किया. बाबा की रजत पालकी को टेढ़ी नीम स्थित पूर्व महंत के आवास से मंदिर तक लाया गया, जिसमें शिव गणों के रूप में सजे भक्तों ने डमरू की गूंज के बीच गुलाल उड़ाया. इस वर्ष मथुरा-वृंदावन से विशेष गुलाल, गुझिया और फूल बाबा के लिए भेजे गए थे, जो काशी और ब्रज की सांस्कृतिक एकता को दर्शाते हैं.
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