सड़क नहीं, इसलिए शादी नहीं.. बिहार के 10 गांव की कहानी
नदारद सड़क कैसे लोगों के सपने तोड़ती है और बात जान पर बन आती है, जानने के लिए गया के 10 गांव की कहानियां पढ़ें.

Published : February 7, 2026 at 10:04 AM IST
रिपोर्ट: सरताज अहमद
गया: बिहार के गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड का 71 माइल मोड़ विकास के दावों के बीच कड़वी सच्चाई बयां कर रहा है. इस प्रखंड के 10 से अधिक गांवों में लोगों ने कई पीढ़ियों से पक्की सड़क नहीं देखी है. गया जिला प्रशासन की फाइलों में भले ही ये गांव नक्शे पर हों, लेकिन धरातल पर सफर शुरू होते ही राहगीर खुद को बेबस महसूस करता है.
जंगल पहाड़ों के रास्ते पर सफर: दरअसल गया जिला के बाराचट्टी प्रखंड से होकर गुजर रही नेशनल हाईवे 2 पर 71 माइल मोड़ है. यहां से प्रखंड मुख्यालय की लगभग 8 किलोमीटर दूरी है. 71 माइल से ही दुवाट, फुलगुनिया, खैरा, डांग, पिपराही, हरनाही, गुलक टांड़, शिष्या तरी जैसे 10 से अधिक गांवों को जाना होता है. 71 माइल से इन गांवों तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है. कच्ची सड़क की स्थिति देख गाड़ी चलाने में भी डर लगता है.
आजादी के बाद से सड़क के लिए तरस रहे ग्रामीण: इन गांवों में आजादी के 7 दशकों बाद भी एक पक्की सड़क नहीं बन सकी है. 10 से अधिक बड़े गांवों की 20 से 25 हजार की आबादी का एक मात्र सहारा पैदल या घर में खुदकी व्यवस्था के रूप में मोटर साइकिल, ट्रैक्टर का होना ही है. पक्की सड़क नहीं होने के कारण इस सफर में लोग सिर्फ गिर कर घायल ही नहीं होते हैं बल्कि कई की जान भी चली गई है.
फुलगुनिया गांव की 60 साल की बुजुर्ग महिला की दास्तां: ईटीवी भारत संवाददाता सबसे पहले फुलगुनिया गांव पहुंचे और वहां के लोगों की जिंदगी पर सड़क की अनुपस्थिति का क्या असर होता है, जानने की कोशिश की. इसी दौरान टूटे-फूटे कच्चे मार्ग पर थकी हारी एक बुजुर्ग महिला नजर आईं. बुजुर्ग महिला ललिता देवी की उम्र 60 साल है. उन्होंने कहा कि तबीयत ठीक नहीं है इसलिए डॉक्टर के पास जा रही हूं. 8 किमी का सफर पैदल तय करना है सो रास्ते भर रुक-रुककर आराम करते हुए जा रही हूं और वापसी भी इसी तरह से करनी है.

स्वास्थ केंद्र जाने के लिए पैदल सफर: अब जरा सोचिए 60 साल की बीमार महिला कैसे इतना लंबा सफर पैदल तय करेगी. लेकिन इलाज के लिए ललिता देवी को 8 किमी नहीं बल्कि लगभग 15 किमी का सफर तय करना है. ललिता देवी फुलगुनिया से 8 किलोमीटर पैदल चलकर नेशनल हाईवे 2 के 71 माइल मोड़ पर पहुंचेंगी फिर वहां से सवारी गाड़ी में बैठकर 8-10 किमी दूर मुख्यालय प्रखंड स्थित स्वास्थ्य केंद्र जाएंगी, ताकि इलाज करवा सकें.
