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मकर संक्रांति 14 को, नहीं कर सकेंगे चावल या खिचड़ी का दान, यह है कारण

मकर संक्रांति के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं. इस दिन किए दान का विशेष महत्व है.

MAKAR SANKRANTI 2026
मकर संक्रांति 2026 (ETV Bharat File Photo)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : January 10, 2026 at 4:10 PM IST

3 Min Read
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भरतपुर: इस वर्ष मकर संक्रांति पर्व श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व लेकर आया है. करीब 22 वर्षों बाद मकर संक्रांति एकादशी तिथि के साथ पड़ रही है, जिससे यह पर्व महासंयोग बन गया है. यह संयोग वर्ष 2003 के बाद पहली बार बना है. ऐसे दुर्लभ अवसर में दान-पुण्य, पूजा-पाठ और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है. खास बात यह है कि इस बार श्रद्धालुओं को दो दिन दान-पुण्य का अवसर मिलेगा, लेकिन दान की वस्तुएं तिथि के अनुसार अलग-अलग होंगी.

14 जनवरी-तिल-गुड़ व ऊनी वस्त्रों का दान: पंडित मनु मुद्गल ने बताया कि 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ एकादशी का पर्व पड़ रहा है. इस दिन सूर्य दोपहर 3:22 बजे धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे. यह समय संक्रांति काल माना जाएगा. एकादशी तिथि होने के कारण इस दिन चावल या खिचड़ी का दान नहीं किया जाता. ऐसे में शास्त्रसम्मत रूप से तिल, गुड़, तिल का तेल, जौ और ऊनी वस्त्र का दान विशेष पुण्यदायी रहेगा. उन्होंने बताया कि इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं, जिससे दान-पुण्य और जप-तप का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. तिल-गुड़ का दान करने से शनि दोष शमन, स्वास्थ्य लाभ और आर्थिक सुख की प्राप्ति मानी जाती है.

मकर संक्रांति पर क्या करें दान, देखें वीडियो (ETV Bharat Bharatpur)

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15 जनवरी-चावल-खिचड़ी दान: पंडित मनु मुद्गल ने बताया कि 15 जनवरी को उदया तिथि मानी जाएगी. सूर्य उदय के साथ ही संक्रांति पर्व का विधिवत पालन किया जा सकेगा. इस दिन श्रद्धालु चावल और खिचड़ी का दान कर सकते हैं. 15 जनवरी को दान-पुण्य का पुण्य काल दोपहर 1.32 बजे तक रहेगा. उन्होंने बताया कि जो श्रद्धालु एकादशी के कारण 14 जनवरी को चावल दान को लेकर संशय में रहते हैं, उनके लिए 15 जनवरी सर्वोत्तम दिन है. इस प्रकार इस वर्ष मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ और चावल, दोनों प्रकार के दान का पुण्य अलग-अलग तिथियों में प्राप्त होगा.

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पंडित मनु मुद्गल ने बताया कि मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है. सूर्य के उत्तरायण होते ही दिन बड़े होने लगते हैं और प्रकृति में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है. पंडित मनु मुद्गल के अनुसार उत्तरायण का समय जीवन में ऊर्जा, सक्रियता और शुभता का प्रतीक है. इसका प्रभाव केवल मानव जीवन पर ही नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और प्रकृति पर भी पड़ता है.

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मकर संक्रांति की तिथि में बदलाव का कारण: उन्होंने बताया कि हर वर्ष सूर्य की गति में लगभग चार मिनट का अंतर आता है. यही कारण है कि लगभग 72 वर्षों में एक दिन का अंतर बन जाता है. इसी खगोलीय परिवर्तन के चलते भविष्य में मकर संक्रांति स्थायी रूप से 15 जनवरी को मनाई जाएगी. पंडित मनु मुद्गल ने बताया कि मकर संक्रांति के साथ ही शुभ कार्यों का आरंभ माना जाता है. विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, कुआं पूजन जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत इसी पर्व के बाद होती है. सर्दी के मौसम में खिचड़ी का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी बताया गया है. उन्होंने बताया कि 14 जनवरी को तिल-गुड़ व ऊनी वस्त्र और 15 जनवरी को चावल-खिचड़ी का दान कर पुण्य अर्जित किया जा सकता है.