महाशिवरात्रि 2026: पंचवक्त्र महादेव मंदिर में क्यों खड़े हैं नंदी महाराज? अद्भुत है कहानी
साल 2023 में हिमाचल में आई बाढ़ में ब्यास ने विकराल रूप ले लिया था, लेकिन फिर भी पंचवक्त्र महादेव मंदिर अडिग खड़ा रहा.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 11, 2026 at 6:44 PM IST
मंडी: 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि का पावन पर्व देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा. महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर हम आपको देवभूमि हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर के उस शिव मंदिर के बारे में बताएंगे जो ब्यास नदी के तट पर स्थित है और करीब 550 वर्ष पुराना है, जिसने 2023 की विनाशकारी बाढ़ में जिस तरह आस्था और स्थापत्य की मिसाल पेश की. हम बात कर रहे है पंचवक्त्र महादेव मंदिर की.
2013 का वह भयावह दृश्य देश आज भी नहीं भूला है, जब उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था. घर, होटल, दुकानें सब मलबे में समा गए थे, लेकिन उस प्रलय के बीच केदारनाथ मंदिर अडिग खड़ा रहा. उसी तरह 2023 में हिमाचल प्रदेश ने भी प्रकृति का रौद्र रूप देखा. भारी वर्षा और ब्यास नदी के उफान ने मंडी शहर में तबाही मचाई. कई घर और दुकानें बह गईं, पुराना लोहे का पुल नदी में समा गया, लेकिन ब्यास और सुकेती नदियों के संगम पर स्थित पंचवक्त्र महादेव मंदिर प्रचंड सैलाब के बीच भी अटल रहा.

जब पानी में डूब गया था पूरा मंदिर
2023 की आपदा के दौरान ब्यास नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया था कि पंचवक्त्र मंदिर पूरी तरह पानी में डूब गया था. सैलाब की तस्वीरों ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया था. मंदिर का शिखर ही पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था. वह दृश्य 2013 के केदारनाथ की याद दिला रहा था.
मंदिर परिसर में करीब 10 से 12 फीट तक गाद और मलबा भर गया था. प्रांगण में विराजमान विशाल नंदी महाराज भी गाद में दब गए थे. मुख्य द्वार को क्षति पहुंची थी, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह रही कि गर्भगृह में स्थापित पंचमुखी शिव प्रतिमा को कोई नुकसान नहीं हुआ. भारी मलबे और तेज धाराओं के बावजूद मंदिर की संरचना जस की तस रही. स्थानीय लोग इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते. उनका कहना है कि जिस तरह केदारनाथ मंदिर ने 2013 में प्रलय का सामना किया था, उसी तरह पंचवक्त्र महादेव ने 2023 में ब्यास की लहरों को चुनौती दी.
‘छोटी काशी’ की पहचान
हिमाचल का मंडी शहर ‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध है. जैसे काशी गंगा नदी के तट पर बसी है, वैसे ही मंडी ब्यास नदी के किनारे स्थित है. यहां शिव के अनेक प्राचीन मंदिर हैं. भूतनाथ, त्रिलोकीनाथ, अर्धनारीश्वर और पंचवक्त्र महादेव. इन मंदिरों की वजह से मंडी को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष स्थान प्राप्त है. पंचवक्त्र मंदिर सुकेती और ब्यास नदी के संगम पर स्थित है. यही संगम इसे आध्यात्मिक रूप से और भी पवित्र बनाता है. संगम स्थल पर स्थित होने के कारण यह मंदिर सदियों से प्रकृति के उतार-चढ़ाव का साक्षी रहा है.
550 साल पुराना इतिहास
मंदिर के पुजारी हरीश कुमार बताते हैं कि यह मंदिर राजाओं के समय का है और करीब साढ़े पांच सौ वर्ष पुराना है. इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ. कुछ स्रोत इसे राजा अजबर सेन से जोड़ते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार राजा सिद्ध सेन को इसका निर्माता मानते हैं.
लेखक मनमोहन की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ द मंडी स्टेट’ में उल्लेख मिलता है कि 1717 ईस्वी में ब्यास नदी में आई बाढ़ के कारण मंदिर को क्षति पहुंची थी और पंचमुखी शिव प्रतिमा बह गई थी. बाद में राजा सिद्ध सेन ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और नई प्रतिमा स्थापित की. पुरानी प्रतिमा का क्या हुआ, यह आज भी रहस्य बना हुआ है. इतिहास गवाह है कि यह मंदिर पहले भी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है. लेकिन हर बार यह पुनः उसी भव्यता के साथ खड़ा हुआ.
शिखर शैली की अद्भुत वास्तुकला
पंचवक्त्र मंदिर का निर्माण पत्थरों से शिखर शैली में किया गया है. मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक पहाड़ी शैली और उत्तर भारतीय नागर शैली का सुंदर संगम है. ऊंचा शिखर, मजबूत पत्थर की दीवारें और महीन नक्काशी इसे विशिष्ट बनाती है. मंदिर का मुख्य द्वार ब्यास नदी की ओर है. प्रवेश करते ही लगभग छह फीट से अधिक ऊंचे नंदी महाराज की प्रतिमा भक्तों का स्वागत करती है. नंदी के सामने गर्भगृह में स्थापित है. पंचमुखी शिव प्रतिमा जो इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है.