"थक कर बैठ गई हूं. बाराचट्टी जाना है, तबीयत खराब है. डॉक्टर के पास जाना है. पैदल ही जाना है और पैदल ही आना है. ट्रैक्टर या पैदल जाना पड़ता है. पिपराही से राशन लाना पड़ता है, वह भी पैदल ही."- ललिता देवी, ग्रामीण, फुलगुनिया गांव
शादी में आती है परेशानी: गांव के युवक बसंत कुमार और अरुण कुमार कहते हैं कि उनके क्षेत्र के गांवों में शहर की बहु दामाद नहीं मिलते हैं. हद तो ये है कि मेन सड़क के किनारे वाली बाजारों के निवासियों के यहां भी रिश्ता नहीं लग पाता है. इन गांव के अधिकतर लड़के लड़कियों की शादी ब्याह जंगली क्षेत्र के गांवों में ही होती है.

"कुटुम्ब आते हैं, लड़का या लड़की पसंद भी हो कर लेते हैं, लेकिन रिश्ता तय नहीं हो पाता है. कारण यही बताया जाता है कि रिश्तेदार गांव तक नहीं पहुंच पाएंगे. सड़क नहीं है, मेन रोड पर घर है तो रिश्ता होगा."- बसंत कुमार, ग्रामीण
शहर की शादी टूटी तो गांव में करनी पड़ी : सड़क के कारण शादी टूटने का दंश अजय कुमार ने झेला है और कहते हैं कि मेरा रिश्ता गयाजी शहर में लगा था. मैं ग्रेजुएट हूं, किसान भी हूं और खेती भी अच्छी हो जाती है, घर भी अच्छा है. मेरा जहां पहले रिश्ता लगा था वहां लड़की वालों को मैं पसंद भी आ गया था. यहां गांव में लड़की वाले दिन तारीख भी तय कर लिए थे, लेकिन जब गांव से गए तो कुछ दिनों बाद फोन करके कहा कि परिवार के लोगों की राय नहीं है कि यहां शादी करें.
"लड़कीवालों ने कहा कि लड़के और परिवार में कोई कमी नहीं है लेकिन गांव में जाने के लिए सड़क तक नहीं है. ऐसे पिछड़े गांव में शादी नहीं कर सकते हैं. हालांकि मेरी शादी हो गई है लेकिन शहर में नहीं हुई बल्कि एक गांव में हुई है."- अजय कुमार, स्थानीय युवक
"सिर्फ कुछ युवकों की ये कहानी नहीं है, बल्कि हर घर की ये कहानी है. पहले हम लोग नक्सलियों के कारण सितम सहे और अब सिस्टम की वजह जिंदगी बर्बाद है. पहले लगता था कि नक्सलियों की वजह से हम लोग सरकारी सुविधाओं से उपेक्षित हैं लेकिन अब तो नक्सलियों के खत्म होने का दावा सरकार भी करती है , फिर क्यों नहीं सड़क बनती है?"- उपेंद्र यादव, ग्रामीण, पिपराही गांव
डंडा बना सुखिया का सहारा: ग्रामीण सुखिया देवी हाथ में डंडा पकड़े हुए फुलगुनिया गांव से 71 माइल जा रही थीं. सुखिया देवी हाथ में डंडा पकड़ कर चलने पर कहती हैं कि गांव तक आने के लिए सड़क नहीं है. रास्ते में बड़े बड़े गड्ढे, पत्थर , झाड़ी और जंगल की पगडंडी है. जिस पर चलना मुश्किल होता है.

"इस उम्र में अगर गिर गए तो हाथ पैर टूटना सुनिश्चित है.सहारे के लिए मैंने लाठी पकड़ रखी है. इस रास्ते पर गाड़ियां नहीं चलती हैं, हम लोग गरीब मजदूर हैं, इसलिए हमारे पास कोई साधन सवारी का नहीं है. पैदल ही चलना एक मात्र सहारा है."- सुखिया देवी, ग्रामीण,फुलगुनिया गांव
2 KM बाद मुश्किलों भरा सफर : कुछ सालों पहले 71 माइल से लगभग 2 किलोमीटर तक मोरम बोल्डर वाली कच्ची सड़क बनी थी, जिस पर छोटी फोर व्हीलर गाड़ियों से चला जा सकता था. अब उसकी स्थिति भी खराब है. जगह-जगह पर बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं. 71 माइल से 2 किलोमीटर पहुंचते ही उसके आगे का रास्ता मुश्किल भरा हो जाता है.
