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वक्फ की करोड़ों की प्रॉपर्टी पर कहीं सरकार की नजर तो नहीं? जमीयत उलेमा-ए-हिंद को शक

मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के विरोध में उतरा जमीयत उलेमा-ए-हिंद. समानता के सिद्धांत का उल्लंघन बताया.

Madhya pradesh WAQF BOARD
मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति का विरोध (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : July 9, 2026 at 6:25 PM IST

3 Min Read
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भोपाल : मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को लेकर विवाद जारी है. अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद मध्य प्रदेश के सदर मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने सरकार के फैसले का विरोध किया है. सरकार पर निशाना साधते हुए उनका कहना है "जो लोग अपनी धार्मिक संस्थाओं के मामलों को ही ठीक से नहीं संभाल पा रहे, वे वक्फ की धार्मिक संपत्तियों और संस्थाओं की सुरक्षा कैसे करेंगे. कहीं ऐसा तो नहीं कि वक्फ की प्रॉपर्टी पर सरकार की नजर है."

सरकार पहले मंदिरों के मामले सुलझाए

मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने कहा "सरकार पहले अपनी धार्मिक संस्थाओं और मंदिरों से जुड़े विवादों को सुलझाए, उसके बाद वक्फ की व्यवस्था में हस्तक्षेप करे. हमारी सरकार से अदब के साथ दरख्वास्त है कि आप अपनी धार्मिक संस्थाओं को संभालिए और हमें अपनी मजहबी चीजों को संभालने दीजिए. पहले भी वक्फ बोर्ड में कलेक्टर रैंक का सीईओ नियुक्त होता था, उस पर हमें कभी कोई ऐतराज नहीं रहा. मंदिरों में मुस्लिमों को जगह नहीं तो वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम क्यों? यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता लाना चाहती है तो यही व्यवस्था मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थाओं की समितियों में भी लागू करनी चाहिए."

जमीयत उलेमा-ए-हिंद मध्य प्रदेश के सदर मुफ्ती मोहम्मद अहमद (ETV BHARAT)

समानता के सिद्धांत के विपरीत फैसला

उन्होंने कहा कि किसी एक समुदाय की धार्मिक संस्था में दूसरे धर्म के लोगों को शामिल करना समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है. यदि सरकार सभी धर्मों की संस्थाओं में समान नियम लागू करती है, तभी उसके तर्क को निष्पक्ष माना जा सकता है. अब तक सभी धर्मों की धार्मिक संस्थाओं का संचालन उसी समुदाय के लोग करते आए हैं. हिंदू संस्थाओं में हिंदू, सिख संस्थाओं में सिख और ईसाई संस्थाओं में ईसाई प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में पहली बार मुस्लिम समाज की धार्मिक संस्था वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति चिंता और पीड़ा का विषय है.

सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी कानूनी लड़ाई

मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने आरोप लगाया "इस फैसले से यह आशंका पैदा होती है कि सरकार की नजर वक्फ की जमीनों, कब्रिस्तानों और अन्य संपत्तियों पर है. वक्फ की संपत्तियां मुस्लिम समाज द्वारा गरीबों, जरूरतमंदों और धार्मिक उद्देश्यों के लिए समर्पित की गई हैं. ऐसे मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से समाज में अविश्वास पैदा होगा."

मुफ्ती मोहम्मद अहमद ने कहा "जमीयत उलेमा शुरू से ही वक्फ कानून के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही है. संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने सबसे पहले इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और आगे भी संगठन कानूनी लड़ाई जारी रखेगा. मुस्लिम समाज अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका पर भरोसा रखता है."