जयपुर का शहीद स्मारक बना शहादत की याद से लोकतांत्रिक आंदोलन का केंद्र
शहीद स्मारक आज जयपुर में हर बड़े धरने-प्रदर्शनों की पहली पसंद बन चुका है. सीएए-एनआरसी को लेकर भी कई महीनों तक चला था बड़ा आंदोलन.

Published : January 4, 2026 at 2:41 PM IST
जयपुर: अपनी स्थापत्य कला और सुनियोजित नगर निर्माण के लिए भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर गुलाबी नगर जयपुर में एक स्थान ऐसा भी है जो इन दिनों लोकतांत्रिक तरीके से किए जाने वाले आंदोलन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है. यह स्थान है जयपुर के पुलिस कमिश्नरेट के पास शहीद स्मारक जो 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध में शहीद हुए राजस्थान के सिपाहियों की याद में बनवाया गया था.
जयपुर का शहीद स्मारक अब सिर्फ शहीदों को श्रद्धांजलि देने का स्थान नहीं है, बल्कि यह शहर में लोकतांत्रिक आंदोलन का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र बन गया है. जयपुर में जब भी किसी बड़े मुद्दे को लेकर आंदोलन होता है तो उसका केंद्र शहीद स्मारक ही होता है. चाहे वो राजनीतिक पार्टियों के प्रदर्शन हों या सामाजिक और कर्मचारी संगठनों के प्रदर्शन, सभी को पुलिस और प्रशासन की ओर से धरने प्रदर्शन करने की अनुमति इसी स्थान पर दी जाती है.
पिछले पांच वर्षों में बदली आंदोलन की तस्वीर : जयपुर में 7 से 10 साल पहले जयपुर में बड़े धरने प्रदर्शन और जनसभाएं अमरूदों का बाग, स्टैच्यू सर्किल, बड़ी चौपड़ और विधानसभा के पास ज्योति नगर हुआ करते थे, लेकिन बाद में इन स्थानों पर धरने प्रदर्शनों की अनुमति देना प्रशासन ने बंद कर दिया. जिसके बाद पिछले 5 वर्षों से शहीद स्मारक ही हर छोटे बड़े आंदोलन का गवाह रहा है.
सीएए-एनआरसी आंदोलन से आया चर्चा में : हालांकि, शहीद स्मारक पहले शहीदों को श्रद्धांजलि देने और आतंकी गतिविधियों में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए ही यहां पहले लोग जुटते थे और कैंडल और मौन व्रत करके श्रद्धांजलि अर्पित करते थे, लेकिन साल 2020 में नागरिकता संशोधन कानून सीएए एनआरसी को लेकर दिल्ली के शाहीन बाग में एक बड़ा अनिश्चितकालीन धरना शुरू हुआ था. उसी की तर्ज पर जयपुर की मुस्लिम महिलाओं और अन्य सामाजिक संगठनों ने भी शहीद स्मारक पर धरना शुरू कर दिया था. कुछ ही लोगों से शुरू हुआ धरना बाद में इतना पॉपुलर हुआ कि इसमें सैकड़ों लोग रोजाना जाकर जुटने लगे.

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यह आंदोलन कई महीनों तक चला था. तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी शहीद स्मारक पर आकर आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाया था और धरने को समर्थन दिया था. हालांकि, उसके बाद कोविड-19 के चलते इस धरने को समाप्त कर दिया गया था.
हर छोटे-बड़े आंदोलन का साक्षी बना : वहीं, शहीद स्मारक अब हर छोटे बड़े आंदोलन का साक्षी रहा है. जब भी कोई राजनीतिक या सामाजिक धरने प्रदर्शन होते हैं तो वह इसी जगह होते थे. बीते साल प्रदेश कांग्रेस की ओर से भी कई छोटे-बड़े आंदोलन और रैलियां आयोजित की गई थीं तो वहीं शहीद स्मारक पर की गई थीं.
एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल भी यहीं आकर धरने प्रदर्शन करते हैं. बीते साल दिसंबर माह में प्रदेश कांग्रेस की ओर से नेशनल हेराल्ड के मुद्दे पर पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के नेतृत्व में कांग्रेस ने पैदल मार्च किया था, जहां शहीद स्मारक पर पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था.