शिष्या तरी गांव की स्थिति: शिष्या तरी गांव के वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि 71 माइल से उनके गांव तक पहुंचाने के लिए तीन छोटी नदी जिसे हम देहात के धोड़ा भी कहते हैं, उसको पार करना होता है. बारिश के दिनों में इस रास्ते पर पैदल चलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन जैसी स्थिति हो जाती है.
"8 महीने के लिए क्षेत्र के अधिकतर लोगों ने हाल के सालों में ब्याज पर मोटर साइकिल भी खरीदी है. हालांकि क्षेत्र के लोगों का आय का जरिया खेती बाड़ी या मजदूरी है, जिनके पास खुद का संसाधन नहीं है वह पैदल ही चलते हैं."- वीरेंद्र कुमार,ग्रामीण, शिष्या तरी गांव
मरीजों की हो जाती है मौत: पिपराही गांव 150 घर की आबादी वाला गांव है. गांव में पल्स टू हाई स्कूल, अच्छे कच्चे पक्के मकान, नल जल योजना के तहत पानी की सप्लाई के लिए एक बड़ी टंकी, राशन कार्ड, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन और अन्य पेंशन का लाभ की व्यवस्था है. गांव में बिजली भी है. लेकिन इस गांव का भी दर्द प्रखंड मुख्यालय के लिए जाने के लिए मुख्य सड़क नहीं होना है. गांव में पिछले साल ही ट्रैक्टर से एक महिला को प्रसव के लिए प्रखंड अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई थी.

"ये घटना सिर्फ एक दो बार की नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र के सभी गांव की है. हर साल इस क्षेत्र में बरसात के मौसम में दो तीन बीमार लोगों की मौत समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने की वजह से हो ही जाती है. अगर बरसात में प्रसव के लिए महिला को ट्रैक्टर पर लेकर जाएं तो बड़ी मुश्किल से अस्पताल पहुंचते हैं. कभी तो मौत हो जाती है और कभी 71 माइल तक पहुंचने से पहले ही ट्रैक्टर पर प्रसव हो जाता है."- शंभू यादव, ग्रामीण, पिपराही गांव
इलाज नहीं मिलने के कारण आंख खराब: खुशबू देवी शिष्या तरी पास के गांव की रहने वाली हैं. 28 साल की उम्र में उनकी एक आंख खराब हो गई है. ससुर सीता राम शाह के साथ बहेरा आश्रम चंपारण झारखंड से इलाज करा कर मोटरसाइकिल से लौट रही थी. खुशबू देवी कहती हैं कि अभी वो आगे खराब रास्ते के कारण गिर गई थी. वो अस्पताल से इलाज करा कर आ रही है.
"गांव से प्रखंड अस्पताल की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है. पति बाहर काम करते हैं. ससुर का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है. आंख में काफी दिनों से दिक्कत थी. समय पर इलाज नहीं होने के कारण अब डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा है."- खुशबू देवी, ग्रामीण, शिष्या तरी गांव
चुनाव के समय में मिट्टी डाली गई थी: पिपराही के ही ब्रह्मदेव यादव कहते हैं कि गांव कोई नया नहीं बसा है. हमारे दादाजी के पिताजी यहां रहे थे. अब हम लोग पांचवीं पीढ़ी में यहां हैं. तब से ही यहां सड़क नहीं है.