नंदी महाराज की अद्भुत मुद्रा
आम तौर पर शिव मंदिरों में नंदी महाराज बैठकर भगवान शिव की ओर निहारते हुए विराजमान होते हैं. लेकिन इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां नंदी महाराज खड़ी अवस्था में विराजमान हैं. मंदिर के पुजारी ने बताया कि मान्यता है कि जिन मंदिरों में भगवान शिव अपने उग्र या प्रचंड स्वरूप में विराजमान होते हैं, वहां नंदी महाराज विश्राम मुद्रा में नहीं, बल्कि अपने आराध्य की हर आज्ञा के लिए सदैव तत्पर, खड़े और सतर्क रहते हैं.
भगवान शिव के पांच मुख ईशान, अघोरा, वामदेव, तत्पुरुष और रुद्र पंचतत्वों और शिव के विविध स्वरूपों का प्रतीक माने जाते हैं. मान्यता है कि पंचवक्त्र रूप में शिव संपूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं. मंदिर की दीवारों पर की गई पत्थर की नक्काशी प्राचीन शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है.
मंदिर परिसर के प्रवेश द्वार पर बाबा भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है, जिन्हें इस धाम का रक्षक माना जाता है. 2023 की बाढ़ में भैरव मंदिर पूरी तरह रेत में दब गया था और मूर्ति भी कुछ समय के लिए अदृश्य हो गई थी. बाद में सफाई अभियान के दौरान उसे पुनः स्थापित किया गया.
आपदा के बाद की तस्वीर
बाढ़ के बाद जब पानी उतरा तो मंदिर के चारों ओर मलबे का अंबार था. प्रशासन, स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने मिलकर मंदिर परिसर से गाद हटाई. कई दिनों की मेहनत के बाद मंदिर को फिर से श्रद्धालुओं के लिए खोला गया. आज भी मंदिर परिसर में 2023 की आपदा के निशान देखे जा सकते हैं. पत्थरों पर जमी गाद के दाग, क्षतिग्रस्त सीढ़ियां और बह चुके पुल की स्मृति उस भयावह रात की कहानी कहते हैं. लेकिन इन सबके बीच मंदिर की अडिग संरचना आस्था की मजबूती का प्रतीक बनकर खड़ी है.
स्थानीय लोगों का मानना है कि 2023 की आपदा में मंडी शहर की रक्षा स्वयं भोलेनाथ ने की. उनका विश्वास है कि यदि पंचवक्त्र मंदिर ने लहरों का सामना न किया होता, तो तबाही और भी बड़ी हो सकती थी. इस वर्ष 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि के अवसर पर पंचवक्त्र मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाएगा. दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचकर भोलेनाथ का आशीर्वाद लेंगे.
मंडी की शिवरात्रि मेला भी प्रदेशभर में प्रसिद्ध है. पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन, देवताओं की शोभायात्रा और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच पंचवक्त्र महादेव मंदिर आस्था का केंद्र बना रहता है. इस बार की शिवरात्रि 2023 की आपदा के बाद पुनर्जीवित विश्वास का भी प्रतीक होगी.

आस्था बनाम आपदा
प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है तो इंसान खुद को असहाय महसूस करता है. लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत की प्राचीन मंदिर स्थापत्य कला ने समय-समय पर अपनी मजबूती सिद्ध की है. केदारनाथ से लेकर मंडी के पंचवक्त्र मंदिर तक—इन धरोहरों ने न सिर्फ आपदाओं का सामना किया, बल्कि लोगों के मन में विश्वास को और मजबूत किया. पंचवक्त्र महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि यह आस्था, इतिहास और स्थापत्य का जीवंत दस्तावेज है. 550 वर्षों से यह मंदिर नदियों के उतार-चढ़ाव, राजाओं के शासन और बदलते समय का साक्षी रहा है.
चमत्कार या इंजीनियरिंग की अद्भुत मिसाल?
कुछ लोग इसे चमत्कार मानते हैं, तो कुछ विशेषज्ञ मंदिर की मजबूत नींव और पारंपरिक निर्माण तकनीक को इसका कारण बताते. पत्थरों की जकड़न, ऊंचा चबूतरा और शिखर शैली की संरचना इसे जलधाराओं के दबाव को सहने में सक्षम बनाती है. लेकिन आस्था का अपना विज्ञान होता है. श्रद्धालुओं के लिए यह भोलेनाथ की कृपा है कि सैलाब की धाराएं मंदिर को डिगा नहीं सकीं.
हर साल की तरह इस साल भी महाशिवरात्रि पर मंडी का पंचवक्त्र महादेव मंदिर केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि विश्वास, इतिहास और अदम्य साहस का प्रतीक बनकर एक बार फिर श्रद्धालुओं का स्वागत करने को तैयार है.
ये भी पढ़ें: हिमाचल के इस मंदिर में 50 रुपए में मिलेगा सामान, ‘नेकी की दुकान’ में आत्मसम्मान के साथ मिलेगी मदद

