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मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा: खेल के मैदान से संसद तक आदिवासी अस्मिता की बुलंद आवाज

3 जनवरी को मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की जयंती है. इसे लेकर रांची में तैयारियां शुरू हो गई हैं.

Marang Gomke Jaipal Singh Munda
जयपाल सिंह मुंडा (@Jairam_Ramesh)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : January 2, 2026 at 4:09 PM IST

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Updated : January 2, 2026 at 4:55 PM IST

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रांची: जयपाल सिंह मुंडा, जिन्हें प्रेम और सम्मान से ‘मरांग गोमके’ यानी सर्वोच्च नेता कहा जाता है, भारतीय इतिहास के ऐसे असाधारण व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक न्याय हर क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी. 3 जनवरी को उनकी जयंती है और यह दिन केवल एक महान खिलाड़ी की याद का नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों, स्वाभिमान और संघर्ष की प्रेरणादायक विरासत को नमन करने का अवसर भी है. उनका जीवन खेल के मैदान से लेकर संसद के गलियारों तक आदिवासियों के हक और पहचान की लड़ाई का अद्भुत उदाहरण रहा है.

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले के तकरा पाहनटोली गांव में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ. बचपन में उनका नाम प्रमोद पाहन था. सीमित संसाधनों के बीच जन्मे जयपाल सिंह की प्रतिभा बचपन से ही असाधारण थी. उनकी प्रारंभिक शिक्षा रांची के सेंट पॉल स्कूल में हुई, जहां उनकी बौद्धिक क्षमता और नेतृत्व गुणों से स्कूल प्रबंधन भी प्रभावित हुआ. उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए स्कूल के प्रिंसिपल उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड ले गए. वहां उन्होंने प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की, जो उस दौर में किसी आदिवासी युवक के लिए असाधारण उपलब्धि थी.

खेल के मैदान से संसद तक आदिवासी अस्मिता की बुलंद आवाज जयपाल सिंह मुंडा (ETV Bharat)

जयपाल सिंह मुंडा का खेल जगत में अहम योगदान

खेल जगत में जयपाल सिंह मुंडा का योगदान भारतीय खेल इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है. वे बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी थे और 1925 में उन्हें ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब मिला. यह सम्मान पाने वाले वे पहले और एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बने. उनकी खेल प्रतिभा का शिखर 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की और भारत को ओलंपिक इतिहास का पहला स्वर्ण पदक दिलाया. यह जीत केवल खेल की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दौर में भारत के आत्मसम्मान की जीत थी. खेल के प्रति उनके समर्पण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हॉकी खेलने के लिए अपनी प्रतिष्ठित भारतीय सिविल सेवा (ICS) की नौकरी तक छोड़ दी, जो उस समय बहुत बड़ा त्याग माना जाता था.

Marang Gomke Jaipal Singh Munda
जयपाल सिंह मुंडा की प्रतिमा (ETV Bharat)

झारखंड राज्य की मांग को मजबूती से रखा

हालांकि जयपाल सिंह मुंडा का योगदान केवल खेल तक सीमित नहीं रहा. आदिवासियों की दयनीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को देखकर उन्होंने राजनीति में कदम रखा. 1938 में उन्होंने ‘आदिवासी महासभा’ की अध्यक्षता संभाली और आदिवासियों के लिए अलग झारखंड राज्य की मांग को मजबूती से उठाया. वे झारखंड आंदोलन के प्रणेता और सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते हैं. उनका मानना था कि आदिवासियों की पहचान, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा के लिए अलग राज्य जरूरी है.

संविधान सभा के सदस्य रहे जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा भारत की संविधान सभा के भी सदस्य रहे. संविधान निर्माण के दौरान उन्होंने आदिवासी अधिकारों,.जल-जंगल-जमीन और स्वशासन के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया. उनकी भाषण शैली में दृढ़ता, तर्क और आदिवासी समाज के दर्द की स्पष्ट झलक मिलती थी. वे चाहते थे कि आज़ाद भारत में आदिवासियों को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक अधिकार और सम्मान मिले.

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जयपाल सिंह मुंडा हॉकी स्टेडियम (ETV Bharat)

जयपाल सिंह मुंडा की जयंती को लेकर विशेष तैयारियां

मरांग गोमके की जयंती को लेकर झारखंड, विशेषकर राजधानी रांची में व्यापक तैयारियां की जा रही हैं. रांची स्थित जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम को विशेष रूप से सजाया और संवारा गया है. खेल जगत में इस दिवस को खास महत्व दिया जाता है. हॉकी झारखंड द्वारा भी विशेष कार्यक्रमों की तैयारी की गई है. वहीं जयपाल सिंह मुंडा फुटबॉल क्लब की ओर से मोराबादी स्थित रांची ग्राउंड स्टेडियम में फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में खिलाड़ी और खेल प्रेमी शामिल होंगे.

नगर निगम पार्क में भी विशेष कार्यक्रम का आयोजन

इसके अलावा जयपाल सिंह मुंडा नगर निगम पार्क में भी विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. खूंटी जिले में, जहां से मरांग गोमके का संबंध रहा, वहां भी कई सांस्कृतिक और स्मृति कार्यक्रमों की योजना बनाई गई है. इन आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को उनके विचारों, संघर्ष और योगदान से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है.

जयपाल सिंह मुंडा केवल एक खिलाड़ी या राजनेता नहीं थे, बल्कि वे आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और अधिकारों की जीवंत प्रतीक थे. उनकी जयंती हमें यह याद दिलाती है कि संघर्ष, शिक्षा और आत्मविश्वास के बल पर कोई भी समाज अपने अधिकार और सम्मान की लड़ाई जीत सकता है. मरांग गोमके की विरासत आज भी झारखंड और देश को मार्गदर्शन देती है.

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Last Updated : January 2, 2026 at 4:55 PM IST