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पेपर लीक के विरोध में 100 दिन से ज्यादा चला हनुमान बेनीवाल का धरना : एसआई भर्ती परीक्षा को रद्द करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख और नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व में भी अभ्यर्थियों ने शहीद स्मारक पर 100 दिन से ज्यादा धरना दिया था. आंधी, बारिश के दौरान भी धरना अनिश्चितकाल के लिए चल रहा था.
हनुमान बेनीवाल भी लगातार समर्थकों और अभ्यर्थियों के साथ धरने पर जुटे रहे थे और ऐसा ही भर्ती परीक्षा रद्द होने के बाद ही उन्होंने आंदोलन खत्म किया था. वहीं, दिलचस्प यह भी है एसआई भर्ती परीक्षा रद्द होने के बाद चयनित अभ्यर्थियों ने भी भर्ती परीक्षा रद्द होने के विरोध में अपने परिवारजनों के साथ इसी शहीद स्मारक पर धरना दिया था.
26 जनवरी 1974 को हुआ था शिलान्यास : 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध में शहीद हुए राजस्थान के सिपाहियों की याद में 26 जनवरी 1974 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरदेव जोशी ने इस स्मारक का शिलान्यास किया था. यहां लगे शिलालेख पर राजस्थान के तमाम जिलों से इस युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के नाम और पद लिखे हुए हैं जो यह साबित करते हैं कि राजस्थान को शौर्य और वीरता की भूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है. जब-जब भी मौका मिला है, राजस्थान के वीर सपूतों ने शौर्य और बलिदान देकर राजस्थान का नाम ऊंचा किया है.

श्रद्धा और संघर्ष का संगम : आज शहीद स्मारक जयपुर में श्रद्धा और संघर्ष का प्रतीक बन चुका है. एक ओर यह स्थान देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले जवानों को नमन करता है तो दूसरी ओर यह लोकतांत्रिक अधिकारों की आवाज बुलंद करने का मंच बन गया है. यही कारण है कि शहीद स्मारक अब जयपुर ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान में लोकतांत्रिक आंदोलन की पहचान बन गया है.
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कर्मचारी संगठनों को ज्यादा समय नहीं दिया जाता : वहीं, शहीद स्मारक को लेकर राजस्थान राज्य कर्मचारी संयुक्त महासंघ एकीकृत के प्रदेश अध्यक्ष
गजेंद्र सिंह राठौड़ का कहना है कि जयपुर में कई स्थान ऐसे हैं, जहां पर पहले आंदोलन होते थे लेकिन अब केवल शहीद स्मारक को ही आंदोलन के लिए परमिशन दी जाती है, लेकिन यहां भी प्रशासन भेदभाव करता है.
कर्मचारी और सामाजिक संगठनों को केवल शाम 4 बजे तक ही आंदोलन और धरने देने की अनुमति दी जाती है, जबकि राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं और नेताओं को यहां अनिश्चितकालीन धरना देने की अनुमति दे दी जाती है जो ठीक नहीं है. प्रशासन इसमें भेदभाव भरता है. हालांकि, शहीद स्मारक पर होने वाले धरने प्रदर्शनों के चलते कई बार ट्रैफिक जाम की भी समस्या हो जाती है, लेकिन फिर भी ठीक है कि कर्मचारी संगठन हो या सामाजिक संगठन है, वो लोकतांत्रिक आंदोलन के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुंचा देते हैं.

शहीद स्मारक पर होती है जोश और जज्बे की अनुभूति : वहीं, युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष और विधायक अभिमन्यु पूनिया का कहना है कि शहीद स्मारक भारत पाकिस्तान के 1971 के युद्ध में शहीद हुए राजस्थान के शहीदों की याद में बना हुआ मेमोरियल स्थल है, जहां हम धरना प्रदर्शन और आंदोलन करते हैं तो एक अलग ही तरह का जोश, जुनून और जज्बा दिखाई देता है.
अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जब यहां धरना देते हैं या आंदोलन करते हैं तो सरकार को भी हमारी बात सुननी पड़ती है. कई बार यहां धरना देकर हमने सरकार को झुकने पर मजबूर किया है. इसलिए कह सकते हैं कि शहीद स्मारक आज जयपुर में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए होने वाले आंदोलन का सबसे बड़ा प्रमुख केंद्र और गवाह बना हुआ है.