"अभी आपको जंगल की घाटियों में कुछ जगहों पर मिट्टी डाली हुई भी नजर आएगी, क्योंकि वहां पर 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए फॉरेस्ट विभाग ने जेसीबी मशीन के द्वारा मिट्टी भरा है. बरसात में आप उस जगह से साइकिल से भी पार नहीं हो सकते हैं. दलदल की स्थिति बन जाती है."- ब्रह्मदेव यादव, ग्रामीण, पिपराही गांव
वन विभाग से NOC जरूरी: भलुआही के मुखिया सुरेंद्र यादव कहते हैं कि वह अपनी पंचायत के सभी गांव में सरकारी योजनाओं को पहुंचाने का प्रयास करते हैं , लेकिन सड़क के मामले में वह सफल नहीं हुए. सिर्फ उनकी ही पंचायत में ही नहीं बल्कि कई और पंचायत के गांव जुड़े हैं. लेकिन सभी मुखिया या अन्य पंचायती प्रतिनिधि सड़क को लेकर कुछ नहीं कर पाए. कारण यह है कि यह सड़क फॉरेस्ट में आती है. ऐसे में बिना वन विभाग के एनओसी के सड़कें नहीं बनवायी जा सकती है.
"फॉरेस्ट विभाग से इसके लिए क्लीयरेंस नहीं मिला है, जिसके कारण आज तक सड़क नहीं बनी है.विभिन्न समस्याओं का सामना यहां के लोगों को करना पड़ता है. कठिनाइयों के कारण हर साल दो तीन लोगों की मौतें भी होती है, जबकि रास्ते पर चलने वाले अनगिनत लोग गिरकर घायल भी हो चुके हैं."- सुरेंद्र यादव, भलुआही के मुखिया
क्लीयरेंस का इंतजार: स्थानीय जिला परिषद शीतल यादव कहते हैं कि बाराचट्टी के ये दक्षिण की ओर वन विभाग में सड़क आती है. चार सालों पहले ही इस सड़क के निर्माण की स्वीकृति आरडब्ल्यू डी वर्क डिवीजन शेरघाटी से मिली थी, लेकिन वन विभाग ने कार्य के लिए क्लीयरेंस नहीं दिया.
"क्षेत्र गयाजी संसदीय क्षेत्र में आता है. यहां से सांसद केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी हैं, जबकि बाराचट्टी की विधायक भी उनकी पार्टी से उनकी समधन ज्योति देवी हैं. उन नेताओं के संज्ञान में भी मामला सालों से है. वो अगर दिल्ली पटना में आवाज उठाएं तो काम कैसे नहीं होगा? मगर वह क्यों नहीं दिलचस्पी लेते हैं यह तो वही बताएंगे."- शीतल यादव,स्थानीय जिला परिषद

क्या कहती हैं विधायक?: बाराचट्टी की विधायक ज्योति देवी ने फोन पर बात करते हुए कहा कि 16.1.2026 को दिशा की बैठक हुई थी. उस में भी समस्या बताई गई थी. बाराचट्टी के विभिन्न गांव हैं, जहां तक सड़क नहीं बनी है. वो कई बार शिकायत अधिकारियों तक कर चुकी हैं.
"इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है कि ये फॉरेस्ट विभाग में रोड आते हैं और बिना क्लीयरेंस के बनना संभव नहीं है, लेकिन फिर भी हम लोग प्रयास कर रहे हैं. चुनाव के समय में भी इन क्षेत्रों मुद्दे उठे थे, हम प्रयास में हैं."- ज्योति देवी, विधायक, बाराचट्टी
क्या कहते हैं अधिकारी?: आरडब्ल्यूडी के कार्य डिवीजन शेरघाटी कार्यपालक अभियंता बृज किशोर कहते हैं कि इस क्षेत्र के साथ ऐसे 7 रोड हैं, जो नहीं बने हैं. कारण यह है कि यह वन विभाग में आता है.
"जहां तक 71 माइल से पिपराही रोड की बात है तो वो वन विभाग के साथ गौतम बुद्धा वाइल्डलाइफ सेंचुरी एरिया में पड़ता है, इसलिए फॉरेस्ट विभाग से क्लीयरेंस नहीं मिलने के कारण कार्य नहीं कराए जा सकते हैं."- बृज किशोर, कार्यपालक अभियंता,आरडब्ल्यूडी डिवीजन शेरघाटी
2018-19 से है पेंडिंग: साल 2018-19 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत स्वीकृति मिली थी, लेकिन फॉरेस्ट विभाग से अब तक क्लीयरेंस नहीं लिया जा सका है. फॉरेस्ट विभाग ने नियमानुसार कार्य के लिए क्लीयरेंस की कार्रवाई पूरी नहीं करने के कारण मंजूरी नहीं दी है, जिसके कारण कार्य आगे नहीं बढ़ सका है, जिसकी वजह से लोगों परेशानियों का सामना है.

कार्यपालक अभियंता बृज किशोर कहते हैं कि जुलाई 2025 में तत्कालीन जिला पदाधिकारी त्याग राजन ने इसको लेकर नियमानुसार गुरुवा प्रखंड के डीहा गांव में बदले में फॉरेस्ट विभाग को बिहार सरकार की जमीन हस्तांतरित कराया था. उन्होंने कहा कि फॉरेस्ट विभाग के प्रवेश पोर्टल पर एनओसी के लिए अप्लाई भी किया जा चुका है, मगर एनओसी नहीं मिली है.
"जिला का इसमें कोई दखल नहीं है, जो भी कार्य होने हैं वह फॉरेस्ट विभाग के एनओसी के बाद ही संभव हो सकता है. आरडब्ल्यू डी कार्य डिवीजन शेरघाटी ने फॉरेस्ट विभाग को डीबीएम रोड बनाए जाने का भी प्रस्ताव रखा है. डीबीएम रोड के तहत कच्चा वर्क होता है."-बृज किशोर, कार्यपालक अभियंता,आरडब्ल्यूडी डिवीजन शेरघाटी
क्लीयरेंस आवेदन में हैं त्रुटियां: इस संबंध में डीएफओ शशि कांत कहते हैं कि वन विभाग का जहां क्षेत्र है, वहां रोड की बात हो या अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर की बात हो वहां पर इंडियन फॉरेस्ट एक्ट और फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1988 के तहत फॉरेस्ट अनुमति की प्रक्रिया का अनुपालन करना होता है.फॉरेस्ट द्वारा एनओसी नहीं दी जाती है, बल्कि क्लीयरेंस दी जाती है.
"रोड निर्माण के संबंधित विभाग को फॉरेस्ट विभाग के प्रवेश पोर्टल पर क्लीयरेंस के लिए ठीक से पूरी जानकारी के साथ अप्लाई करना होता है. अप्लाई के बाद उनके यहां से जांच होने के बाद वो भारत सरकार को जाती है. वहां से सारी प्रक्रिया का पालन करने के के बाद ही कार्य किया जा सकता है, ये अनिवार्य है."- शशि कांत,डीएफओ
रास्ते पर भटकते हैं मुसाफिर: इस रास्ते पर चलने वाले वह लोग जो पहली बार अपने सगे संबंधियों के यहां जाते हैं, वह बिना किसी स्थानीय व्यक्ति की अगुवाई के अपने स्थान तक नहीं पहुंच सकते. ईटीवी भारत के प्रतिनिधि को ऐसे ही एक झारखंड के युवक अभ्यास कुमार मिले जो पिपराही अपने रिश्तेदार के यहां शादी कार्ड देने जा रहे थे. वह रास्ता भूलते हुए नजर आए.
"पहली बार ऐसी सड़क पर पहुंचे हैं. दो बार रास्ता भूले हैं. सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. पहले दूसरी सड़क पर गए. 6 किलोमीटर जाकर वापस इस सड़क पर आए. यहां सड़क तो है ही नहीं."- अभ्यास कुमार, झारखंड के युवक
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